अब तो 'इनके' दर्शन दुर्लभ

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गिद्धों की संख्या ही नहीं, उनकी प्रजात‍ि, उनके अस्त‍ित्व, उनकी जिन्दगी पर भी बेहद सोचने की जरूरत है। भारत में इनकी नौ प्रजात‍ियां हैं, जिनमें से कई अब सिर्फ दूर के आइने की तरह हो गईं हैं। इनके बारे में चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया कि आज से बीस साल पहले इनकी संख्या डेढ़ सौ थी। पांच साल बाद पच्चीस रह गई। अफसोस अब सम्बंध‍ित प्रजात‍ि लगभग् खत्म् हो गई है। बंबई की नेच्युरल ह‍िस्ट्री सोसाइटी के जीव वैज्ञान‍िक विभु प्रकाश कहते हैं ' कि 1987 में व्हाइट बैकड गिद्धोंं की संख्या 350 थी। इनका ठिकाना राजस्थान का कोलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान था। 1996 की खोज में उन्होने पाया कि संख्या आधी से भी कम रह गई है। 1999 में तो यह एकदम विलुप्त हो गई।

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भारतीय प्रजात‍ियों में व्हाइट बैक्ड, लांग बिल्ड, स्लेंडर प्रजात‍ियां लगभग खत्म हो चुकी हैं। अंतर्राष्ट्रीय प्राक्रत‍िक संरक्षण संस्था ने इन्हें सबसे खतरनाक व विलुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में शाम‍िल कर दिया है। राजस्थान में भी गिद्धों से जुड़ी एक रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट में इस बात पर चिन्ता व्यक्त की गई है कि राजस्थान में गिद्धों पर संकट है। उनकी संख्या केवल 3907 शेष बची है। प्रदेश के मुख्य जीव प्रतिपालक आर एन मेहरोत्रा का मानना है कि गिद्ध अब पश्चिमी राजस्थान में ही बचे है।

उन्हें पूर्वी राजस्थान में गिद्व दिखाई ही नहीं देते है। गिद्धों को प्रकृति का सफाईकर्मी माना जाता है. इनके लिए अनुकूल परिस्थितियों के नहीं मिलने से इनके प्रजनन में भी कमी आ रही है. वही इनके जीवन पर भी संकट है। उनका मानना है कि जोधपुर रेस्क्यू सेंटर के लिए श्रेष्ठ स्थान है। जहाँ गिद्व प्रजाति को बचाने के लिए तमाम सुविधाओं से युक्त सेन्टर खोला जाना प्रस्तावित किया है।

सवाल यह है कि गिद्धों को बचाने के लिए राजस्थान में गिद्धों के संवर्धन का सेन्टर जोधपुर में क्यों खोला जा रहा है। शायद इसलिए क्योंकि अशोक गहलोत मुख्यमंत्री है और वे जोधपुर से है। उनके कार्यकाल में सब कुछ जोधपुर की ओर ही जा रहा है। ऐसे में गिद्धों के संवर्धन का रेस्क्यू सेन्टर भी जोधपुर में बनने जा रहा है. सवाल यही है पूर्वी राजस्थान में हजारों की तादाद में गिद्ध रहते थे, बेचारे मर खप गये किसी ने कुछ नहीं सोचा। पश्चिमी में कुछ हुआ तो रेस्क्यू सेन्टर बनने लगा, वो भी जोधपुर में।

वर्ष 2009 में हमने बताया था कि पूर्वी राजस्थान में हजारों गिद्ध एक बार फिर से वापिस लौट आये है। अब भी सरिस्का अभ्यारण सहित गामीण इलाकों में गिद्वों के होने की बातें की जा रही है। लेकिन सरकारी मशीनरी को तो सब कुछ पश्चिमी राजस्थान में ही दिखाई दे रहा है।

रिपोर्ट भी बातें वही की कर रही है। पूर्वी राजस्थान में भरतपुर जिले का बयाना कस्बे की पहाडिया लौग बिल्ड प्रजाति के गिद्वों के लिए प्रसिद्व रही है। जहाँ हजारों की संख्या में ये गिद्व दिखाई पड जाते थे। इतना ही नहीं भरतपुर में विश्व प्रसिद्व पक्षी विहार भी है।

जो ऐसे रेस्क्यू सेन्टर के लिए एक उपयुक्त स्थान हो सकता है। इस पक्षी विहार में पानी के अभाव में वीरानी छाई है। इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। गिद्वों के उपर संकट आया। इस संकट के पीछे भी इंसान ही रहा। मृत पशुओं का चमडा उतारने के काम आने वाले रसायन इनके लिए आफत बने तो साथ ही पशुओं से दूध निकालने के लिए काम में ली जाने वाली प्रतिबंधित डाइक्लोफिन दवा भी खुले आम बिकती है। जो कि इन गिद्धों के लिए हानिकारक है।

बहरहाल, मुख्यमंत्री जी के प्रशंसक गिद्ध रेस्क्यू सेन्टर को जोधपुर में स्थापित करके चाहे तो मुख्यमंत्री को भले ही खुश कर लें लेकिन राज्य में गिद्धों की गिरती तादात बदस्तूर चिंता का विषय बनी हुई है।

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