Farmers: पिछले 9 सालों में किसानों को क्या मिला?

Farmers: नरेंद्र मोदी की सरकार के दो कार्यकाल पूरे होने को हैं। बीजेपी ने वायदा किया था कि साल 2022 तक किसानों की आय दुगनी हो जाएगी। अब जबकि देश फिर से चुनाव की ओर जा रहा है, यह जानना जरूरी है कि क्या वाकई किसानों की आय बढ़ी है या फिर वह पहले की ही तरह कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, उनकी लाचारी बनी हुई है।

कितना बढ़ा न्यूनतम समर्थन मूल्य

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी वह मूल्य है, जिस पर सरकार किसानों से फसल खरीदती है। आंकड़ों से यही लगता है कि पिछले 9 साल में सरकार ने एमएसपी के दाम बढ़ाए हैं। धान का एमएसपी जहां 2014-15 में 1360 रूपये प्रति क्विंटल था, वह 2023-24 में 2183 रूपये प्रति क्विंटल हो गया है। अर्थात धान के एमएसपी में इन 9 वर्षों के दौरान 60.5 फीसदी (823 रू.) की वृद्धि हुई है। गेहूं का एमएसपी 2014-15 में 1400 रूपये प्रति क्विंटल था, वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए 2125 रूपये प्रति क्विंटल पहुंच गया यानि 51.78 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

What did farmers get in the last 9 years under modi governance

अगर मोटे अनाज की बात करें तो वित्तीय वर्ष 2014-15 में जहां बाजरे का एमएसपी 1250 रू. प्रति क्विंटल, रागी का 1550 रू. प्रति क्विंटल, मक्का का 1310 रू. प्रति क्विंटल, ज्वार का 1530 रू. प्रति क्विंटल था, जो वित्तीय वर्ष 2023-24 में बाजरा- 2500 रू. (दोगुना वृद्धि), रागी- 3846 रू. (148 प्रतिशत), मक्का- 2090 रू. (59.54 प्रतिशत), ज्वार- 3180 रू. (दोगुना से भी ज्यादा वृद्धि) प्रति क्विंटल हो गया है। देखा जाए तो इन 9 वर्षों के दौरान मोटे अनाज में अन्य अनाजों की अपेक्षा वृद्धि अधिक हुई।

इस दौरान अगर दालों व तिलहन के एमएसपी को देखें तो अरहर 4350 रू. से 7000 रू. (लगभग 61 प्रतिशत की वृद्धि), मूंग 4600 रू. से 8558 रू. (86 प्रतिशत की वृद्धि), उड़द 4350 रू. से 6950 रू. (59.77 प्रतिशत की वृद्धि), मूंगफली 4000 रू. से 6377 रू. (59.42 प्रतिशत की वृद्धि), तिल 4600 रू. से 8637 रू. (87.71 प्रतिशत की वृद्धि) व कपास 3750 रू. से 6620 रू. (76.53 प्रतिशत वृद्धि) प्रति क्विंटल पहुंच गया है। यानि दलहन व तिलहनों के एमएसपी में भी काफी वृद्धि हुई है।

किसानों को प्रोत्साहन हेतु सरकारी योजनाएं

इसके अलावा सरकार किसानों की सहायता के लिए कई और योजनाएं भी चला रही है। जैसे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजनाः 1 दिसंबर 2018 को इस योजना की घोषणा के बाद से किसानों को प्रति वर्ष 6000 रू. आर्थिक सहायता सरकार लगातार दे रही है। हर चार महीने पर 2000 रुपये मिलने वाली इस योजना के तरह अभी तक कुल 14 किश्तें जारी की जा चुकी है। औसतन सभी पात्र किसानों को 18.59 हजार करोड़ रूपये प्राप्त हो चुके हैं। किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत 31 मार्च 2023 तक 7.35 करोड़ किसानों के केसीसी खाते खोले जा चुके थे। जिनमें कुल 8.85 लाख करोड़ रूपये की धनराशि लोन के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी। 2012-13 में मात्र 1.29 करोड़ केसीसी खाते थे और कुल स्वीकृत धनराशि 1.26 लाख करोड़ रूपये थी।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत वर्ष 2021-22 में 2.158 करोड़ किसानों ने 12,978 करोड़ रूपये का बीमा क्लेम किया। जिसमें से 12,002.5 करोड़ रूपये के बीमा क्लेम का भुगतान किया जा चुका है, सरकार का यह दावा है। अर्थात लगभग 92.5 प्रतिशत बीमा क्लेम का भुगतान कर दिया गया। इसके अतिरिक्त सरकारी आकड़ों में सरकार ने यह भी दावा किया है कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत वर्ष 2022-23 तक लगभग 78.47 लाख हेक्टेयर भूमि को कवर किया गया तथा सरकार द्वारा इस योजना के तहत 6376 करोड़ रूपये खर्च किये गये।

किसानों को मिलने वाली सब्सिडी

केंद्र सरकार किसानों को यूरिया, बीज, रसायनिक व जैविक खाद, सिंचाई यंत्र, कृषि मशीनों इत्यादि पर सब्सिडी के रूप में करोड़ों खर्च का भी दावा कर रही है। सरकार का कहना है कि यूरिया की वास्तविक कीमत लगभग 2200 रू. प्रति बोरी (45 किलो) होने के बावजूद किसानों को यह मात्र 267 रू. प्रति बोरी उपलब्ध करा रही है। इसके अलावा एनपीके, पोटाश इत्यादि पर सब्सिडी दी जाती है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2021-22 के दौरान 1.62 लाख करोड़ रूपये की उर्वरक सब्सिडी दी थी।

तो क्या किसानों की हालत अच्छी हो गई है, क्या कृषि क्षेत्र में विकास दर आगे बढ़ रही है? इसका जवाब मिलजुला है। कुछ हद तक किसानों की आय बढ़ी है, पर देश की तरक्की में कृषि क्षेत्र का योगदान कम हो रहा है। संसद में कृषि एवं पशु कल्याण मंत्री नरेंद्र तोमर का ही कहना है कि देश की जीडीपी में कृषि का योगदान कम हो रहा है। खासकर पिछले दो तीन साल में। 2020-21 में जीडीपी में कृषि का योगदान 20.1 फीसदी था जो 2022-23 में गिरकर 18.3 फीसदी हो गया।

एनएसएसओ के 2018-19 के सर्वेक्षण के अनुसार किसानों की औसत आमदनी लगभग 10 हजार 261 रुपये प्रति महीने हैं जो कि 2012-13 के सर्वेक्षण के अनुसार 6426 रुपये प्रति महीने थी। इस हिसाब से किसानों की आय पिछले दस वर्ष के मुकाबले 60 से 70 प्रतिशत बढ़ी है। पर मुद्रा स्फीति की दर और इनपुट कॉस्ट की बात करें तो यह बढ़ोतरी कोई उपलब्धिपूर्ण नहीं कही जा सकती। हालांकि किसानों की आत्महत्या की घटनाओं में कमी आई है, पर अभी भी महाराष्ट्र, पंजाब और आंध्रप्रदेश में किसान परेशान होकर अपना जीवन समाप्त करते हैं। किसानों के लिए बहुत कुछ किए जाने के बाद भी अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

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