H3N2 Virus: जानें दुनियाभर में 10 लाख मौतों के लिए जिम्मेदार H3N2 वायरस के बारे में
H3N2 वायरस से देश में अब तक 2 लोगों की मौत हो चुकी है। इस वायरस की चपेट में आने के बाद एक व्यक्ति की मौत हरियाणा, जबकि दूसरी मौत कर्नाटक में हुई है।

H3N2 Virus: बीते दो महीनों से देश में इन्फ्लूएंजा वायरस H3N2 के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में इस वायरस की वजह से दो मौत होने की पुष्टि भी की है। वैसे इस मौसमी इन्फ्लूएंजा के मामले मार्च के आखिर तक कम होने की उम्मीद जताई गई है। यह वायरस छोटे बच्चों और पहले से अन्य रोगों से पीड़ित बुजुर्गों के लिए बहुत ही खतरनाक है।
H3N2 इन्फ्लुएंजा की चपेट में आने के बाद लोगों को कमजोरी और थकान से उबरने में दो सप्ताह से अधिक समय लग रहा है। इन्फ्लूएंजा के मरीजों में तेज बुखार, लगातार खांसी, शरीर में दर्द और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत पाई जा रही है।
आखिर क्या है H3N2?
H3N2 एक प्रकार का इन्फ्लूएंजा वायरस है। यह हर साल ठंड जाने और गर्मी आने के दरमियान में अधिक फैलता है। मेडिकल की भाषा में इसे एंटीजेनिक ड्रिफ्ट कहते है। कुछ सालों पहले तक यह एक महामारी H1N1 थी, मगर अब वायरस का वर्तमान सर्कुलेटिंग स्ट्रेन H3N2 सामने आया है। इसलिए यह एक सामान्य इन्फ्लूएंजा स्ट्रेन है। वैसे यह भी कोरोना वायरस की तरह ही फैलता है।
कितने प्रकार के होते हैं मौसमी इन्फ्लूएंजा?
द लेंसेन्ट (The Lancet) की एक रिसर्च के मुताबिक यह मौसमी इन्फ्लूएंजा (ऑर्थोमेक्सोविरिडे) वायरस A, B, C और D चार तरह का होता है। इनमें A और B से मौसमी फ्लू होता है। इन्फ्लूएंजा A के दो प्रकार H3N2 और H1N1 होते हैं। इन्फ्लूएंजा टाइप B मुख्य रूप से मनुष्यों को संक्रमित करता है। वहीं इसका कोई प्रकार नहीं होता, लेकिन लाइनेज होते हैं। इन्फ्लूएंजा C वायरस सबसे कमजोर और कम खतरे वाला माना जाता है। यह सूअरों और कुत्तों सहित इंसानों को संक्रमित करता है। इसका D टाइप मवेशियों (जानवरों) पर ही हमला करता है। यह वायरस इंसानों को संक्रमित कर सकता है या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
क्या है H3N2 का इतिहास?
संयुक्त राष्ट्र की सीडीसी (Centers for Disease Control and Prevention) स्वास्थ्य एजेंसी के मुताबिक साल 1968 में इन्फ्लूएंजा A (H3N2) वायरस की पहचान एक महामारी के रूप में हुई थी। जांच में यह पाया गया कि H3N2 इन्फ्लूएंजा पक्षियों और दूसरे जानवरों से म्यूटेट होकर इंसानों में फैलता है। इसकी वजह से दुनियाभर में एक मिलियन से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। अकेले अमेरिका में लगभग 100,000 लोगों की मौत हो चुकी है। जिसमें ज्यादातर मौतें 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की हुई है। H3N2 वायरस दुनियाभर में मौसमी इन्फ्लूएंजा A वायरस के रूप में फैलता रहता है।
H3N2 वायरस कैसे फैलता है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक यह अत्यंत संक्रामक H3N2 इन्फ्लूएंजा एक इंसान से दूसरे इंसान में खांसने, छींकने या किसी संक्रमित शख्स से बात करने पर निकलने वाली बूंदों के जरिये फैल सकता है। यह तब भी फैल सकता है, जब कोई किसी ऐसी सतह के संपर्क में आने के बाद अपने मुंह या नाक को छूता है, जिस पर पहले से वायरस मौजूद है। गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों और गंभीर रोगों से पीड़ित लोगों को फ्लू से संबंधित जटिलताओं का अधिक खतरा होता हैं।
H3N2 के क्या लक्षण हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार मनुष्यों में किसी भी संक्रमण के कारण सांस लेने में तकलीफ होना, ऑक्सीजन लेवल 93 से कम होना, छाती और पेट में दर्द और दबाब महसूस होना, बहुत ज्यादा उल्टी, मरीज के कंफ्यूज रहने या भ्रमित रहने और बुखार-खांसी रिपीट होना इसके लक्षण हैं। साथ ही शुरुआत में कफ वाली खांसी और बाद में सूखी खांसी का आना। कुछ मामलों में मरीज को डायरिया और नाक बहने की शिकायत हो सकती हैं।
वहीं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) का मानना है कि इस H3N2 इन्फ्लूएंजा के लक्षण पांच से सात दिनों तक बने रहे सकते हैं। H3N2 से होने वाला बुखार तीन दिनों में उतर जाता है, लेकिन खांसी तीन हफ्ते से ज्यादा दिनों तक बनी रहती है।
क्या है इसके उपाय?
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बचाव के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के हवाले से बताया गया है कि छींकने और खांसने के दौरान मुंह और नाक को ढकने, आंखों और नाक को छूने से बचने और बुखार और शरीर में दर्द के लिए पेरासिटामोल ली सकती है। इसके साथ ही भीड़-भाड़ वाले इलाकों से परहेज करने, मास्क लगाने, खांसते और छींकते वक्त मुंह और नाक रुमाल से ढक कर रखने की भी सलाह दी गई है। जबकि भीड़-भाड़ वाली जगहों, पब्लिक प्लेस पर न थूकने के साथ ही हाथ मिलाने या किसी भी तरह के शारीरिक संपर्क से बचने को कहा गया है। वहीं डॉक्टर की सलाह लिए बगैर एंटीबायोटिक के इस्तेमाल की भी मनाही की गई है। क्योंकि संक्रमण बैक्टिरियल है या नहीं, इसकी पुष्टि करने से पहले मरीज एंटीबायोटिक न लें, क्योंकि वे एक प्रतिरोध विकसित कर सकते हैं।
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