US Debt Crisis: क्या होगा अगर अमेरिका हो गया दिवालिया, जानें दुनिया पर इसका असर
अमेरिका का राजकोष तेजी से खाली हो रहा है। फिलहाल 1 जून तक ही अमेरिकी ट्रेजरी (वित्त मंत्रालय) के पास खर्चों का भुगतान करने के लिए रकम बची है।

US Debt Crisis: विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति समझे जाने वाले अमेरिका पर डिफॉल्ट होने का खतरा मंडरा रहा है। अमेरिकी सरकार भारी कर्ज में डूब चुकी है और यह कर्जा अमेरिका की कुल जीडीपी का 124 प्रतिशत है। इस हिसाब से आज अगर अमेरिका ने अपनी पूरी अर्थव्यवस्था बेच भी दी तो भी वह अपना पूरा कर्ज नहीं चुका पायेगा।
हालांकि, अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भरोसा जताया है कि अतिरिक्त कर्जे के बजट पर रिपब्लिक पार्टी के साथ समझौता हो जायेगा और अमेरिका डिफॉल्ट नहीं होगा। लेकिन, इस बीच सवाल उठ रहे हैं कि अगर अमेरिका डिफॉल्ट हो जाता है तो क्या होगा? इसका असर दुनियाभर के देशों पर कितना पड़ेगा?
अमेरिका के डिफॉल्ट होने की कितनी संभावना?
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अलजजीरा को दिये एक इंटरव्यू में न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में स्टर्न स्कूल ऑफ बिजनेस में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर लॉरेंस जे. व्हाइट कहते है कि अमेरिका के डिफॉल्ट होने की संभावना पर कोई कुछ नहीं कह सकता है क्योंकि यह एक राजनैतिक मामला है। इसका कोई न कोई हल जरूर निकलेगा क्योंकि यह एक मुर्गे की लड़ाई वाले खेल की तरह है। जिसमें दोनों में से किसी एक पक्ष को झुकना पड़ेगा। लेकिन अगर कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं होता तो यह बड़ी चिंता वाली बात हो सकती है।
उनका दोनों पक्षों से इशारा रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ है। दरअसल डिफॉल्ट से बचने के लिए अमेरिका की संसद को कर्ज की सीमा को बढ़ाना होगा। हालांकि, विपक्षी पार्टी रिपब्लिकन इसके लिए राजी नहीं हो रही है। उसका कहना है कि डेमोक्रेटिक बाइडेन सरकार को पहले अपने खर्चों पर लगाम लगानी होगी। अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' में कर्ज बढ़ाने वाला बिल पर गतिरोध कायम है, क्योंकि ऊपरी सदन में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत हासिल है।
2008 जैसी मंदी आने का डर
मूडीज एनालिटिक्स के मुताबिक अगर अमेरिका डिफॉल्ट हुआ तो 2008 के वित्तीय संकट जैसी मंदी अमेरिका समेत दुनिया पर भी आ सकती है। तब आर्थिक मंदी के पीछे लीमैन ब्रदर्स को बड़ी वजह माना गया था। दरअसल, अमेरिका में 2002-04 में होम लोन सस्ता और आसान कर दिया, जिससे प्रॉपर्टी की डिमांड तेजी से बढ़ गयी। तभी लीमैन ब्रदर्स ने लोन देने वाली 5 कंपनियों को ही खरीद लिया। प्रॉपर्टी की मांग अधिक हुई तो उसके दाम भी तेजी से बढ़ने लगे, जिसके बाद अचानक से अमेरिकी रियल स्टेट में मंदी का दौर आ गया। इसी बीच जिन्होंने सस्ते होम लोन के चक्कर में प्रॉपर्टी खरीदी वह डिफॉल्ट करने लगे।
नतीजतन मार्च 2008 में अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी होम लोन कंपनी बियर स्टर्न्स डूब गई। फिर 17 मार्च को लीमैन के शेयर 48 प्रतिशत तक गिर गये। कोरिया डेवलपमेंट बैंक द्वारा इसमें निवेश और बार्कलेज में विलय की बात नाकाम रही तो 15 सितंबर को इसने दिवालिया घोषित होने का आवेदन कर दिया। 29 सितंबर तक अमेरिकी बाजारों में कोहराम मच चुका था।
इस दिन अमेरिकी बाजार जब खुले तो गिरावट के कई पुराने रिकॉर्ड टूट गये। बाजार में इससे पहले 1987 में इतनी बड़ी गिरावट देखने को मिली थी। एक दिन की भारी बिकवाली में शेयर बाजार की वैल्यू करीब $1.2 ट्रिलियन घट गयी, जोकि उस समय भारत की कुल जीडीपी के बराबर की रकम थी।
डॉलर की घटेगी साख?
वर्तमान में अधिकांश वैश्विक कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है। दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों में लगभग 60 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार और 70 प्रतिशत के आसपास वैश्विक व्यापार अमेरिकी डॉलर पर निर्भर है। विश्व के कई देश पहले से ही अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करने के लिए प्रयासरत हैं। इसे डी-डॉलराइजेशन कहा गया है। अगर अमेरिका में कुछ भी आर्थिक उथल-पुथल होती है तो उससे डॉलर की साख भी गिरेगी। नतीजतन अमेरिकी डॉलर कमजोर होगा और इसके विकल्पों को जगह मिलनी शुरू हो जाएगी।
फिलहाल, अमेरिकी 'स्विफ्ट' को बायपास करते हुए रूसी SPFS (सिस्टम फॉर ट्रांसफर ऑफ फाइनेंशियल मैसेजेस) और चीनी CIPS (क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम) एक नयी रूस-चीन भुगतान प्रणाली के लिए जोर लगा रहे हैं। चीन ने भी हांगकांग, सिंगापुर और यूरोप में RMB ट्रेडिंग सेंटर बना लिए हैं।
भारत भी आजकल अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को रुपया में करने की कोशिश कर रहा है। फॉर्च्यून इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 19 देशों के साथ भारत रुपये में लेनदेन कर रहा है। अर्जेंटीना भी चीन से आयात के लिए डॉलर की बजाय चीनी मुद्रा युआन में भुगतान करने लगा है। सऊदी अरब के वित्त मंत्री भी कह चुके है कि अमेरिकी डॉलर के अलावा अन्य किसी मुद्रा में व्यापार के लिए वह तैयार है। ब्रिक्स समूह (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) ने इस साल मार्च में आपसी व्यापार के लिए एक सामान्य मुद्रा पर चर्चा की थी।
अमेरिका में बढ़ सकती है बेरोजगारी
Statista की साल 2022 की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि अमेरिका में लगभग 158 मिलियन लोगों के पास किसी न किसी रूप में रोजगार है। जबकि 3.64 प्रतिशत लोग बेरोजगार है। इस मामले पर व्हाइट हाउस की ऑफिशियल वेबसाइट पर छपे एक लेख में मूडीज के हवाले से लिखा गया है कि अमेरिका डिफॉल्ट होता है तो जीडीपी में भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है। साथ ही लगभग 2 मिलियन नौकरियां चली जायेंगी। साथ ही बेरोजगारी दर भी बढ़कर 5 प्रतिशत के आसपास हो सकती है।
इन देशों को लगेगा सबसे बड़ा झटका
स्पेनिश फाइनेंशियल कंपनी Santander Trade के मुताबिक अमेरिका में मुख्य तौर पर निवेश करने वालों में देशों में जापान, जर्मनी, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड और फ्रांस शामिल हैं। इनमें से अधिकांश निवेश विनिर्माण, वित्तीय और बीमा गतिविधियों और व्यापार और रखरखाव के क्षेत्रों में हैं।
साल 2022 की विश्व निवेश रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह में 143.6 प्रतिशत की जोरदार वापसी हुई थी। यह 2020 में $151 बिलियन से बढ़कर 2021 में $367 बिलियन हो गया था। अब अगर अमेरिका डिफॉल्ट होता है, तो सबसे ज्यादा इन देशों को प्रत्यक्ष नुकसान होगा।
भारत को लग सकता है झटका?
अमेरिका के डिफॉल्ट होने का असर भारत पर भी पड़ सकता है क्योंकि साल 2022-23 में अमेरिका, फिर से भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बनकर उभरा है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2022-23 में 7.65 प्रतिशत बढ़कर $128.55 बिलियन हो गया है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के मुताबिक भारत, अमेरिका को फार्मास्युटिकल, इंजीनियरिंग, आभूषण व अन्य सामानों का निर्यात करता है। अगर बाजार में मंदी आई तो अमरीका में भारतीय सामान कम बिकेगा और मांग भी गिर जाएगी। आपको बता दें कि अमेरिका उन कुछ देशों में से एक है जिनके साथ भारत का व्यापार सरप्लस में है। साल 2022-23 में भारत का अमेरिका के साथ $28 बिलियन का सरप्लस व्यापार था, अर्थात भारत ने अमरीका से आयात कम किया था और निर्यात ज्यादा।












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