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SC on BPSC: साक्षात्कार में मूल दस्तावेज नहीं होने से नौकरी से मना नहीं कर सकते, सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्णय

यदि सरकारी नौकरी के लिए साक्षात्कार में किसी कारणवश मूल दस्तावेज को पेश नहीं किया जा सका, तो केवल इसी आधार पर नौकरी से मना नहीं किया जा सकता। नियम 9 को व्याख्यायित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 22 सिंतबर को अपने निर्णय में यह व्यवस्था दी कि साक्षात्कार में मूल दस्तावेज होना चाहिए, लेकिन इसे अनिवार्य शर्त के रूप में नहीं लिया जा सकता। इस आधार पर बिहार के तीन अभ्यर्थियों को नौकरी दिलाने में सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कह दिया कि उनकी यह व्यवस्था उन लोगों के लिए लागू नहीं होती, जो इस विषय को लेकर कोर्ट में नहीं आए हैं। न्यायाधीश जे के माहेश्वरी और केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया।

इसके पहले स्वीटी कुमार बनाम बिहार सरकार एवं अन्य के केस में पटना हाई कोर्ट ने बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन के निर्णय को सही ठहराया था कि साक्षात्कार के समय मूल दस्तावेज नहीं होने की वजह से उन्हें नौकरी के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। इस केस में स्वीटी कुमारी और विक्रमादित्य मिश्र ने साक्षात्कार के समय चरित्र प्रमाण पत्र की मूल कॉपी प्रस्तुत नहीं की थी और अदिति नाम की अभ्यर्थी अपनी लॉ की डिग्री का मूल दस्तावेज साथ लेकर नहीं आ सकी थी।

Supreme Court

स्वीटी कुमारी अनुसूचित जाति के कोटे से और विक्रमादित्य मिश्र ने सामान्य वर्ग में 2018 में बीपीएससी की परीक्षा के लिए आवेदन किया था। 7 जनवरी को परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ तो दोनों अभ्यर्थी कट ऑफ मार्क्स से उपर नंबर लाकर उर्तीण हुए थे। फिर उन्हें 15-12- 2019 को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था। इसी तरह अदिती ने बिहार ज्यूडिशियल सर्विस कंप्टीटिव एक्जामिनेशन में आर्थिक रूप से विपन्न वर्ग में परीक्षा पास कर ली थी। लेकिन साक्षात्कार में कानून की डिग्री की मूल कॉपी वह प्रस्तुत नहीं कर पाईं। जिसके कारण इन तीनों को नौकरी के लिए आवश्यक शर्तें पूरा नहीं करने के आधार पर इनकी दावेदारी को खारिज कर दिया गया था।

स्वीटी कुमारी ने 414 अंक हासिल किए, हालांकि एससी वर्ग में कट ऑफ 405 था और विक्रमादित्य मिश्रा ने 543 अंक हासिल किए, हालांकि 30 वीं परीक्षा में अनारक्षित वर्ग में कट ऑफ 517 था और वे योग्य उम्मीदवार थे। इसी तरह अदिति 31वीं परीक्षा में शामिल हुई और उसे 501 अंक मिले, जबकि ईडब्ल्यूएस श्रेणी में कटऑफ 499 थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन विशिष्ट तथ्यों के आधार पर सिर्फ उन्हीं अभ्यर्थियों के लिए इस अपील के फैसले मान्य हों जो हमारे सामने हैं और समय रहते अदालत का दरवाजा जिन्होंने खटखटाया है। यानी समान स्थिति वाले अन्य उम्मीदवार आगे उसी लाभ का दावा नहीं कर सकते या ना वे हकदार होंगे, जो उचित समय के भीतर इस न्यायालय के समक्ष नहीं आए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों मामलों की सुनवाई के बाद यह व्यवस्था दी कि साक्षात्कार के समय मूल दस्तावेज की मांग ना तो उसकी अर्हता से कोई संबंध रखता है और ना उसकी योग्यता से। राज्य के पास अपना सतर्कता विभाग है, जो उम्मीद्वार के प्रोबेशन पीरियड के दौरान दस्तावेज और डिग्री से संबंधित अपनी रिपोर्ट दे सकता है।

मेरिट लिस्ट में आने के बाद बीपीएससी द्वारा मूल दस्तावेज प्रस्तुत न किए जाने को कारण बता कर नौकरी से वंचित किए जाने का फैसला ना तो तर्कंसंगत है और ना न्यायोचित। सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि बीपीएसएसी का वह फैसला निरस्त किया जाता है और इन तीनों अभ्यर्थियों को मौजूदा रिक्तियों या आने वाले समय की रिक्तियों में समायोजित किया जाए। इन्हें इनकी नौकरी दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पांच मामलों में भी यही व्यवस्था दी और सभी आठ को नौकरी देने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को ज्यादा महत्व दिया कि सभी उम्मीदवारों ने कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए हैं और ऐसे मेधावी उम्मीदवार किसी भी संस्थान के लिए बहुमूल्य हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों के अनुसार उम्मीदवार को अच्छे चरित्र का होना चाहिए, पर इस संबंध में बीपीएससी को सही फोटोकॉपी जमा करके भी संतुष्ट किया जा सकता है और आवश्कता होने पर मूल प्रति भी प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

इसलिए, यह स्पष्ट है कि उम्मीदवार के पास चरित्र प्रमाण पत्र होना चाहिए और यदि आवश्यक हो, तो इसे साक्षात्कार के समय उपलब्ध कराया जाना चाहिए। विज्ञापन में दर्ज निर्देशों में बीपीएससी की उक्त भाषा से यही सार निकलता है कि साक्षात्कार के समय मूल प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं है बल्कि निर्देशिका है।

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