Vizhinjam Port Controversy: केरल में निर्माणाधीन अडानी पोर्ट से देश को होगा फायदा तो बवाल क्यों? जानें कहानी

देश के सबसे बड़े बंदरगाह प्रोजेक्ट, विझिंजम पोर्ट या अडानी पोर्ट आखिर क्यों विवादों में घिरता जा रहा है? जिसका निर्माण वर्ष 2019 तक हो जाना था वह 2023 तक भी बनकर तैयार होता नहीं दिख रहा है।

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Vizhinjam Port Controversy: केरल में बन रहा विझिंजम पोर्ट जिसे अडानी समूह बना रहा है, देश का सबसे बड़ा बंदरगाह प्रोजेक्ट है, लेकिन इसे लेकर अब विवाद पैदा हो गया है। लगभग 4 महीने से, स्थानीय मछुआरे इस पोर्ट के निर्माण में रोड़ा अटका रहे हैं, जिससे काम बार-बार रोकना पड़ रहा है। पर्यावरण के सारे मानकों को पूरा करने और NGT (National Green Tribunal) द्वारा निर्माण की स्वीकृति होने पर भी यह प्रोजेक्ट क्यों रोका जा रहा है? आखिर क्या है विवाद का कारण?

कौन बना रहा है पोर्ट को

केरल के तिरुवनंतपुरम के पास विझिंजम में अडानी ग्रुप और केरल सरकार की विझिंजम इंटरनेशनल सीपोर्ट लिमिटेड मिलकर एक नया पोर्ट बना रही है। यह प्रोजेक्ट पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर आधारित हैं। इस पोर्ट के निर्माण में 7,525 करोड़ रूपये की कुल राशि खर्च की जानी है, जिसमें 4,600 करोड़ रुपये केरल सरकार, 818 करोड़ रुपये केंद्र सरकार और बाकी बचा सारा खर्चा अडानी ग्रुप उठाएगा।

केरल के पोर्ट मंत्री अहमद देवारकोइल के अनुसार, विझिंजम पोर्ट को जनवरी 2014 में ही सभी तरह की अनुमतियाँ मिल गयी थी, जिसके बाद दिसंबर 2015 से यहाँ काम भी शुरू हो गया था। उस समय इसके 2019 तक पूरा होने का लक्ष्य रखा गया था, इस दौरान प्राकृतिक आपदाओं और कोरोना महामारी की वजह से काम प्रभावित हुआ।

मगर, बीते कुछ महीनों से स्थानीय विरोध-प्रदर्शनों ने इस पोर्ट के निर्माण को बाधित कर रखा है इसलिए अब दिसंबर 2023 तक निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, अडानी ग्रुप का कहना है कि इस समय सीमा तक भी इसका बनकर तैयार होना थोड़ा मुश्किल है।

आखिर क्यों हो रहा है विरोध?

इस पोर्ट को बनाने का विरोध तकीबन चार महीने से हो रहा है। स्थानीय मछुआरों का कहना है कि इस बंदरगाह के बनने से समुद्र के तटों का कटाव होगा और उससे उनकी आजीविका पर बुरा असर पड़ेगा। उनका कहना है कि इससे मछलियां मर जाएगी। प्रदर्शनकारियों ने बंदरगाह का काम रुकवाने समेत पुनर्वास और मुआवजे कैसे कई मांगें भी की हैं।

हालाँकि, इन मांगों के साथ-साथ, पिछले महीने, नवम्बर में यह मछुआरें हिंसक प्रदर्शन पर उतर गए थे। जिसके बाद पुलिस ने कुछ प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया, जिनकी रिहाई के लिए प्रदर्शनकारियों ने विझिंजम पुलिस थाने पर हमला बोल दिया। इस हमले में 36 पुलिसकर्मी घायल हो गए। इस मामले में पुलिस ने 3,000 से ज्यादा लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है।

सरकार है शर्त मानने को तैयार

केरल सरकार ने इस मामले पर एक कमेटी का गठन किया है। राज्य सरकार का कहना है कि वह पोर्ट का काम रोकने को छोड़कर बाकी सभी मांगें मानने को तैयार हैं। सरकार का दावा है कि मछुआरों के पुनर्वास के लिए 2,450 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं। गौरतलब है कि केरल के सभी राजनैतिक दल अडानी प्रोजेक्ट के पक्ष में है।

वहीं राज्य सरकार का कहना है कि समुद्र के कटाव और पर्यावरण हित में हर तरह के तकनीकी पक्ष सहित वैज्ञानिक सुझावों एवं जांच को आधार बनाकर ही पोर्ट का काम हो रहा हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने भी एक मॉनिटरिंग सेल का गठन किया हैं। जबकि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशियन टेक्नोलॉजी और नेशनल सेंटर फॉर अर्थ साइंसेस स्टडीज लगातार सारे पर्यावरणीय मानकों का शोध कर रहा है।

कैथोलिक चर्च के विरोध का क्या मतलब

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक अडानी पोर्ट का विरोध मछुआरे कर रहे हैं और इन प्रदर्शनों का नेतृत्व लैटिन कैथोलिक चर्च के आर्चबिशप थॉमस नेटो कर रहे हैं। वहीं आरोप यह भी है कि कुछ मछुआरों को बहला-फुसलाकर, गैर-सरकारी संगठनों और चर्च के माध्यम से पर्यावरण हितों का बहाना बनाकर, देश की प्रगति में बाधा डालने की कोशिश की जा रही हैं। दरअसल, पुलिस की एक FIR में चर्च के पादरियों के नाम आने पर ही प्रदर्शनकारियों ने थाने पर हमला किया था।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कुडनकुलम प्रोजेक्ट में भी इसी कैथोलिक चर्च ने विरोध प्रदर्शन किया था। कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट तमिलनाडु में बन रहा था। कुछ मीडिया के रिपोर्ट्स के अनुसार जो लोग कुडनकुलम प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे थे वही लोग अडानी पोर्ट का भी विरोध कर रहे हैं।

अडानी पोर्ट से देश को क्या होगा फायदा

इस पोर्ट के विझिंजम में बनाने का मुख्य कारण यह है कि यह अंतरराष्ट्रीय पूर्व-पश्चिम शिपिंग रूट से केवल 10 समुद्री मील दूर है। यह दूरी भारत के किसी भी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट की तुलना में बेहद कम है। इसके अलावा, भारत का तीन छोर समुद्र से लगता है। बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में एक भी ऐसा ट्रांसशिपमेंट पोर्ट नहीं है जहां बड़े कंटेनर जहाज (कार्गो जहाज) आ जा सकें। आज भी, भारत को दुनिया के कई देशों से सामान लाने और भेजने के लिए दूसरे देशों के ट्रांसशिपमेंट पोर्ट्स पर निर्भर रहना पड़ता है।

भारत को अगर कोई सामान विशाल कंटेनर जहाज द्वारा आयात करना होता है तो पहले बड़े कंटेनर जहाज को कोलंबो, सिंगापुर अथवा दुबई के ट्रांसशिपमेंट पोर्ट में डॉक करवाया जाता है, वहां से कंटेनर को छोटे जहाजों में लादकर भारतीय बंदरगाहों तक पहुँचाया जाता है। इससे माल ढुलाई का खर्चा अधिक बढ़ जाता है।

BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार वर्तमान में, प्रत्येक 20 फुट के कंटेनर के लिए 80 अमेरिकी डॉलर खर्च करती है। क्योंकि भारत में कहीं भी बड़ा जहाज जिसे 'मदर शिप' कहते हैं, उसे देश के किसी भी पोर्ट पर पार्क नहीं कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर, भारत सरकार देश से छोटे जहाजों में माल ढुलाई में, 3000 से 4000 करोड़ रुपया खर्च करती हैं।

अब अगर विझिंजम पोर्ट बन जाएगा तो कम समय के साथ साथ पैसे और सुरक्षा (इंश्योरेंस) पर लगने वाला खर्च बचेगा। इस पोर्ट का सामरिक महत्व भी है और हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में भारत का प्रभाव भी इस पोर्ट के कारण बढ़ेगा। शायद यही बात कुछ विदेशी ताकतों को पसंद नहीं आ रही है, और वे इस प्रोजेक्ट को रूकवाने की पूरी कोशिश कर रही हैं।

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