जानिए इंडियन आर्मी, एयर फोर्स और नेवी के स्पेशल कमांडोज के बारे में
नई दिल्ली। इंडियन आर्मी के स्पेशल पैरा कमांडोज ने एलओसी पार जाकर आतंकी कैंपों पर हमला किया और कम से कम 40 आतंकियों को मार गिराया है। एक बार फिर इन कमांडोज ने अपनी श्रेष्ठता और बहादुरी साबित की है।
देश में इंडियन आर्मी, एयर फोर्स और नेवी तीनों के पास ही ऐसे स्पेशल कमांडोज से लैस स्पेशल फोर्सेज हैं जो किसी भी पल दुश्मन को खाक में मिला सकती हैं।
ये स्पेशल फोर्सेज खास तरह के ऑपरेशन को चलान या फिर संकट के समय सेनाओं की मदद के लिए हर पल तैयार रहती हैं।
ये कमांडोज खास तरह से ट्रेन्ड किए जाते हैं और इनके पास खास तरह के उपकरण भी होते हैं। वर्ष 2008 में मुंबई में हुआ आतंकी हमला हो या फिर 2014 में कश्मीर में आई भयानक बाढ़ हो, ये कमांडोज हर समय देश की रक्षा के लिए तैयार नजर आए।
आइए आज हम आपको देश की तीनों सेनाओं के पास मौजूद स्पेशल फोर्सेज के कमांडोज और ये कैसे तैयार होते हैं इनके बारे में बताते हैं।

इंडियन आर्मी-पैरा स्पेशल फोर्सेज
- इंडियन आर्मी ने वर्ष 1966 में इसका गठन किया।
- वर्ष 1965 में जब भारत और पाकिस्तान जंग छिड़ी तो उत्तर भारत से इंफेंट्री यूनिट्स के जवानों को गार्ड्स की ब्रिगेट के मेजर मेघ सिंह की अगुवाई में खास तौर पर भेजा गया।
- इस ग्रुप की परफॉर्मेस को देखकर फैसला किया गया कि स्पेशल फोर्स का गठन अलग से किया जाएगा।
- इसके बाद एक खास बटालियन का गठन हुआ लेकिन पैराट्रूपिंग को कमांडो रणनीति का आंतरिक हिस्सा रख गया।
- इसके बाद इसे पैराशूट रेजीमेंट में ट्रांसफर कर दिया गया।
- जुलाई 1966 में पैराशूट रेजीमेट देश की पहली स्पेशल ऑपरेशन यूनिट बनी।
- पैरा कमांडो को 30,000 फीट की ऊंचाई से छलांग लगाने से लेकर 15 दिन की कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है।
- अलग-अलग स्टेज में होने वाली ट्रेनिंग का मकसद कमांडोज को शारीरिक और मानसिक तौर पर मजबूत बनाना होता है।
- पैरा कमांडो के लिए उसका पैराशूट सबसे बड़ा हथियार होता है।
- इसका वजन करीब 15 किलोग्राम होता और एक रिजर्व पैराशूट का वजन पांच किलोग्राम होता है।
- इन पैराशूट की कीमत एक लाख से लेकर दो लाख तक होती है।
- इन कमांडोज को रात में जागने की ट्रेनिंग से लेकर भूखे रहने तक की ट्रेनिंग दी जाती है।
- इंडियन एयर फोर्स ने फरवरी 2004 में गरुण कमांडो स्पेशल फोर्स की यूनिट शुरू की।
- इसका पहला मकसद इंडियन एयर फोर्स के संस्थानों को आतंकी हमलों से बचाना है।
- गरुण कमांडोज को 52 हफ्तों के बेसिक ट्रेनिंग कोर्स से गुजरना पड़ता है।
- शुरुआती तीन माह तय कर देते हैं कि कौन सा गरुण बेस्ट है और आगे की ट्रेनिंग के लिए फिट है।
- गरुण कमांडो की ट्रेनिंग बाकी स्पेशल फोर्सेज की तुलना में सबसे ज्यादा अवधि वाली होती है।
- ट्रेनिंग का टोटल पीरियड तीन वर्ष का होता है और इस के बाद ही कमांडो पूरी तरह से स्पेशल फोर्स का हिस्सा बन पाता है।
- गरुण कमांडोज को एयरफील्ड की रक्षा करना और बंधक स्थिति से निबटने के लिए तैयार किया जाता है।
- कुछ एडवांस्ड गरुण यूनिट्स को आर्मी के पैरा कमांडो की तरह ट्रेनिंग मिलती है।
- इसके अलावा इन्हें नेवी के मार्कोस कमांडो की तरह भी पानी में जाकर दुश्मनों के खात्मे की ट्रेनिंग भी मिलती है।
- बंधक संकट के समय गरुण हर तरह के सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम देते हैं।
- गरुण रडार खत्म करने से लेकर, कॉम्बेट कंट्रोल और मिसाइल के टारगेट्स का पता लगाते हैं और दूसरे युद्ध निर्देशों को समझते हैं।
- इसके बाद वह एयर ऑपरेशंस में सपोर्ट करते हैं।
- इसके अलावा गरुण दुश्मन के एयरबेस पर भी आक्रमण करने की क्षमता से लैस होते हैं।
- उन्हें वेपंस सिस्टम को बेअसर करने, फाइटर हैंगस और दूसरे बड़े सिस्टम को खत्म करने की भी ट्रेनिंग दी जाती है।
- अप्रैल 1986 में नेवी ने एक मैरीटाइम स्पेशल फोर्स की योजना शुरू की।
- इंडियन मैरिटाइम स्पेशल फोर्स (आईएमएसएफ) की स्थापना फरवरी 1987 में हुई।
- इसका नाम वर्ष 1991 में आईएमएसएफ से बदलकर मरीन कमांडो फोर्स (एमसीएफ) कर दिया।
- वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्तान के युद्ध के बाद इस बात पर जोर दिया गया कि इंडियन नेवी के पास स्पेशल कमांडो से लैस एक टीम होनी चाहिए।
- मार्कोस का निकनेम 'मगरमच्छ' है। इसकी एनिवर्सिरी वैलेंटाइन डे के दिन यानी 14 फरवरी को होती है और इसका मोटो है, 'द फ्यू द फियरलेस।'
- यह एक ऐसी फोर्स है जो मुश्किल ऑपरेशनों और काउंटर टेररिस्ट ऑपरेशनों को अंजाम दे सकें।
- उस समय नेवी ने कुछ खास अधिकारियों को इंडियन आर्मी और सिक्योरिटी फोर्सेज की ओर से शुरुआती ट्रेनिंग दिलवाई।
- इसके बाद तीन ऑफिसर्स को पहले यूएस नेवी सील्स कमांडो और फिर ब्रिटिश स्पेशल एयर सर्विस के पास एक विशेष कार्यक्रम के तहत ट्रेनिंग के लिए भेजा गया।
- मार्कोस कमांडोज को पहले मरीन कमांडो फोर्स यानी एमसीएफ के नाम से भी जाना जाता था।
- मार्कोस को 26/11 हमले के ऑपरेशन में भी बुलाया गया था।
- मार्कोस इंडियन नेवी की एक स्पेशल ऑपरेशन यूनिट है।
- इसका मकसद कांउटर टेररिज्म, डायरेक्टर एक्शन, किसी जगह का खास निरीक्षण, अनकंवेंशनल वॉरफेयर, होस्टेज रेस्क्यू, पर्सनल रिकवरी और इस तरह के खास ऑपरेशनों को पूरा करना है।
- कश्मीर बाढ़ में मार्कोस को बुलाये जाने का कारण था ऑपरेशन रक्षक जो झेलम नदी और वूलर झील में 1990 में चलाया गया था।
- मार्कोस की टीम किसी भी हालत में कोई भी ऑपरेशन सफलतापूर्वक करने की क्षमता रखती है।
- कुछ कमांडो आज भी जम्मू-कश्मीर में आर्मी के साथ जुड़े हुए हैं।
- 1999 में हुई कारगिल जंग में भी मार्कोस ने भारतीय सेना को काफी मदद की थी।
- मार्कोस के लिए 20 वर्ष की आयु वाले युवकों का सेलेक्शन होता है।
- अमेरिकी और ब्रिटिश फौजों के साथ ट्रेनिंग दी जाती है।

गरुण कमांडोज-इंडियन एयर फोर्स

माकोर्स-इंडियन नेवी

खास ऑपरेशन
इंडियन आर्मी
वर्ष 1971 में भारत-पाक जंग, 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1980 में श्रीलंका में ऑपरेशन पवन, 1988 में मालद्वीव ऑपरेशन कैकटस और फिर 1999 में कारगिल।
इंडियन नेवी
वर्ष 2008 26/11ऑपरेशन ब्लैक टॉरनेडो, वर्ष 1987 में श्रीलंका में 'ऑपरेशन पवन,' वर्ष 1988 में मालद्वीप में 'ऑपरेशन कैक्टस,' वर्ष 1991 में 'ऑपरेशन ताशा,' जो कि ऑपरेशन पवन का ही दूसरा रूप था, वर्ष 1992 में लिट्टे के खिलाफ 'ऑपरेशन जबर्दस्त।'

खास हथियार
गरुण
टेवर टीएआर-21 असॉल्ट राइफल, ग्लॉक 17 और 19 पिस्टल, हेक्लर एंड कॉच एमपी5 सब मशीन गनप एकेएम असॉल्ट राइफल, एके-47 का एक वर्जन और कॉल्ट की एम4 कर्बाइन।
पैरा कमांडोज
9 एमएमऑाटो पिस्टल, 1ए सेमी-ऑटोमैटिक पिस्टल, ग्लॉक 17 9एमएम सेमी-ऑटोमैटिक पिस्टल, बेराट्टा 92 9एमएम सेमी ऑटोमैटिक पिस्टल, हेक्लर एंड कॉच एमपी5 सब मशीन गन, 1एसएमजी सब मशीन गन, टीएआर-21 टेवॉर असॉल्ट राइफल एम4ए1 कार्बाइन, एमपीआई केएमएस-72 असॉल्ट राइफल, 58 असॉल्ट राइफल, आईएमआई गालिल स्नाइपर सेमी-ऑटोमैटिक स्नाइपर राइफल, लाइट मशीन गन, 2ए1 जनरल मशीन गन, एजीएस ऑटोमैटिक ग्रेनेड लांचर, सी90-सीआर, डिस्पोजल रॉकेट लांचर, 82एमएम रॉकेट लांचर।
मार्कोस
हेक्लर एंड कॉच एमपी5 सब मशीन गन, एसआईजी सॉर पी226 एंड ग्लॉक 17 पिस्टल एंड ड्रूगानोव एंड गालिल स्नाइपर राइफल्स एंड ओएसवी-96 सेमी ऑटो हैवी कैलीबर एंटी मैटेरियल राइफल। हथियार के अलावा मार्कोस के पास इटैलियन सीई-CE-2F/X100 भी कोवर्ट ऑपरेशन के लिए होती है।
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