शहीद दिवस: सबसे पहले कानपुर ने कहा था भगत सिंह को शहीद-ए-आजम
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। क्या आपको मालूम है कि भगत सिंह को सबसे पहले शहीद-ए-आजम का खिताब किसने दिया था या किसने उन्हें शहीद-ए-आजम कहना शुरू किया था? दरअसल भगत सिंह को फांसी की सज़ा मिलने के बाद कानपुर से निकलने वाले ‘प्रताप' और इलाहाबाद से छपने वाले ‘भविष्य' जैसे अखबारों ने उनके नाम से पहले शहीद-ए-आजम लिखना शुरू कर दिया था। भगत सिंह खुद कानपुर के अखबार प्रताप में काम करते थे। कानपुर से भगत सिहं का गहरा रिश्ता रहा। [भगत सिंह का एफआईआर में नहीं था नाम, कैसे हई फांसी?]

भगत सिंह ने तो ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी।
कानपुर में वे थे बलवंत सिंह
कानपुर के इतिहासकार अजीत तिवारी कहते हैं कि भगत सिंह ने कानुपर के एक स्कूल में पढ़ाया भी। ‘प्रताप' में भगत सिंह ने सदैव निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। ‘प्रताप‘ प्रेस के निकट तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्तशुदाक्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थी।
तिवारी बताते हैं कि भगत सिंह यहां पर बैठक घंटों ही पढ़ते थे। वस्तुत: प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। [पत्रकार बनना चाहते थे शहीद-ए-आज़म भगत सिंह]
दंगा कवर किया
गणेश शंकर विद्यार्थी के क्रांतिकारी अख़बार ‘प्रताप' में नौकरी करते वक्त वे दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगा कवर करने आए । वे 1925 में प्रताप में नौकरी करने कानपुर गए थे। पीलखाना में प्रताप की प्रेस थी। वे उसके पास ही रहते थे। वे रामनारायण बाजार में भी रहे। वे नया गंज के नेशनल स्कूल में पढ़ाते भी थे।
कानपुर से जुड़े रहे लेखक कमलेश शुक्ला मानते हैं कि कानपुर ने भगत सिंह के साथ कायदे से इंसाफ नहीं किया। वहां पर उस जगह का नाम भी उनके नाम पर नहीं रखा जिधर भगत सिंह रहते थे या पढ़ाते थे। [ताना नहीं मिलता तो बम नहीं फेंकते भगत सिंह]












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