इतिहास के पन्नों से- कानपुर के मोहल्ले और समाज
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) कानपुर के मोहल्लों के नामों का लंबा इतिहास है। हटिया, गुटैया, नरियल बजार, नौघड़ा, भूसाटोली, दानाखोरी, बेकन गंज, मूलगंज, नई सड़क, चौबेगोला, बांसमंडी, दालमंडी, काहूकोठी, फीलखाना, मनीराम की बगिया, चावल बाजार, आदि-आदि।
कोई बात तो है
हालांकि कानपुर उत्तर प्रदेश की राजधानी तो नहीं है, पर इस सूबे का सबसे खास शहर तो है। एक बेहद खास औद्योगिक शहर। गंगा नदी के तट पर बसा है कानपुर। हर कनपुरिया को इस शहर से संबंध होने का फख्र होता है। कनपुरिया मतलब खुद्दार और यारबाश। कानपुर का मूल नाम 'कान्हपुर' था।
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खर्चीला नहीं है कानपुर
बदलते हिंदुस्तान को जानने के लिए कानपुर ही आना पड़ेगा। कुछ ज्यादा खर्चीला नहीं है कानपुर। यहां फाइव स्टार कल्चर अभी नहीं आया है इसलिए सस्ते होटल मिल जाएंगे और धर्मशालाएं भी। 25 रुपये की दर से एक जून का भोजन मिल जाएगा। सुबह नाश्ते में आप सफेद मक्खन लगी ब्रेड और मठ्ठा पीजिए। शाम को समोसा व चाय का आनंद लीजिए।
बदलता भारत
वरिष्ठ लेखक और खाटी कनपुरिया शंभूनाथ शुक्ल कहते हैं कि कानपुर जाकर आपको एक बदलते हुए हिंदुस्तान के दर्शन होते हैं। यह वह शहर है जहां बसपा और सपा की सुदृढ़ सरकारों के बावजूद जातियां मुख्यधारा में नहीं आई हैं बल्कि जातियों के भीतर का जातिवाद और ताकतवर होकर पनपा है। रोटी के लिए यहां के लोग बदले हैं जब आप देखते हैं सचान शू वियर या सिंह बार्बर शॉप, यादव मिष्ठान्न, जाटव लस्सी अथवा पंडित पिगरी तब यह अहसास तो होगा ही कि शहर बदल रहा है।
असर जाति का
कानपुर में अब भी जाति का असर साफतौर पर दिखता है।इधर मुसलमानों में कोरी मुस्लिम समाज, धुनियां मुस्लिम और कसाई व घोसी तक परस्पर ऊँच-नीच देखते हैं।
कृषि हदबंदी
यहां पर कृषि हदबंदी कहीं नहीं है। कुत्ते, बिल्ली और गायों के नाम से खेती है। मैना और तोता के नाम से भी। यह अलग बात है कि बैलों की गोईं अब गायब हो गई है। लोगबाग या तो खुद ट्रैक्टर खरीद कर जमीन जोते-बोते हैं अथवा किराये पर ट्रैक्टर लेकर। सीजन अच्छे चल जाएं तो चार सीजन में ट्रैक्टर फ्री हो जाता है। हाई वे के किनारे के लोग दूधिए हैं अथवा खोया बनाकर शहर में आकर बेचते हैं। पर अमराइयां व अमरूद की बगियां अब नहीं बची हैं।
बगीचे समाप्त
शंभूनाथ शुक्ल कहते हैं कि ईंट के भठ्ठों ने बगीचे समाप्त कर दिए हैं। गन्ने का विकल्प यहां अरहर है और इस बार मौसम की मार अरहर को लील गई। हालत यह है कि अरहर अब कानपुर में भी 115 रुपये किलो बिक रही है। इन सब बातों के बावजूद कानपुर में लोग अपने जैसे लगते हैं। लोगों को फुरसत है आपके साथ शाम बिताने की और मदद करने की भी।













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