Veer Savarkar Jayanti: विनायक दामोदर सावरकर कैसे बने 'वीर सावरकर', जानिए उनके नाम से जुड़ी अनसुनी कहानी
नई दिल्ली। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारियों में से एक विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) की आज 134वीं जयंती है। उन्हें 'वीर सावरकर' के नाम से जाना जाता है। वीर सावरकर न केवल स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने के लिए जाने जाते हैं, बल्कि वह एक लेखक और अधिवक्ता भी थे। वीर सावरकर का नाम आज भी बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि विनायक दामोदर सावरकर को वीर सावरकर क्यों कहा जाता है?

उनके नाम के आगे 'वीर' जुड़ने के पीछे एक कहानी जुड़ी है। जानकारी के मुताबिक सावरकर को एक कलाकार ने वीर की उपाधि दी थी। इस कलाकार को स्वयं सावरकर आचार्य कहकर पुकारा करते थे। बाद में फिर लोगों ने दोनों को ही इन उपाधि के साथ संबोधित करना शुरू कर दिया। दरअसल हुआ ये था कि कांग्रेस के साथ एक बयान को लेकर सावरकर को पार्टी से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया था। उनका हर जगह विरोध किया जाता था। हालांकि ऐसे कठिन समय में सावरकर का साथ नाटक और फिल्म कलाकार पीके अत्रे ने दिया।
अत्रे ने सावरकर के लिए पुणे स्थित अपने बालमोहन थिएटर में एक स्वागत कार्यक्रम का आयोजन किया था। उस समय इस कार्यक्रम का कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने विरोध किया और सावरकर के खिलाफ पर्चे बांटने के साथ ही काले झंडे दिखाए जाने तक की धमकी दी। लेकिन इस विरोध के बाद भी सावरकर का स्वागत कार्यक्रम हुआ और हजारों की संख्या में लोग कार्यक्रम में शामिल हुए। इस कार्यक्रम के दौरान ही अत्रे ने सावरकर को वीर की उपाधि दी। जो आज तक विनायक दामोदर सावरकर के नाम के आगे जुड़ती है।
जब इस कार्यक्रम का आयोजन हो रहा था, तब कांग्रेस कार्यकर्ता बाहर हंगामा कर रहे थे। तभी अत्रे ने भाषण देते हुए कहा कि सावरकर निडर हैं। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति काला पानी की सजा तक से नहीं डरा, वो काले झंडों से क्या डरेगा। उसी दौरान अत्रे ने सावरकर को 'स्वातंत्र्यवीर' की उपाधि दी। इसी उपाधि के बाद विनायक दामोदर सावरकर को 'वीर सावरकर' के नाम से जाना जाने लगा।












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