Saran Seat: दिलचस्प है सारण सीट का सियासी किस्सा, पहले मां को हराया अब बेटी से भिड़ेंगे राजीव प्रताप रूडी
Saran Seat: 18वीं लोकसभा के लिए बिहार की सारण लोकसभा सीट की चर्चा इन दिनों खूब हो रही है। क्योंकि, यहां मुकाबला बीजेपी के बड़े नेता राजीव प्रताप रूडी और लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य के बीच है। इसलिए सारण संसदीय सीट एक बार फिर से बिहार की हॉट सीट बन गई है।
गंगा, गंडक और घाघरा नदी के बीच बसा सारण भारत के प्राचीन शहरों में से एक है। कभी जंगलों से घिरे इस क्षेत्र में असंख्य हिरण हुआ करते थे। इसलिए हिरण (सारंग) और वन (अरण्य) के कारण इस क्षेत्र को प्राचीन काल में सारंग अरण्य कहा जाता था। जो कालक्रम में बदलकर सारण हो गया। साथ ही इस क्षेत्र की एक कहानी यह भी है कि मौर्यकाल में सम्राट अशोक के द्वारा यहां लगाए गए धम्म स्तंभों को 'शरण' कहा जाता था, जो बाद में सारण कहलाने लगा और इस क्षेत्र का नाम बन गया।

लालू और रूडी का गढ़ है सारण लोकसभा क्षेत्र
साल 2008 से पहले सारण सीट को छपरा लोकसभा क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। यहां पहली बार लोकसभा का चुनाव 1957 में हुआ था। जबकि साल 2008 में हुए परिसीमन के बाद छपरा लोकसभा सीट का नाम बदलकर सारण कर दिया गया था। वर्तमान में बीजेपी के राजीव प्रताप रूडी यहां के सांसद हैं।
वैसे यह संसदीय क्षेत्र लालू प्रसाद यादव और राजीव प्रताप रूडी का गढ़ माना जाता है। लालू प्रसाद यादव इस लोकसभा सीट से साल 1977, 1989, 2004 और 2009 में जीते थे। जबकि राजीव प्रताप रूडी ने साल 1996, 1999, 2014 और 2019 में जीत दर्ज की है। इनके अलावा कोई नेता यहां से चार बार जीतकर सांसद नहीं बने हैं।
सारण लोकसभा में वर्तमान में छह विधानसभा सीटें (मढ़ौरा, छपरा, गरखा, अमनौर, परसा और सोनपुर) हैं। 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने चार सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि दो सीटें बीजेपी के खाते में गई थीं। जिन चार सीटों पर आरजेडी ने जीत हासिल की थी उनमें मढ़ौरा, गरखा, परसा और सोनपुर सीट शामिल हैं। जबकि छपरा और अमनौर सीट पर बीजेपी ने जीत हासिल की थी।
सारण लोकसभा सीट का सियासी इतिहास
देश की आजादी के बाद छपरा लोकसभा सीट (अब सारण) पर पहली बार 1957 में चुनाव कराया गया था। तब यहां से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजेंद्र सिंह कांग्रेस की लीला देवी वर्मा को हराकर पहली बार इस क्षेत्र के सांसद चुने गए थे। इसके बाद 1962, 1967 और 1971 में कांग्रेस के उम्मीदवार रामशेखर प्रसाद सिंह लगातार तीन बार यहां से सांसद चुने गए।
1977 में हुई लालू की एंट्री
आपातकाल के बाद साल 1977 के लोकसभा चुनाव में देश की सियासत का मिजाज बदला और बिहार की राजनीति में छात्र नेता रहे लालू प्रसाद यादव की एंट्री हुई और उन्हें पहली बार जनता पार्टी के टिकट पर छपरा लोकसभा से मैदान में उतारा गया। लालू के सामने चुनावी मैदान में कांग्रेस के राम शेखर प्रसाद सिंह थे।
आपातकाल के खिलाफ लहर में हुए इस चुनाव में महज 29 साल के युवा नेता लालू यादव को 4,15,409 यानी 85.97% वोट मिले थे। बाकी के सभी उम्मीदवार कुल मिलाकर सिर्फ 14% वोट ही हासिल कर पाए थे। कांग्रेस उम्मीदवार राम शेखर प्रसाद सिंह को सिर्फ 8.61 % वोट मिले, जबकि सीपीआई के शिवबचन सिंह को 4.39% वोट मिले थे। इस तरह से पहली बार लालू यादव केवल 29 साल की उम्र में सांसद बनकर संसद पहुंचे।
इसके बाद 1980 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने लालू की जगह सत्यदेव सिंह को टिकट देकर यहां से उतारा और वे सांसद बने। फिर, 1984 में जनता पार्टी के टिकट पर ही रामबहादुर सिंह ने यहां से जीत दर्ज की। वहीं दूसरी तरफ लालू 1980 में जनता पार्टी से अलग होकर राजनारायण की अगुवाई वाले धड़े का दामन थाम लिया था।
बाद में वी पी सिंह के कांग्रेस छोड़कर जनता दल बनाने पर लालू प्रसाद यादव उनके साथ जुड़ गए। जनता दल के टिकट पर 1989 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव फिर से मैदान में उतरे। उन्होंने एक बार फिर से दम दिखाया और छपरा लोकसभा के सांसद चुने गए। 1990 के विधानसभा चुनाव में जनता दल को बिहार में बड़ी जीत मिली और लालू मुख्यमंत्री बनाए गए। तब उन्हें संसद सदस्य का पद खाली करना पड़ा, यहां उपचुनाव हुए और जनता दल के लाल बाबू राय सांसद बने। हालांकि, 10वीं लोकसभा (1991) में भी जनता दल ने दोबारा लाल बाबू राय को टिकट देकर यहां से उतारा और वे जीतकर संसद पहुंचे।
1996 में हुई बीजेपी की एंट्री
छपरा लोकसभा सीट से साल 1996 में पहली बार बीजेपी की एंट्री हुई। रूडी ने पहली बार 1996 में छपरा सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और उन्हें जीत मिली थी। लेकिन, इसके दो साल बाद ही लोकसभा चुनाव 1998 में आरजेडी के हीरा लाल राय ने बीजेपी उम्मीदवार राजीव प्रताप रूडी को हरा दिया। जबकि साल 1999 के चुनाव में पुन: राजीव प्रताप रूडी चुनाव जीते और इस बार उन्होंने राजद के हीरालाल राय को पराजित कर दिया।
इसके बाद साल 2004 के लोकसभा चुनाव में रूडी ने भाजपा के टिकट पर फिर पर्चा भरा लेकिन इस बार उनका सामना राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से हुआ। इस चुनाव में रूडी को लालू ने करीब 60,423 वोटों के अंतर से हरा दिया और तीसरी बार यहां के सांसद बने। इस चुनाव में लालू को 2,28,882 वोट मिले, जबकि रूडी को 1,68,459 वोट मिले।
2008 में छपरा लोकसभा सीट का नाम हुआ सारण
साल 2008 में परिसीमन के बाद छपरा लोकसभा सीट का नाम बदलकर सारण कर दिया गया। तब 2009 में पहली बार सारण लोकसभा सीट पर चुनाव हुआ। इस चुनाव में एक फिर आमने-सामने लालू और रूडी थे। इस चुनाव में लालू यादव को 2,74,209 वोट मिले, जबकि रूडी को 2,22,394 वोट। लालू ने रूडी को 51,815 वोटों के अंतर से हराकर पहली बार सारण (पूर्व में छपरा) के सांसद चुने गए।
वैसे साल 2014 में इस संसदीय सीट का माहौल बदला और लालू यादव ने यहां से अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मैदान में उतारा। जबकि दूसरी तरफ बीजेपी ने फिर से रूडी पर दांव खेला। इस चुनाव में राजीव प्रताप रूडी को 3,55,120 वोट मिले, जबकि राबड़ी देवी को 3,14,172 वोट ही मिले। रूडी ने राबड़ी को 40,948 के अंतर से हरा दिया और संसद पहुंचे।
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में लालू यादव ने अपने समधी चंद्रिका राय को रूडी के खिलाफ उतारा। रूडी राजद उम्मीदवार चंद्रिका राय को भी 1,38,429 वोटों के अंतर से हराकर फिर से सांसद बने। वहीं एक बार फिर से 2024 चुनाव में बीजेपी ने राजीव प्रताप रूडी को ही अपना उम्मीदवार बनाया है।
सारण का जातीय समीकरण
साल 2019 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों के मुताबिक सारण लोकसभा क्षेत्र में तकरीबन 16 लाख से ज्यादा मतदाता हैं। सारण में पुरुष मतदाताओं की संख्या 8,96,700 जबकि महिला वोटर की संख्या 7,70,526 हैं। सारण सीट पर यादव मतदाताओं की आबादी करीब 25% है। इसके अलावा राजपूत वोटरों की तादाद भी करीब 23% है। इस सीट पर बनिया वोटर करीब 20% और मुस्लिम वोटर भी 10% से ज्यादा हैं।












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