जानिए क्या है तिरंगा-यात्रा का 'यूपी कनेक्शन' ?

लखनऊ। जी हां मास्टर प्लान, बीते कल यानि कि 16 अगस्त से शुरू होकर 22 अगस्त तक चलने वाली तिरंगा यात्रा के पीछे क्या राजनीति है, इस पर तमाम आंकलन किए गए वहीं दूसरी ओर भाजपा के सूत्रों से भी इस बात को जानने की कोशिश की गई। लेकिन इसके पीछे क्या निष्कर्ष निकला आईये जानने की कोशिश करते हैं -

'UP के परिणामों में BJP नही चाहती कोई समझौता'

उना हो या फिर उत्तर प्रदेश...करीबन हर जगह से दलितों पर अत्याचार की खबरें सामने आ रही हैं। हिंसा इंसान से ज्यादा जाति पर होती है। जिसके बाद वर्ग विशेष तमाम व्यवस्थाओं को रूढ़िवादी सोच का हवाला देते हुए व्यवस्थाओं को, सरकार को, ठीक सबसे ज्यादा आशंकित हमला करने वाले वर्ग को हाशिए पर रख देता है। वजह यही है कि भाजपा को हिंदुत्व विचारधारा से ओतप्रोत माना जाता रहा है।

सारे दोष कट्टरता पर मढ़ दिए जाते हैं

जिसकी वजह है एक लंबे वक्त से चला आ रहा मजहबी टकराव, जो कि चंद बयानों की वजह से चमका, चंद कारनामों की वजह से उपज पाया। लेकिन मामला पटखनी खाता हुआ अब एक केचुल उतारकर दूसरे में सवार किया जा रहा है। परिणामस्वरूप सारे दोष कट्टरता पर मढ़ दिए जाते हैं। इसी क्रम में बीजेपी लोकसभा 2014 में हासिल 24 फीसदी दलित वोटों से हाथ नहीं धोना चाहती, फलस्वरूप तिरंगा यात्रा की योजना बनाई गई है।

राष्ट्रवाद के जरिए BJP चाहती है सबका साथ !

बाराबंकी में भाजपा के प्रदेश महामंत्री एवं तिरंगा यात्रा के उत्तर प्रदेश के प्रभारी पंकज सिंह के बयान ( भारत में रहने वाले कुछ गद्दार, कुछ देशद्रोही ही भारत मां के टुकड़ने करने की बात करते हैं। हर घर से अफजल पैदा होंगे ऐसा कहा जाता है। भारत माता की जयकार पर सवाल उठाए जाते हैं।

राष्ट्रद्रोहियों का सपा, बसपा, कांग्रेस समर्थन करती है

राष्ट्रद्रोहियों का सपा, बसपा, कांग्रेस समर्थन करती है। सूबे में सिर्फ आजम की भैंसे सुरक्षित हैं ) से साफ है कि तिरंगा यात्रा उत्तर प्रदेश में दलितों के साथ-साथ अन्य वर्गों को फिर से राष्ट्रवाद के नाम पर अपने खेमे के साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।

तैयारी यूपी की भी, आगे की भी

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा इस रणनीति को तैयार करने में जुटी हुई है कि किसी तरह से जनता विद बीजेपी और बनाम सारी पॉलिटिकल पार्टियां हो जाएं। ताकि विपक्षियों के पास किसी तरह का मौका ही शेष न रह जाए।

अपनी कमजोर नीतियों की वजह से दिल्ली और बिहार में हारी बीजेपी

क्योंकि भारतीय जनता पार्टी अपनी कमजोर नीतियों की वजह से दिल्ली और बिहार में ताशों के ढ़ेर की तरह बिखर चुकी है। ऐसे में भाजपा ( अनुसूचित जाति की सभी 17 सीटों पर जिस तरह से लोकसभा चुनावों के वक्त में कब्जा जमाया था ), उसे हाथ से किसी भी हालत में फिसलने नहीं देना चाहती।

राजनीतिक मंचों पर भाजपा अंबेडकर को काफी पहले ही ला चुकी है

फलस्वरूप बाराबंकी में आयोजित तिरंगा यात्रा से पूर्व पंकज सिंह के कार्यक्रम में लगे पोस्टर में अंबेडकर का चित्र दिखाई दिया। हालांकि सियासी लाभ तलाशने की जुगत में राजनीतिक मंचों पर भाजपा अंबेडकर को काफी पहले ही ला चुकी है, लेकिन तिरंगा यात्रा में लोगों ने तस्वीरों को देख खुद ब खुद आंकलन शुरू किया कि इस बार सूबे में भाजपा पूरी तरह से जाति के मुद्दे के साथ उतरने की योजना बना रही है।

कार्यकर्ताओं को लगातार व्यस्त रखो

हालांकि तिरंगा यात्रा पर भाजपा के सूत्रों ने एक अलग ही राय रखी, उन्होंने बताया कि पार्टी को इस बात का डर है कि हमारे सक्रिय लोग अगर किसी अन्य दल में चले गए तो नुकसान हो जाएगा, जिससे बचने के लिए कार्यकर्ताओं को लगातार व्यस्त रखो ताकि ऐसी कोई संभावना ही न बन पाए।

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