Pollution in Delhi: क्या प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली को बीजिंग से कुछ सीखना चाहिए?
Pollution in Delhi: वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुका है। मई 2022 में द लैंसेट पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 24 लाख मौतें प्रदूषण के कारण हो जाती हैं।

भारत में राजधानी दिल्ली एवं आसपास के इलाकों को मिलाकर जिस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की चर्चा अक्सर देश के सबसे प्रदूषित क्षेत्र के रूप में होती है, वह नेताओं के तमाम दावों एवं उपायों के बावजूद विश्व की सबसे प्रदूषित राजधानी बनी हुई है।
हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में वर्ल्ड ऑफ स्टैटिक्स संस्था ने 2021 में दस सबसे प्रदूषित राजधानियों की सूची में दिल्ली को सबसे ऊपर रखा है। जबकि बांग्लादेश की राजधानी ढाका दूसरे नंबर पर है। तीसरे स्थान पर चाड की राजधानी नदजामेना, चौथे पर ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे, पांचवें पर ओमान की राजधानी मस्कट, छठे स्थान पर नेपाल की राजधानी काठमांडू, सातवें स्थान पर बहरीन की राजधानी मनामा, आठवें स्थान पर इराक की राजधानी बगदाद, नौवें स्थान पर किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक और दसवें स्थान पर उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद को रखा गया है।
दिल्ली और एनसीआर में रहने वाले लोगों को लगभग पूरे वर्ष ही मानकों से ज्यादा प्रदूषण झेलना पड़ता है। लेकिन, सर्दी के महीनों में स्थिति सबसे खराब हो जाती है। इसके चलते पहले भी दिल्ली को दुनिया की सबसे ज्यादा प्रदूषित राजधानियों की सूची में शामिल किया जाता रहा है।
हालांकि, एक ऐसा भी वक्त था जब बीजिंग को दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर माना जाता था, जनवरी 2013 के सर्वे के मुताबिक बीजिंग की हवा सांस लेने योग्य नहीं थी। बीजिंग में स्मॉग के चलते आसमान नहीं दिखाई देता था। जहरीली हवा की वजह से स्कूलों को बंद करना पड़ता था और लोग मास्क लगाकर रहते थे। लेकिन चीन ने प्रदूषण से निजात पाने के लिए गंभीर इच्छाशक्ति दिखाई।
साल 2013 में बीजिंग ने वार्निंग सिस्टम अपनाया। नेशनल एयर क्वालिटी एक्शन प्लान लागू किया। सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही को कम किया। प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर भारी जुर्माना लगाया, तो लाखों गाड़ियों को जब्त भी किया। इसके अलावा बीजिंग में 500 मीटर चौड़े कॉरिडोर बनाए गए, जहां साफ हवा प्रवाहित की गई। उन कॉरिडोर के आसपास किसी भी तरह का कंस्ट्रक्शन नहीं होने दिया गया। कई स्थानों पर ऊंचे-ऊंचे एयर प्यूरीफायर बनाए गए, जिसने हवा में मौजूद डस्ट पार्टिकल्स को साफ करने में मदद की। वहीं ऑक्सीजन के लिए लाखों पेड़ लगाए गए।
बीजिंग के लोगों की जागरूकता ने भी सरकार को प्रदूषण के मामले में सक्रिय होने पर मजबूर कर दिया। कंपनियों को अब कचरे के बारे में जानकारी सार्वजनिक करनी पड़ती है। प्रदूषण नियमों का उल्लंघन करने वालों के नाम भी सार्वजनिक किए जाते हैं। चीन की सरकार ने बीजिंग में कार्बन उत्सर्जन कम करने पर बेहद जोर दिया। बीजिंग में कोयला जलाने पर सख्ती से रोक लगाई गई। कोयले की खदानों को बंद किया गया, तथा सीमेंट और स्टील के उत्पादन पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई।
बीजिंग की तरह दिल्ली में भी जरूरी है कि सड़कों पर प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर सख्ती से कार्रवाई हो। सड़कों पर निजी वाहनों की आवाजाही कम करने के लिए लोगों में सार्वजनिक परिवहन के प्रति जागरुकता बढ़ाना जरूरी है। हालांकि, दिल्ली में जितनी बसें होनी चाहिए, उतनी बसें सड़कों पर नहीं दौड़ रही हैं।
प्रदूषण से निपटने के प्रयास और विफलताएं
दिल्ली की हवा में बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए इससे होने वाली बीमारी के इलाज के लिए दिल्ली सरकार जल्द ही यहां के प्रमुख अस्पतालों में प्रदूषण क्लीनिक खोलेगी। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया कि सरकार पायलट प्रोजेक्ट के तहत दिसंबर तक अपने अधिकार क्षेत्र के सभी प्रमुख अस्पतालों में योजना शुरू करेगी। जिससे ठंड के दौरान राजधानी में खराब हवा की गुणवत्ता के कारण बीमारी होने वाले लोगों का बेहतर ढंग से इलाज किया जा सके।
हालांकि, दिल्ली सरकार ने अभी तक जितनी भी योजनाएं बनाई है, वह प्रदूषण को रोकने में पर्याप्त नहीं रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्रदूषण को रोकने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा उठाए गए कुछ कदम इस प्रकार हैं।
पराली प्रबंधन
पराली के जलने से निकले धुएं को दिल्ली में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बताया जाता है। हालांकि, दिल्ली सरकार ने पूसा के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पराली को खेतों में ही नष्ट करने की योजना तैयार की। इससे राजधानी के किसानों ने पराली को जलाने की बजाय खेतों में ही गलाने का उचित उपाय अपनाया। चूंकि, दिल्ली में कृषि योग्य भूमि और किसानों की संख्या बेहद कम है, यह उपाय बेहद सीमित रहा। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों के किसान अभी भी पराली को खेतों में ही जला रहे हैं, जिनसे निकला धुंआ राजधानी की हवा को जहरीला बना रहा है।
निर्माणस्थलों पर धूल रोधी उपाय
दिल्ली सरकार ने बड़े-बड़े निर्माण स्थलों पर एंटी डस्टिंग गन लगाने का फैसला किया। नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माना भी लगाने का प्रावधान किया गया। लेकिन इसका बहुत अधिक असर नहीं हो रहा है। कहा जाता है कि दिल्ली सरकार के इन उपायों का केवल बड़े निर्माण स्थलों तक सीमित होना, छोटे-छोटे निर्माण स्थलों पर कोई उपाय न होना और निजी वाहनों की सड़क पर अधिकता के कारण यह उपाय बहुत कारगर नहीं हो पा रहा है।
ई-वाहन और सीएनजी को बढ़ावा
दिल्ली सरकार ने ई-वाहनों का चलन बढ़ाने का प्रयास किया। सरकार की कोशिश है कि 2025 तक निकलने वाले सभी वाहनों में न्यूनतम 25 फीसदी ई-वाहन हों, जिससे प्रदूषण स्तर में कमी आए। इसके लिए ई-वाहनों की खरीद और पंजीकरण में भारी छूट के साथ कई कार्यक्रम भी शुरू किए गए। लेकिन राजधानी में ई-वाहनों के चार्जिंग स्टेशनों की कमी, ई-वाहनों के बेहद महंगे होने, इन्हें ज्यादा दूर तक न ले जा सकने और पेट्रोल-डीजल वाहनों के मुकाबले उनकी कम क्षमता के चलते यह उपाय ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया।
यमुना स्वच्छता कागजों तक सीमित
सीवर और फैक्ट्रियों के गंदे पानी से दिल्ली में एक नाले का रूप धारण कर चुकी यमुना भी प्रदूषण का बड़ा कारण बन गई है। दिल्ली सरकार ने लगभग आधा दर्जन नए एसटीपी प्लांट्स लगाने, यमुना में गंदे जल को गिरने से रोकने और यमुना की साफ-सफाई के कई दावे किये हैं। लेकिन यमुना में बहता गंदा पानी इस बात का प्रमाण है कि यमुना स्वच्छता के उपाय कागजी ही साबित हुए हैं।
हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए जगह सीमित
दिल्ली सरकार ने राजधानी में वृक्षारोपण का कार्यक्रम शुरू किया। इसके अंतर्गत करोड़ों रुपयों की लागत से लाखों पेड़ लगाने का कार्यक्रम किया गया। सरकार ने दावा किया कि उसके उपाय से दिल्ली का हरित क्षेत्र बढ़ा है। लेकिन सच्चाई यही है कि दिल्ली में हरित क्षेत्र और खुली भूमि की भारी कमी है। हर जगह भवनों-सड़कों के निर्माण के कारण वृक्षारोपण के लिए ज्यादा संभावना नहीं है।
स्मॉग टावर की सीमित क्षमता
दिल्ली सरकार ने हवा को सांस लेने योग्य बनाने के लिए जगह-जगह पर स्मॉग टावर लगाने की योजना शुरू की। सरकार ने कनॉट प्लेस में ऐसे ही स्मॉग टावर का निर्माण कराया। लेकिन इन स्मॉग टावर्स की क्षमता बेहद सीमित होती है।
एनसीआर के उद्योगों पर लगाम नहीं
दिल्ली की हवा को साफ करने के लिए यहां से प्रदूषणकारी उद्योगों को बाहर निकाल दिया गया। लेकिन ये सभी उद्योग दिल्ली के आसपास नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम में स्थापित हो गए। दिल्ली से सटे होने के कारण यहां से हटाए गए उद्योग आज भी दिल्ली की हवा को प्रदूषित कर रहे हैं।
सीमित सार्वजनिक वाहन
वाहनों से निकलने वाला धुआं प्रदूषण का बड़ा कारण होता है। निजी वाहनों का प्रयोग कम करके इस समस्या को कम किया जा सकता है। लेकिन सार्वजनिक वाहनों की कमी के चलते लोग निजी वाहनों का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। 'रेड लाइट ऑन, गाड़ी ऑफ' जैसे अभियान का व्यापक असर नहीं हो पाया। साथ ही गाडियों के लिए ऑड-इवन योजना भी एक इवेंट बनकर रह गई।
हालांकि, सरकार प्रदूषण से निपटने के लिए तरह-तरह की योजनाएं ला रही है। इस वर्ष के सितंबर महीने में सरकार 15 सूत्री विंटर एक्शन प्लान लेकर आई, पर दिल्ली में प्रदूषण को नियंत्रित करने में ये योजनाएं कागजी साबित हो रही हैं।
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