Water Crisis: वह दिन दूर नहीं जब खेत को नहीं मिलेगा पानी
प्रगति के बावजूद हम जल संबंधी सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) को पूरा करने में पीछे हैं। वर्ल्ड बैंक के आकलन के अनुसार 2030 तक, 1.6 अरब लोगों को साफ़ और सुरक्षित रूप से पानी नहीं मिलेगा, 2.8 अरब लोगों को स्वच्छ वातावरण नहीं मिलेगा और 1.9 अरब लोगों के पास हाथ को स्वच्छ रखने की सुविधा नहीं मिलेगी।
वर्ल्ड बैंक ने अगस्त 2023 में लिखे एक ब्लॉग में कहा है कि बेहतर जल प्रबंधन के लिए निवेश, नवाचार, सूचना और संस्थान की बड़ी भूमिका होगी। साथ ही जल क्षेत्र के लिए सार्वजनिक और निजी वित्त के सहयोग में भारी वृद्धि की आवश्यकता है। विश्व बैंक के अनुसार जल क्षेत्र के लिए $1.37 ट्रिलियन डॉलर से अधिक निवेश की जरूरत है। इसे वर्तमान स्तर से छह गुना बढ़ाना होगा।

जल निवेश बढ़ाने से लोग स्वस्थ रहेंगे और बेहतर जल भंडारण से निरंतर वित्तीय लाभ प्राप्त होंगे। वर्ल्ड बैंक इस समय 85 लाख हेक्टेयर भूमि पर बेहतर सिंचाई सुविधा देने की योजना पर काम कर रहा है, जिसमें एशिया में खेत से मीथेन-कम करने और पानी बचाने वाले धान की संभावित प्रतिकृति से 80 लाख किसानों को बेहतर तकनीक अपनाने में मदद का कार्यक्रम भी शामिल है। वर्ल्ड बैंक दक्षिणी अफ्रीका में 25 मिलियन लोगों के लिए बाढ़ और सूखे के जोखिम को कम करने पर भी काम कर रहा है। इसके लिए वर्ल्ड बैंक विकास क्षेत्र और सरकारों से 50 बिलियन डॉलर तक का निवेश जुटाने का प्रयास कर रहा है।
वर्ल्ड बैंक ने यह चेतावनी भी दी है कि अगर जल संरक्षण के प्रति हम अभी जागरूक नहीं हुए तो वह दिन दूर नहीं है कि जब खेतों को सिचाई के लिए और आदमी को साफ पानी पीने को नहीं मिलेगा।
पृथ्वी पर पानी के आंकड़े
एक अनुमान के अनुसार पृथ्वी पर 1.386 बिलियन क्यूबिक किमी. पानी है। पृथ्वी का 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढ़का हुआ है। 1.6 प्रतिशत पानी जमीन के नीचे और लगभग 0.001 प्रतिशत वाष्प व बादलों के रूप में है। पृथ्वी पर उपलब्ध कुल पानी का 97 प्रतिशत सागरों व महासागरों में है, जो नमकीन है और पीने योग्य नहीं है। यानी पृथ्वी पर कुल 3 प्रतिशत पानी ही पीने योग्य है। इस 3 प्रतिशत में से भी 2.4 प्रतिशत पानी ग्लेशियरों और उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव में जमा हुआ है। केवल 0.6 प्रतिशत पानी ही नदियों, झीलों, तालाबों में और भूजल है। यही पानी पृथ्वी के जीवों की प्यास बुझाता है और कृषि सिंचाई में प्रयोग होता है। दुनिया भर में लगभग 70 प्रतिशत ताजे पानी का उपयोग कृषि सिंचाई में होता है।
क्यों है जल संकट
जल संकट से तात्पर्य है कि किसी क्षेत्र के अंतर्गत जल उपयोग की मांगों को पूरा करने हेतु उपलब्ध जल संसाधनों की कमी होना है, यानी उस क्षेत्र में ताजा पेयजल व कृषि हेतु जल की आवश्यक आपूर्ति न होना ही जल संकट है। जनसंख्या वृद्धि के चलते खाद्य आपूर्ति को पूरा करने हेतु इस जल के उपयोग में लगातार वृद्धि हो रही है। खाद्य आपूर्ति हेतु जल के अधिक उपयोग, कमजोर मानसून और पानी का उचित संरक्षण न होने के कारण पेय जल व ताजे पानी का संकट उत्पन्न हो रहा है। जल संकट से कतर, इजराइल, लेबनान, ईरान, जॉर्डन, लीबिया, कुवैत, सऊदी अरब, इरीट्रिया, संयुक्त अरब अमीरात, भारत, पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ओमान, बोत्सवाना आदि देश सर्वाधिक ग्रसित है।
भारत में जल संकट
भारत में वर्ष 1994 में पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 6000 घन लीटर थी, जो वर्ष 2000 में 2300 घनमीटर और वर्ष 2025 तक 1600 घनमीटर रहने का अनुमान है। भारत में मुख्यतः दक्षिणी और उत्तर-पश्चिमी भागों में जल संकट है, क्योंकि यहां कम वर्षा होती है। भारत में मानसून की अस्थिरता भी जल संकट के लिए जिम्मेदार है। इसके साथ भारत में अधिकतर कृषि उत्पादन ऐसे हैं जिनमें अधिक जल की आवश्यकता होती है, जैसे- चावल, गेहूँ, गन्ना इत्यादि। ये कृषि उपज भी जल संकट के महत्वपूर्ण कारक हैं।
भारतीय शहरों, कस्बों इत्यादि में जल संसाधन के पुर्नप्रयोग (रिसाइकल) न होने से भी जल संकट उत्पन्न हो रहा है। क्योंकि शहरों या कस्बों में अधिकतर जल के पुर्नप्रयोग के बजाय उसे सीधे नदी नालों में बहा दिया जाता है।
जल संकट से उत्पन्न समस्या
जल संकट के चलते जीवन में अनेक समस्याएं उत्पन्न हो जाती है। जल संकट के चलते खाद्य असुरक्षा उत्पन्न हो जाती है, क्योंकि जल खाद्य सुरक्षा की कुंजी है। खाद्य उत्पादन हेतु कृषि क्षेत्र में जल की पूर्ति न होने से खाद्य असुरक्षा उत्पन्न होती है। जल संकट के चलते आदमी की आजीविका भी प्रभावित होती है और वह दूसरे स्थान पर पलायन के लिए मजबूर हो जाता है। वहीं देश की आर्थिक प्रगति भी जल संकट से प्रभावित होती है। इसके अलावा जैव विविधता को नुकसान होती है और जल संकट के कारण हिसंक घटनाएं भी होती है जिससे चलते कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है। भारत के लातूर जिले (महाराष्ट्र) में जल संकट से उत्पन्न हुई हिसंक घटनाओं के मददेनजर राज्य सरकार को वहां धारा 144 लगानी पड़ी थी।
जल संकट के निवारण हेतु कुछ कार्य
जल संकट के निवारण हेतु केंद्र सरकार, राज्य सरकारों के प्रयास के साथ-साथ आमजन को भी प्रयास करने होंगे, तभी जल संकट की समस्या को दूर किया जा सकता है। जल संकट को दूर करने के कुछ कार्य निम्न हैं -
1. जल का उचित व संयमित उपयोग करना चाहिए।
2. उद्योगों में पानी का चक्रीय उपयोग हो, यानि प्रयोग होने वाले पानी का पुनः प्रयोग हो।
3. इस्तेमाल पानी का शौचालयों, बगीचों इत्यादि में प्रयोग हो।
4. जल का सदुपयोग हेतु जन-जागरूकता बढ़ायी जाए।
5. वर्षा जल का संग्रहण हो। जैसे- टैंकों, तालाबों और चेक-डैम आदि द्वारा जल संग्रहण किया जा सकत है।
6. नदियों को आपस में जोड़ना, क्योंकि जहां बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है, तो नदियों द्वारा कम जल क्षेत्रों अथवा सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जल आपूर्ति की जा सके और जल संकट की समस्या दूर हो।
7. विभिन्न जलाशयों का निर्माण करके जल संग्रह करना और उसे उपयोग कृषि सिंचाई या अन्य उपयोग में करना।
8. कृषि में अधिक सिंचाई वाली फसल के बाद कम सिंचाई वाली फसल उत्पादन करें।
9. कृषि सिंचाई में टपकन टैंक/ड्रिप सिंचाई के उपयोग द्वारा जल संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सकता है।
10. कम जल वाले क्षेत्रों में कम सिंचाई वाली फसल की पैदावार की जाए।
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