Sarbat Khalsa: क्या होता है सरबत खालसा? जानिए कैसे और कब हुई इसकी शुरुआत
भगोड़े अमृतपाल सिंह का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो 13 अप्रैल को सरबत खालसा बुलाने की मांग कर रहा है। जानिए आखिर क्या है सरबत खालसा?

29 मार्च 2023 को 'वारिस पंजाब दे' संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि उसे गिरफ्तार नहीं किया गया है। वह पुलिस घेरा तोड़कर भागने में सफल रहा था। दरअसल अजनाला थाने पर हुए हमले में वांछित खालिस्तानी समर्थक और अलगाववादी अमृतपाल को 18 मार्च से पंजाब पुलिस खोज रही है। वहीं अमृतपाल का यह वीडियो ब्रिटेन के एक यूट्यूब चैनल से अपलोड किया गया, जिसे अब भारत में बैन कर दिया गया है।
उसने अपने वीडियो में कहा कि यह सिर्फ मेरी गिरफ्तारी का मसला नहीं है। मुझे गिरफ्तारी देने से डर नहीं लगता। मेरा कोई भी बाल बांका नहीं कर सका। अमृतपाल ने भारत और विदेश में रह रहे सिख लोगों से कहा कि उन्हें एक साथ आकर अन्याय से लड़ना होगा। सिखों को एक बड़े मकसद के लिए साथ आना चाहिए। साथ ही कहा कि सरकार ने अकाल तख्त के अल्टीमेटम को भी नहीं माना। जत्थेदार को स्टैंड लेना चाहिए और सरबत खालसा में भाग लेना चाहिए। जत्थेदार को 13 अप्रैल को तलवंडी साबो स्थित दमदमा साहिब में सरबत खालसा बुलाना चाहिए।
क्या होता है सरबत खालसा?
अब समझते हैं कि आखिर ये सरबत खालसा क्या है? जिसे बुलाने का ऐलान अमृतपाल ने अपने वीडियो में किया था। दरअसल, सरबत खालसा एक ऐसी सभा को कहते हैं जिसमें कई सिख संगठन एकसाथ हिस्सा लेते हैं। यहां सरबत का मतलब 'सभी' और खालसा का मतलब 'सिख' से होता हैं। यानि सभी सिखों की एक सभा।
इस सभा में शामिल सभी संगठन आये हुए किसी संकट का हल तलाशने पर चर्चा करते हैं। इसके बाद जो भी फैसला होता है तख्त साहिब के जत्थेदार कौम को उसका पालन करने के लिए आदेश देते है। यदि सिख समुदाय निर्णय से सहमत नहीं है तो पांचों तख्तों के जत्थेदार को अपना निर्णय बदलना पड़ता है।
कौन होते हैं ये पांचों तख्तों के जत्थेदार
दरअसल 13 अप्रैल 1699 में बैसाखी के पर्व के दिन श्री गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। गुरु गोबिंद सिंह ने सबसे पहले 5 पंच प्यारों को अमृत पान करवाया था और उन पांच प्यारों के हाथों से स्वयं भी अमृत पान किया था। इन पांचों में भाई दया सिंह जी, धर्म सिंह, हिम्मत सिंह, मोहकम सिंह और साहिब सिंह को गुरु गोबिंद सिंह ने चुना था। सिख धर्म के हर आयोजन की गतिविधियों की देख रेख इन्हीं पंच प्यारों के हाथों में सौंपी गई थी। ये वही पंच प्यारे होते हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं।
अब जानते हैं सरबत खालसा का इतिहास
16वीं शताब्दी में सिखों के चौथे गुरु श्री रामदास ने इस प्रथा को शुरू किया था। इसके तहत साल में दो बार सिख समुदाय वैशाखी और दीवाली पर एकजुट होकर धार्मिक और राजनीतिक बातें करता था। 16 जून 1716 को मुगल बादशाह फर्रुखसियर के आदेश पर बंदा सिंह तथा उनके मुख्य सैन्य अधिकारी के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिये गए। बंदा सिंह बहादुर के बलिदान के बाद सिख समाज नेतृत्वहीन हो गया और कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट गया। बंदा सिंह वही शख्स थे, जिन्हें मरने से पहले गुरू गोबिंद सिंह ने सिखों का नेता बनाया था।
रणजीत सिंह ने इस पर लगाया प्रतिबंध
बंदा बहादुर की मृत्यु के बाद सिखों में सरबत खालसा और गुरुमत्ता प्रचलन में आया। सिख लोग जब इकट्ठे होते थे तब इसे 'सरबत खालसा' और इकट्ठे होकर जो निर्णय लेते थे उसे 'गुरुमत्ता' कहा गया। 1733 और 1745 के सरबत खालसा खूब चर्चाओं में रहे। इसका नेतृत्व 'दल खालसा' किया करता था, यह सिखों के मिलिट्री यूनिट्स की तरह था। ये राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर चर्चा करते थे। साथ ही युद्ध की रणनीति बनाते थे।
यह सिलसिला 1805 तक चलता रहा। उसके बाद 12 अप्रैल 1801 को रणजीत सिंह ने 'महाराजा' की उपाधि धारण की और सिख साम्राज्य की स्थापना करते हुए लाहौर को अपनी राजधानी बनाया। 1802 में उन्होंने अमृतसर की ओर अपना रुख किया। वहीं 1805 में 'सरबत खालसा' पर महाराजा रंजीत सिंह ने पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। हालांकि, इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है कि आखिर उन्होंने क्यों इस प्रथा को बंद करवा दिया।
20वीं सदी में फिर हुई 'सरबत खालसा' की बैठक
तकरीबन सौ बाद साल 1920 में गुरुद्वारा सुधार लहर के नेताओं ने सरबत खालसा की परंपरा पुन: शुरू की। 15 नवंबर 1920 को सरबत खालसा बुलाया गया। इसमें पहली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी चुनी गई थी। वहीं 10 जून 1926 के दिन भी सरबत खालसा बुलाया गया। यह गुरुद्वारा एक्ट के बारे में गुरमता करने के लिए बुलाया गया था। वहीं आजादी के बाद ये बैठक फिर से बंद हो गयी।
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद 'सरबत खालसा' चर्चा में रहा
वहीं ऑपरेशन ब्लू स्टार के कारण गोल्डन टेंपल (अमृतसर) के क्षतिग्रस्त को लेकर 26 जनवरी 1986 को अकाल तख्त साहिब में एक बार फिर से सरबत खालसा बुलाया गया। इसको सरबत खालसा कांफ्रेंस का नाम दिया गया था। इस बैठक को कहीं-न-कहीं भारत सरकार की मंजूरी थी क्योंकि इसमें भारत सरकार ने प्रस्ताव दिया था कि वो अपने खर्च पर अकाल तख्त का निर्माण करवाएगा, जिसे ठुकरा दिया गया। फैसला हुआ कि अकाल तख्त कार सेवा के जरिए बनाया जाएगा।
बदले गये थे जत्थेदार
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद अकाल तख्त के दो जत्थेदारों को हटा दिया गया। स्वर्ण मंदिर के प्रमुख ग्रंथी (पुजारी) ज्ञानी साहिब सिंह और अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी किरपाल सिंह। उनकी जगह जरनैल सिंह भिंडरावाले के भतीजे जसबीर सिंह रोडे और जगतार सिंह को नियुक्त किया गया।
उसी साल 29 अप्रैल 1986 को एक 'सरबत खालसा' की बैठक हुई। जिसमें स्वर्ण मंदिर में अकाल तख्त के पुनर्निर्माण की घोषणा की गई। उसी स्वर्ण मंदिर परिसर में अलगाववादी सिखों की एक सभा ने खालिस्तान के एक स्वतंत्र राज्य की घोषणा की और अन्य राष्ट्र-राज्यों से 'खालिस्तान' की सरकार को मान्यता देने का आग्रह किया।
सरबत खालसा बुलाने का अधिकार किसके पास?
सच तो यह है कि 20वीं सदी की शुरूआत से सरबत खालसा बुलाने को लेकर विवाद होता रहा है कि कौन इसका आयोजन कर सकता है? वैसे तो अकाल तख्त को ऐसी बैठक बुलाने का अधिकार है क्योंकि अकाल तख्त ही फिलहाल सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था है।
वैसे आपको बता दें कि 10 नवंबर 2015 को शिरोमणी अकाली दल के नेता सिमरनजीत सिंह मान और यूनाइटेड अकाली दल के नेता मोहकाम सिंह ने सरबत खालसा बुलाया था। यह डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम के खिलाफ और पंजाब के आसपास गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटना को लेकर किया गया था।












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