Brexit: क्या था ब्रेक्जिट, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा कश्मीर से तुलना गलत?
Brexit: सुप्रीम कोर्ट में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाये जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। इस बीच 8 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर पर बड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने पर 'ब्रेक्जिट' जैसे जनमत संग्रह का कोई सवाल ही नहीं है।
कोर्ट में ब्रेक्जिट का जिक्र
दरअसल आज से 4 साल पहले केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 निरस्त कर दिया था। इस मुद्दे पर अक्टूबर 2020 से ही संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है।

8 अगस्त 2023 को अनुच्छेद 370 हटाने के विरोधियों की पैरवी कर रहे कपिल सिब्बल ने जम्मू-कश्मीर की निर्वाचक विधानसभा के बिना अनुच्छेद 370 को हटाने की संसद की शक्तियों पर सवाल उठाये। उनका कहना है कि निर्वाचक या मूल विधानसभा का सत्र तो 1957 में ही खत्म हो गया था। केवल उसी (जम्मू-कश्मीर) विधानसभा के पास ही अनुच्छेद 370 में बदलाव करने या हटाने की शक्ति निहित थी। इस लिहाज से जम्मू-कश्मीर का स्वायत्त रूप उसका स्थायी दर्जा बन गया था।
कपिल सिब्बल ने कहा कि इस लोकतंत्र में जम्मू-कश्मीर के लोगों की आवाज कहां है? यह कोर्ट इस ब्रेक्जिट को हमेशा याद रखेगी, यानि यहां पर सिब्बल ब्रेक्जिट शब्द का उपयोग इसलिए कर रहे हैं कि केंद्र सरकार ने बिना जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में जनता से पूछे 370 हटा दिया था। मतलब जम्मू-कश्मीर को भारत में जबरन मिलाया गया।
उन्होंने आगे कहा कि ब्रेक्जिट में जनमत संग्रह का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं था। लेकिन, जब आप कोई संबंध तोड़ना चाहते है तो आपको सीधे तौर पर जनता की राय लेनी चाहिए। क्योंकि इस मामले के केंद्र में केंद्र सरकार नहीं, बल्कि जनता है।
सिब्बल के विरोध पर सीजेआई ने दिया जवाब
कपिल सिब्बल की दलीलों को सुनने के बाद सीजेआई (चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया) चंद्रचूड़ ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में, लोगों की राय जानने का काम स्थापित संस्थानों के जरिये किया जाना चाहिए। आप ब्रेक्जिट जैसे जनमत संग्रह जैसी स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते। उन्होंने सिब्बल के इस विचार से पूरी तरह से असहमति दिखाते हुए कहा कि ब्रेक्जिट एक राजनीतिक फैसला था, लेकिन हमारे देश के संविधान के अंदर जनमत संग्रह का कोई सवाल ही नहीं है। बता दें कि इन याचिकाओं को सुनने वाली बेंच में जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत शामिल हैं।
आखिर क्या है ब्रेक्जिट?
दरअसल 31 जनवरी 2020 को ब्रिटेन की घड़ी में रात के 12 बजने के साथ ही ब्रिटेन 28 देशों वाले यूरोपीय संघ से अलग हो गया था। क्योंकि 23 जून, 2016 को ब्रिटेन में जनमत संग्रह कराया गया था। जनमंत संग्रह का मुद्दा था यूरोप से ब्रिटेन का अलग होना। इन जनमत संग्रह में 52 प्रतिशत मतदाताओं ने अलग होने का (ब्रेक्जिट का) समर्थन किया और 48 प्रतिशत ने इसका विरोध किया था। यानि ब्रिटेन के मतदाताओं ने यूरोपीय संघ से अलग होने के लिए जो जनादेश दिया था उसे ही आज की तारीख में ब्रेक्जिट (Britain Exit) कहा जाता है। इसमें ब्रिटेन के लोगों ने राष्ट्रवादी सोच, आव्रजन के मुद्दों और पिछड़ती अर्थव्यवस्था के चलते यूरोपीय संघ से बाहर होने के लिए अपना मत दिया था।
ब्रेक्जिट का मुद्दा कहां से आया?
26 अक्टूबर 1947 को जम्मू कश्मीर रियासत के महाराज हरि सिंह ने भारत के साथ विलय संधि पर हस्ताक्षर किया था। जिसके तहत जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया था। इससे चार दिन पहले 22 अक्टूबर को पाकिस्तानी सेना ने कबाइलियों का रूप लेकर कश्मीर पर हमला बोल दिया था। तभी आनन-फानन में महाराज हरि सिंह ने भारत में मिलने का समर्थन किया। तब तक काफी देर हो चुकी थी, एक बड़े हिस्से पर भारत से अलग होकर नया देश बना पाकिस्तान अपना कब्जा जमा चुका था।
क्या नेहरू ने भी जनमत संग्रह की बात की थी?
अक्टूबर 2022 में केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कुछ दस्तावेज सार्वजनिक किए थे। तब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के 24 जुलाई 1952 को संसद में दिये एक भाषण का जिक्र किया था। उन्होंने कहा कि नेहरू ने संसद में कहा था कि महाराजा हरी सिंह ने जुलाई 1947 को कश्मीर के भारत में विलय का संदेश भिजवाया था। हालांकि, यह प्रस्ताव तब अनौपचारिक था। महाराजा के प्रस्ताव के बाद हम यह भी जानना चाहते थे कि वहां के लोग क्या चाहते है? जनता चाहेगी तो भारत में विलय किया जायेगा।
माउंटबेटन चाहते थे जनमत संग्रह?
हिंडोल सेनगुप्ता की किताब 'The Man Who saved India' में भी जनमत के बारे में कहा गया है। हालांकि, यह शब्द उसमें इस्तेमाल नहीं किया गया है। दरअसल आजादी के बाद भारत के आखिरी वायसराय लुई माउंटबेटन को देश का पहला गवर्नर जनरल बनाया गया था। तब वजह थी कि कश्मीर के भारत में विलय की, इस पूरी प्रक्रिया का माउंटबेटन भी हिस्सा थे। तब माउंटबेटन आजादी के समय चार दिन के कश्मीर दौरे थे। तभी उन्होंने महाराजा हरी सिंह से कहा था, कश्मीर में जैसे ही कानून व्यवस्था ठीक हो जायेगी। उसके बाद विलय का यह मुद्दा जनता की मदद से निपटाया जाएगा।












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