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US visit by Nehru: कैसी रही थी प्रधानमंत्री नेहरू की पहली अमेरिका यात्रा, जानें उस यात्रा के बारे में

US visit by Nehru: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के राजकीय दौरे पर है। उनकी इस यात्रा पर दुनियाभर की नजरें हैं। पीएम मोदी अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन से लेकर वहां के उद्योगपतियों और शिक्षाविदों आदि से मिल रहे हैं। अमेरिका की यात्रा पर जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी भारत के 9वें प्रधानमंत्री है। अमेरिका की यात्रा पर जाने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे। उन्होंने चार बार अमेरिका की यात्रा की थी। इनमें पहली यात्रा देश की आजादी के मात्र दो साल बाद यानी साल 1949 में की। प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा की चर्चाओं के बीच आइए आपको प्रधानमंत्री नेहरू की पहली अमेरिका यात्रा के बारे में बताते हैं।

नेहरू की पहली अमेरिका यात्रा और परिस्थितियां

पंडित नेहरू की यह यात्रा अक्टूबर-नवंबर 1949 में हुई थी। उस समय परिस्थतियां ऐसी थी कि भारत करीब 2 साल पहले ही आजाद हुआ था। ऐसे में देश के सामने ढेरों चुनौतियां थीं। दूसरी ओर विश्व में शीत युद्ध शुरू हो चुका था। सोवियत संघ (वर्तमान रूस) और अमेरिका, दुनियाभर में देशों को अपने-अपने पाले में खींचने की कोशिश कर रहे थे। भारत पर भी सबकी नजर थी। ऐसे में प्रधानमंत्री नेहरू की पहली अमेरिका यात्रा काफी महत्वपूर्ण बन गई थी।

US visit by Nehru: How was Prime Minister Nehrus first visit to America?

प्रधानमंत्री नेहरू की यह यात्रा खाद्य सहायता के अलावा चीन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण थी। उनके अमेरिका पहुंचने से ठीक दो हफ्ते पहले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई थी। ट्रूमैन लाइब्रेरी इंस्टीट्यूट के ब्लॉग पोस्ट ने दावा किया कि अमेरिका उस समय भारत को साम्यवादी चीन के संभावित "लोकतांत्रिक और पूंजीवादी प्रतिपक्ष" के रूप में देखता था।

अमेरिका में गर्मजोशी से स्वागत

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 11 अक्टूबर 1949 को अमेरिका पहुंचे थे। वहां उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया। वाशिंगटन हवाईअड्डे पर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस. ट्रूमैन ने उनका स्वागत किया था। 'सद्भावना यात्रा' के रूप में प्रचारित इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नेहरू ने अमेरिका में तीन सप्ताह से ज्यादा समय बिताया। उन्होंने सदन और सीनेट के सदस्यों से मुलाकात की। शिकागो और न्यूयॉर्क जैसे महानगरों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में टेनेसी घाटी और इलिनोइस जैसी जगहों की यात्राएं भी कीं। व्यवसायियों, कारीगरों और शिक्षाविदों के साथ समान रूप से बातचीत की। प्रधानमंत्री नेहरू की इस यात्रा से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों की शुरुआत हुई थी।

मुलाकातें और संबोधन

प्रधानमंत्री नेहरू ने अमेरिकी सरकार के पदाधिकारियों से लेकर वहां के छात्रों समेत ढेरों लोगों से मुलाकात की थी। कई जगह लोगों को संबोधित किया। 12 अक्टूबर, यानी यात्रा के दूसरे दिन प्रधानमंत्री नेहरू ने अमेरिका के राज्य-सचिव डीन एचिसन से मुलाकात की। उनसे भारत में खाद्यान्न संकट, कश्मीर के साथ-साथ वियतनाम, इंडोनेशिया और चीन के संबंध पर बात की। 13 अक्टूबर को नेहरू ने राष्ट्रपति ट्रूमैन से बातचीत की और अमेरिकी संसद के दोनों सदनों को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने भारत-अमेरिका संबंधों और अमेरिका के संविधान से दुनियाभर को मिलने वाली प्रेरणा का उल्लेख किया।

15 अक्टूबर को 'न्यू इंडिया हाउस' में भारतीयों के साथ प्रधानमंत्री नेहरू की पहली मुलाकात हुई। यहां उन्होंने अपने संबोधन में आजाद हिंदुस्तान द्वारा गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाने पर बल दिया। भारत-अमेरिका के बीच परस्पर सहयोग बढ़ाने के साथ नेहरू ने वहां मौजूद भारतीयों से देशसेवा करने की भी अपील की। 15 अक्टूबर को ही उन्होंने मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में दस विश्वविद्यालयों से आए हुए भारतीय मूल के छात्रों को संबोधित किया। साथ ही कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, वेलेजली कॉलेज समेत अनेक अमेरिकी विश्वविद्यालयों में छात्रों को संबोधित किया। 27 अक्टूबर को शिकागो यूनिवर्सिटी में भाषण के दौरान 20वीं सदी के लिए महात्मा गांधी के विचारों की महत्ता पर जोर दिया।

प्रधानमंत्री नेहरू की इस यात्रा से क्या हासिल हुआ?

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की इस पहली अमेरिका यात्रा से द्विपक्षीय संबंधों में एक नया अध्याय शुरू हुआ। इसके अलावा उन्होंने अमेरिका से खाद्य सहायता की प्रतिबद्धताओं को सुरक्षित करने की मांग की। कहा जाता है उनके दिमाग में साल 1943 के बंगाल अकाल की तस्वीर थी, जिसे देखते हुए उन्होंने अमेरिका से यह मांग की थी। प्रधानमंत्री नेहरू की इस मांग चलते कुछ रिपोर्ट्स में उनकी इस यात्रा को 'फेल' करार दिया गया। क्योंकि अमेरिका ने आर्थिक सहायता देने से इनकार कर दिया था। इस यात्रा पर खाद्य सहायता के लिए प्रतिबद्धताएं ठोस नहीं थीं, लेकिन भारत और अमेरिका ने अंततः दो साल बाद दो मिलियन टन गेहूं के लिए एक ऋण सौदा किया।

दूसरी ओर विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रधानमंत्री नेहरू की पहली अमेरिका यात्रा महत्वपूर्ण थी। इसमें किसानों के साथ उनकी एक बैठक का काफी महत्व है। साल 2018 में प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी ट्रूमैन लाइब्रेरी इंस्टीट्यूट में प्रकाशित एक ब्लॉग पोस्ट में उल्लेख किया गया है कि इलिनॉइस की फॉक्स रिवर वैली में नेहरू ने तीन परिवारों के खेतों का दौरा किया। वहां वे गैस से चलने वाले स्टोव, मक्का बीनने वाली मशीन और दूध निकालने वाली मशीनों के बारे में जानकर हैरान रह गये। इसकी बड़ी वजह यह थी कि ये चीजें भारत में खेती के विपरीत थीं, क्योंकि तब देश में मुख्य रूप से हाथ से खेती की जाती थी। इस यात्रा से नेहरू ने अमेरिकी दृष्टिकोण की बहुत गहरी समझ और अपने राष्ट्र के लिए समर्थन हासिल किया।

भारत के प्रति कूटनीतिक दृष्टिकोण

अमेरिका के ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट की 'द ओरिएंटेशन इन द ओरिएंट' शीर्षक से आई रिपोर्ट में कहा गया था कि वाशिंगटन भारत को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बिल्कुल नहीं मानता था। रिपोर्ट में कहा गया था कि उस समय अमेरिका किसी भी देश के महत्व को उसके स्किल्ड मैनपावर और औद्योगिक क्षमता के आधार पर आंकता था, जो विश्व शक्ति के संतुलन को महत्वपूर्ण रूप से बदलने में सक्षम हो।

एशिया में चीन या भारत नहीं, बल्कि जापान इन मानदंडों को पूरा करता था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि अमेरिकी प्रशासन भारत को चीन से भी कम महत्वपूर्ण मानता था। सितंबर 1947 में सीआईए (CIA) की एक रिपोर्ट ने इसे अमेरिका के लिए सबसे कम महत्वपूर्ण देशों में रखा। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के पास न तो औद्योगिक-सैन्य क्षमता थी और न ही स्किल्ड मैनपावर, और इसके रिसोर्स भी उपयोगी नहीं थे।

इन सबके बावजूद अमेरिका, चीन के मुद्दे पर भारत से समर्थन की उम्मीद कर रहा था। दरअसल, पंडित नेहरू की यात्रा के दौरान अमेरिका यह योजना बना रहा था कि साम्यवादी चीन को मान्यता देने के मुद्दे पर गैर-साम्यवादी राज्यों द्वारा एक सामूहिक कदम उठाया जाय। मगर, प्रधानमंत्री नेहरू ने अपनी यात्रा के दौरान ही अमेरिका की इस सलाह को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि भारत, चीन की साम्यवादी व्यवस्था को मान्यता देने का पहले ही निर्णय कर चुका है।

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