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Sedition Law: क्या है राजद्रोह कानून, विधि आयोग की सिफारिशों को लेकर क्यों मचा है बवाल?

फिलहाल राजद्रोह एक गैर-जमानती अपराध है। इसमें तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। इसके साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

What is sedition law and why are ruckus over recommendations of the Law Commission?

Sedition Law: भारतीय दंड संहिता की धारा 124-A, यानी राजद्रोह कानून इन दिनों चर्चा में है। वजह है इस कानून को लेकर सरकार को सौंपी गई 22वें विधि आयोग की रिपोर्ट। दरअसल, केंद्र ने राजद्रोह कानून को लेकर विधि आयोग से रिपोर्ट मांगी थी। विधि आयोग ने यह रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। इसमें कहा गया है कि इस कानून को समाप्त करने की जरूरत नहीं है। कुछ संशोधन करके राजद्रोह कानून को बनाये रखा जा सकता है। आमतौर पर इस राजद्रोह कानून को लेकर हो-हल्ला मचता ही रहता है, तो हमें इसके बारे में विस्तार से जानना चाहिए। राजद्रोह कानून क्या है? इसका इतिहास क्या है? इसमें बदलाव की क्या सिफारिश है? राजनीतिक दलों का क्या कहना है?

राजद्रोह कानून क्या है?

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124-A के तहत राजद्रोह एक अपराध है। यह कानून राजद्रोह को एक ऐसे अपराध के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें किसी व्यक्ति द्वारा भारत में संवैधानिक तौर पर गठित सरकार के प्रति मौखिक, लिखित, सांकेतिक या दृश्य रूप में घृणा, अवमानना या उत्तेजना पैदा करने का प्रयास किया जाता है। इस विद्रोह में वैमनस्य और शत्रुता की भावनाएं शामिल होती हैं। हालांकि, इस धारा के तहत घृणा या अवमानना फैलाने की कोशिश किए बिना की गई टिप्पणियों को अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता है।

भारत में राजद्रोह कानून का मसौदा साल 1837 में ब्रिटिश राजनीतिज्ञ थॉमस मैकाले ने तैयार किया था। साल 1860 में भारतीय दंड सहिता लागू हुई थी लेकिन इस कानून को शामिल नहीं किया गया। फिर साल 1870 में एक संशोधन के तहत भारतीय दंड सहिता की धारा 124-A (राजद्रोह) को जोड़ा गया।

स्वतंत्रता के बाद राजद्रोह कानून में क्या बदलाव

1948 में 'राजद्रोह' को संविधान से हटा दिया गया था। संविधान सभा में के.एम. मुंशी ने कहा था कि लोकतांत्रिक देश में आलोचना और असहमति का आदर करना चाहिए। उन्होंने भाषण और अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के आधार के रूप में संविधान के मसौदे में शामिल शब्द 'राजद्रोह' को हटाने के लिए एक संशोधन पेश किया। इस प्रकार 'राजद्रोह' शब्द संविधान से गायब हो गया और अनुच्छेद 19 (1) (A) ने भाषण और अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता दी। हालांकि, भारतीय दंड सहिता में धारा 124-A बनी रही।

साल 1951 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अनुच्छेद 19 (1) (A) के तहत स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए संविधान का पहला संशोधन किया और सरकार को सशक्त बनाने के लिए अनुच्छेद 19 (2) को अधिनियमित किया, जो भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर 'उचित प्रतिबंध' के रूप में अंकुश लगाता है। काननू के जानकारों का मानना है कि इस संशोधन ने राजद्रोह कानून को संवैधानिक रूप से मजबूत करने का काम किया।

इंदिरा गांधी सरकार के दौरान भारत के इतिहास में पहली बार धारा 124-A को संज्ञेय अपराध बनाया गया। साल 1974 में नयी सीआरपीसी, 1973 लागू हुई और औपनिवेशिक काल की 1898 की सीआरपीसी को निरस्त कर दिया गया। इसमें राजद्रोह को संज्ञेय अपराध बना दिया गया और पुलिस को बिना वारंट के गिरफ्तारी करने का अधिकार दे दिया गया।

फिलहाल राजद्रोह एक गैर-जमानती अपराध है। इसमें तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। इसके साथ जुर्माना लगाया जा सकता है। पासपोर्ट भी जब्त किया जा सकता है। आरोपित व्यक्ति को सरकारी नौकरी पाने से रोका जा सकता है।

राजद्रोह कानून में बदलाव की क्या सिफारिश है?

22वें विधि आयोग की रिपोर्ट में इस अपराध के तहत दोषी पाए जाने पर न्यूनतम सजा को बढ़ाने की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अपराध के तहत न्यूनतम सजा 3 साल से बढ़ाकर 7 साल की जानी चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए केंद्र सरकार मॉडल गाइडलाइंस को जारी कर सकती है। इस संदर्भ में आयोग ने सुझाव दिया है कि सीआरपीसी 1973 की धारा-196 (3) के तहत धारा-154 में नया प्रावधान जोड़ा जा सकता है। इसके अनुसार IPC की धारा 124-A के तहत एफआईआर दर्ज करने से पहले आवश्यक प्रक्रियागत सुरक्षा उपलब्ध होनी चाहिए। इसके तहत इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी की शुरुआती जांच और सरकार की इजाजत के बाद ही राजद्रोह अपराध के मामलों में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए।

रिपोर्ट पर कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर लगाए आरोप

22वें विधि आयोग की रिपोर्ट आने के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर इस कानून को पहले से ज्यादा खतरनाक बनाने के प्रयास करने का आरोप लगाया। साथ ही विधि आयोग की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए हैं। कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने यह दावा भी किया कि सरकार इस कदम से अपनी औपनिवेशिक मानसिकता का परिचय दे रही है। यह दिखा रही है कि मानो उसे राजद्रोह कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बारे में कुछ नहीं पता।

कांग्रेस नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर ने कहा है कि इस कानून पर सरकार की सक्रियता चौंकाने वाली है। राज्यसभा सदस्य और पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि राजद्रोह कानून का समर्थन करने वाली विधि आयोग की सिफारिशें गणतंत्र के लोकाचार और नींव के विपरीत हैं।

रिपोर्ट पर भाजपा ने क्या कहा?

कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवाल पर भाजपा सरकार ने भी जवाब दिया है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि राजद्रोह पर विधि आयोग की रिपोर्ट व्यापक परामर्श प्रक्रिया के बाद आई है। रिपोर्ट में की गई सिफारिशें प्रेरक हैं, लेकिन बाध्यकारी नहीं हैं। सभी हितधारकों से विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा। अब हमें रिपोर्ट मिल गई है, हम अन्य सभी हितधारकों के साथ भी परामर्श करेंगे, ताकि हम जनहित में तर्कपूर्ण निर्णय ले सकें। वहीं, केंद्रीय भू-विज्ञान मंत्री किरेन रिजिजू ने ट्वीट करके इंदिरा गांधी सरकार के दौरान धारा 124-A को संज्ञेय अपराध बनाए जाने का जिक्र करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा है।

क्या है मामला?

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    राजद्रोह कानून का मामला विधि आयोग के पास मार्च 2016 में ही पहुंच गया था। आईपीसी की धारा 124-A की संवैधानिकता को एस.जी. वोम्बटकरे बनाम भारत संघ केस में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। उस समय केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कहा गया था कि सरकार इसकी समीक्षा कर रही है।

    11 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक आदेश पारित किया। इसमें देशद्रोह कानून के तहत कोई नया मामला दर्ज करने पर और पहले से दर्ज मामले में आगे कोई भी कार्रवाई करने पर रोक लगा दिया गया। साथ ही कहा गया कि यह स्थिति तब तक बरकरार रहेगी, जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई और आदेश नहीं देता या सरकार राजद्रोह कानून पर कोई फैसला नहीं लेती। इसके बाद नवंबर 2022 में 22वें विधि आयोग के चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति हुई, जिसने हाल में धारा 124-A पर अपनी अंतिम रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी है।

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