NATO: स्वीडन बना नाटो का सदस्य, क्या है नाटो का महत्त्व और इतिहास
NATO: स्वीडन 7 मार्च, 2024 को आधिकारिक तौर पर नाटो में शामिल हो गया और गठबंधन का 32वां सदस्य बन गया। स्वीडन के शामिल होने के साथ, नाटो ने अब बाल्टिक सागर को घेर लिया है, जिससे इस क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति और सैन्य क्षमताएं बढ़ गई हैं।
स्वीडन के नाटो में शामिल होने की वजह से नाटो देशों का सशस्त्र बल और रक्षा उद्योग मजबूत होगा, जिससे नाटो अधिक ताकतवर हो जाता है और स्वीडन भी अधिक सुरक्षित हो जाता है।

स्वीडन के नाटो में शामिल होने से रूस नाराज
स्वीडन के नाटो में शामिल होने से रूस के लिए चिंताएँ बढ़ गई हैं क्योंकि इससे यूरोप में रूस को घेरे जाने की आशंका है। स्वीडन ने यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद बढ़ते तनाव के बीच यह कदम उठाया है। नाटो के साथ स्वीडन की रणनीतियों में स्वीडन द्वारा उन्नत पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों के साथ नाटो बलों को बढ़ाना, क्षेत्र में गठबंधन की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना शामिल है।
रूस ने स्वीडन के इस कदम पर नाराजगी जताई है और स्वीडन की नाटो सदस्यता के जवाब में जवाबी कदम उठाने की धमकी दी है, और इसे अब स्वीडन को सुरक्षा गारंटी के बजाय संभावित जोखिम के रूप में देखा जा रहा है।
क्या है नाटो?
नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (नाटो) एक अंतर सरकारी सैन्य गठबंधन है, जिसकी स्थापना 1949 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वॉशिंगटन संधि पर हस्ताक्षर के साथ हुई थी। नाटो का मुख्यालय बेल्जियम के ब्रसेल्स में है। नाटो में वर्तमान में कुल 32 देश है, जिनमें से 30 यूरोपीय और दो उत्तरी अमेरिकी देश शामिल हैं। नाटो का मुख्य मकसद रणनीतिक और सैन्य माध्यम से अपने सदस्यों की स्वतंत्रता और सुरक्षा को कायम रखना है।
अगर हम आसान शब्दों में समझना चाहें कि क्या है नाटो का मकसद, तो हम कह सकते हैं कि अगर किसी नाटो सदस्य देश पर कोई गैर-नाटो देश हमला करता है, तो सभी नाटो देश उस सदस्य देश की रक्षा करने के लिए एक साथ आ जाएंगे। नाटो का मोटो "अ माइंड अनफैटर्ड इन डेलिबरेशन" (विचार-विमर्श में निश्चिंत मन)" है।
नाटो के सदस्य देश कौन से?
नाटो में 30 यूरोपीय और दो उत्तरी अमेरिकी देश शामिल है। 1949 में नाटो के 12 संस्थापक सदस्य बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड, नॉर्वे, पुर्तगाल, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका थे। नाटो की स्थापना के बाद कई और देश इसमें जुड़े, जैसे 1952 में ग्रीस और तुर्की, 1955 में जर्मनी, 1982 में स्पेन, 2017 में मोंटेनेग्रो और 2020 में उत्तरी मैसेडोनिया जैसे देश नाटो में शामिल हुए।
नाटो में शामिल होने वाले सबसे हाल के देश 2023 में फिनलैंड और 2024 में स्वीडन है। नाटो के अन्य सदस्य देशों में अल्बानिया, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, इस्टोनिया, हंगरी, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड, रोमानिया, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया शामिल हैं। वर्तमान में नाटो में जुड़ने की इच्छा रखने वाले देशों में बोस्निया और हर्जेगोविना, जॉर्जिया और यूक्रेन शामिल हैं।
कोई देश कैसे बनता है नाटो का सदस्य!
किसी देश को नाटो में शामिल होने के लिए आमंत्रित करने का निर्णय नॉर्थ अटलांटिक काउंसिल (NAC) द्वारा सभी सदस्य देशों के बीच सर्वसम्मति के आधार पर किया जाता है। आमंत्रित किए जाने के बाद, वह देश ब्रसेल्स स्थित नाटो के मुख्यालय में नाटो विशेषज्ञों के साथ विस्तार से चर्चा करता है और इसमें कई दौर की बातचीत शामिल होती है।
ये वार्ताएं राजनीतिक, कानूनी और सैन्य मुद्दों पर केंद्रित होती हैं और इससे यह देखा जाता है कि वह देश नाटो की सदस्यता आवश्यकताओं को पूरा करता है या नहीं। बातचीत सफल होने के बाद सदस्यता की तैयारी के लिए देश को मेंबरशिप एक्शन प्लान (MAP) में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया जाता है। इसमें इच्छुक देश नाटो के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं।
यह सब हो जाने के बाद, वह देश नाटो सदस्यों के साथ एक्सेशन प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर करता है। एक बार हरी झंडी मिल जाने के बाद देश आधिकारिक तौर पर वाशिंगटन संधि में शामिल हो जाता है और नाटो का सदस्य बन जाता है। नाटो सदस्य देशों को अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का कम से कम 2% रक्षा खर्च के लिए अलग करना होता है। नाटो में शामिल होने के लिए देश को लोकतंत्र कायम रखना होता है, बाजार अर्थव्यवस्था बनानी होती है, सैन्य बलों पर नागरिक नियंत्रण बनाए रखना होता है और नाटो देशों के साथ मिलकर काम करना होता है।
अमेरिका और नाटो
अमेरिका अपने रणनीतिक नेतृत्व, आर्थिक रूप से समृद्ध और मजबूत सैन्य क्षमता होने के कारण नाटो में सबसे अहम भूमिका निभाने वाला देश है। नाटो के एक प्रमुख सदस्य के रूप में अमेरिका 'कलेक्टिव डिफेंस' पर जोर देते हुए नाटो देशों को सुरक्षा की गारंटी देता है। अमेरिका की ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में मुख्य भूमिका की वजह से उसे अच्छा-खासा आर्थिक लाभ भी हुआ है।
नाटो की वजह से अमेरिका को वैश्विक महाशक्ति बनने में भी मदद मिली और दुनिया भर में सैन्य अभियानों में शामिल होने में सहायता मिली। कुल मिलाकर, नाटो के सदस्य देशों के बीच स्थिरता, सुरक्षा और सहयोग बनाए रखने के लिए अमेरिका की भागीदारी सबसे ज्यादा आवश्यक है।
रूस-यूक्रेन युद्ध की जड़ें नाटो में
वर्ष 2008 में यूक्रेन ने नाटो के साथ जुड़ने की इच्छा जाहिर की थी और उसके मेंबरशिप एक्शन प्लान (MAP) के लिए आवेदन भी किया था। हालांकि, वर्ष 2010 में जब रूस समर्थक नेता विक्टर यानूकोविच यूक्रेन के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने नाटो के साथ जुड़ने पर असहमति जताई।
यूक्रेन में नागरिक अशांति के चलते विक्टर देश छोड़कर भाग गए, जिसका फायदा रूस ने उठाया और 23 फरवरी, 2014 को रूसी सैनिकों ने क्रीमिया के यूक्रेनी क्षेत्र और क्रीमिया की संसद पर कब्जा कर लिया। लेकिन 2014 में शुरू हुआ यह कब्जा, 24 फरवरी 2022 को आक्रमण में बदल गया।
रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण इसलिए किया क्योंकि उसका मानना था कि यूक्रेन धीरे-धीरे यूरोपीय संघ और नाटो के माध्यम से पश्चिमी देशों से दोस्ती गहरी कर रहा है। हालांकि, कई बार रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन को नाटो के साथ ना जुड़ने की नसीहत दी थी।












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