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Chhatrapati Shivaji: दूरदर्शी शिवाजी ने ही फारसी के स्थान पर मराठी और संस्कृत का प्रचलन बढ़ाया

2023-24 में छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का 350वां वर्ष मनाया जायेगा। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार आज ही के दिन उनका राज्याभिषेक 1674 में हुआ था।

Visionary Shivaji increased the prevalence of Marathi and Sanskrit in place of Persian

ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 6 जून 1674 को छत्रपति शिवाजी को रायगढ़ किले में एक भव्य समारोह में मराठा साम्राज्य के राजा का ताज पहनाया गया था। इसके लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा शिवराज्याभिषेक समारोह के लिए 1 से 7 जून तक विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। आज हम आपको छत्रपति शिवाजी से जुड़े कुछ रोचक तथ्य बताएंगे। जिसके बारे में बेहद कम लोग ही जानते होंगे।

शिवाजी का जन्म और मराठा साम्राज्य का उदय
शाहजी भोंसले और उनकी पत्नी जीजा बाई के दो पुत्र (शंभूजी और शिवाजी) हुए। कम उम्र में ही शंभूजी की मृत्यु हो गई। शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेर के पहाड़ी किले में हुआ था, जो पूना (अब पुणे) जिले के उत्तर में जुन्नार शहर के ऊपर स्थित है। उनकी मां ने स्थानीय देवी, शिवई देवी से अपने बेटे की रक्षा के लिए प्रार्थना की थी, और इसलिए उन्होंने उस देवी के नाम अपने बेटे का नाम शिवा रख दिया। इसके बाद 12 साल की उम्र में सन 1641-42 में शिवाजी पुणे आ गये।

विजयी शिवाजी और उनका मराठा साम्राज्य
1746 में सबसे पहले शिवाजी महाराज ने पुणे के पास तोरण दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। इसके बाद शिवाजी ने अपने पूरे जीवनकाल में कम से कम 240 किलों और गढ़ों को जीता था। साथ ही बहुत से किलों का निर्माण भी करवाया था। शिवाजी महाराज ने दुर्गम पहाड़ियों और चट्टानी द्वीपों की किलेबंदी कर उन जगहों को निवास स्थान बनाया और मराठा साम्राज्य को बढ़ाया। एक कुशल सैनिक और राजा के रुप में उनकी महानता पर कोई संदेह नहीं कर सकता है। भारत में गुरिल्ला युद्ध के वह जनक माने जाते है।

राज्याभिषेक का महत्व (6 जून 1674 - ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी)
शिवाजी का राज्याभिषेक भारतीय इतिहास की एक असाधारण घटना है। आम धारणा यह थी कि मुगल बादशाह भारत की संप्रभुता का प्रतिनिधित्व करते थे। मुगलों के साथ की गई संधि भारत के साथ की गई संधि मानी जाती थी।

वहीं शिवाजी के पास कहने को तो कई मंत्री, मजबूत सेना और नौसैनिक, हाथी-घोड़े और किले और प्रजा सब थी लेकिन उन्होंने महाराजा की उपाधि धारण नहीं की थी। वहीं मुगल बादशाह खासकर औरंगजेब के लिए वह एक जमींदार थे। आदिल शाह (बीजापुर के सातवें शासक) के लिए छत्रपति शिवाजी एक जागीरदार के विद्रोही पुत्र थे। इसलिए वह किसी भी राजा के साथ राजनीतिक स्थिति की समानता का दावा नहीं कर सकते थे।

इसी को लेकर गजानन भास्कर मेहेंदले अपनी किताब 'शिवाजी हिज लाइफ एंड टाइम्स' में लिखते हैं कि आम जनता की नजर में शासन में स्थिरता और व्यापकता की मांग को समझते हुए शिवाजी ने राज्याभिषेक का फैसला लिया। 6 जून 1674 को शिवाजी महाराज ने रायगढ़ के किले में 'छत्रपति' की पदवी ग्रहण की, राज्याभिषेक करवाया और एक संप्रभु मराठा साम्राज्य की स्थापना की।

शिवाजी ने की स्वराज्य की स्थापना
छत्रपति शिवाजी महाराज ने एक शानदार प्रशासन की नींव रखी थी। उन्होंने ही राज्य को अपना झंडा और मुहर दिया था। उन्होंने अपने क्षेत्र में कानून को सर्वोपरी माना था। शिवाजी के स्वराज्य प्रशासन के कुछ प्रमुख सिद्धांत थे।

  • अपने लोगों की भलाई और राज्य में कल्याणकारी योजनाओं को बढ़ावा देना।
  • स्वराज्य की रक्षा के लिए एक कुशल सैन्य बल बनाये रखना।
  • कृषि और उद्योग को प्रोत्साहन देकर लोगों की आर्थिक आवश्यकताओं की पर्याप्त पूर्ति करना।

संस्कृत और मराठी भाषा को बढ़ाया: शिवाजी महाराज ने भाषा के सुधार के लिए कई काम किये। उन्होंने अपने काल में फारसी शब्दों को संस्कृत शब्दों से बदलने के लिए एक शब्दकोश बनाने का आदेश दिया था। यहां तक शिवाजी महाराज ने अपनी राजशाही मुहर जो उस जमाने में सिर्फ फारसी में हुआ करती थी, उन्होंने उसे संस्कृत भाषा में करवा दिया।

साथ ही अपनी राजभाषा के रूप में शिवाजी ने फारसी और उर्दू को प्राथमिकता न देकर मराठी की शुरुआत की, जबकि मुस्लिम शासकों ने अपने शासन के निशान के रूप में फारसी भाषा को लागू किया था। यह उत्कृष्ट कार्य रघुनाथपंत हनुमंते के कुशल निर्देशन में विभिन्न विद्वान पंडितों द्वारा संपन्न किया गया था, जिनमें से एक धुंडीराज लक्ष्मण व्यास का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।

शिवाजी ने विदेशी फारसी भाषा के प्रभाव को दूर करने के लिए एक शब्दकोष के संकलन का आदेश दिया। जिसमें फारसी शब्दों को हटा दिया गया था, जो संस्कृत के द्वारा स्वदेशी शब्दकोश में शामिल हो गये थे।

सिक्कों का निर्माण: शिवाजी महाराज ने अपने शासनाकाल में रॉयल्टी के प्रतीक चिन्हों और नये सिक्कों को चलवाया था। ताकि मुगल साम्राज्य के चिन्हों और सिक्कों से भारत की पहचान न बनें और उसका प्रसार रोक सकें।

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