Ram Manohar Lohia: ‘जब-जब लोहिया बोलता है, दिल्ली का तख्ता डोलता है’, जब नेहरू को लोहिया ने दी खुली चुनौती
1962 के लोकसभा के तीसरे चुनाव में उत्तर प्रदेश के फूलपुर संसदीय क्षेत्र का चुनाव इतिहास में दर्ज है। जब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और राम मनोहर लोहिया आमने-सामने थे।

आजादी के बाद गैर-कांग्रेसवाद का नारा बुलंद करने वाले समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया का आज ही दिन 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में जन्म हुआ था। लोहिया अपने विचारों को मुखर रुप से रखने में परहेज नहीं करते थे। एक बार लोहिया ने कांग्रेस को सत्ता से उखाड़ फेंकने का ऐलान करते हुए कहा था कि जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं।
उन्होंने तो खुले मंच से ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रतिदिन 25 हजार रुपये खर्च करने पर सवाल उठा दिये थे। वहीं इंदिरा गांधी को 'गूंगी गुड़िया' कहने से भी नहीं चूके थे। उनके भाषणों के बाद यह कहा जाता था कि जब-जब लोहिया बोलता है, दिल्ली का तख्ता डोलता है। ऐसे थे डॉ. राम मनोहर लोहिया।
पीएम नेहरू के घोर विरोधी
जब देश आजाद हुआ तो पंडित नेहरू की नीतियों की वजह से लोहिया कांग्रेस से अलग हो गये थे। आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू बड़े नेता बन गये थे। वहीं लोहिया, समाजवादियों नीतियों के साथ आगे बढ़े। नेहरू से उनकी तल्खी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक बार यह भी कह दिया था कि बीमार देश के बीमार प्रधानमंत्री को इस्तीफा दे देना चाहिए।
जब नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़े लोहिया
यह किस्सा साल 1962 का है। जब देश में तीसरी लोकसभा के चुनाव होने वाले थे। किसानों और गरीबों के मुद्दे पर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया जवाहरलाल नेहरू की नीतियों के आलोचक थे। इन्हीं मुद्दों को लेकर लोहिया जवाहरलाल नेहरू के संसदीय क्षेत्र फूलपुर से उनके खिलाफ चुनाव में उतर गये।
उस चुनाव के दौरान लोहिया जानते थे कि वह पीएम नेहरू के सामने चुनाव नहीं जीत सकते, इसके बावजूद वह मैदान में चट्टान की तरह प्रचार-प्रसार में जुटे रहे। वह सबसे कहते थे कि मैं पहाड़ से टकराने आया हूं। मैं जानता हूं कि पहाड़ से पार नहीं पा सकता लेकिन उसमें एक दरार भी कर दी तो चुनाव लड़ना सफल हो जाएगा।
खुले मंच से पीएम नेहरू पर लगाए आरोप
चुनाव प्रचार के दौरान डॉ. लोहिया ने पीएम नेहरू पर दो बड़े आरोप लगाए थे। उनका पहला आरोप था कि देश की दो-तिहाई जनता को प्रतिदिन दो आने भी नसीब नहीं होते है। जबकि पंडित नेहरू पर रोजाना 25 हजार रुपये खर्च होता है। वहीं अपने दूसरे आरोप में लोहिया ने गोवा दिवस को नेहरू द्वारा जनता को दी गई घूस बताया था। उन्होंने कहा था कि अगर नेहरू चाहते तो गोवा बहुत पहले आजाद हो सकता था। बता दें कि 19 दिसंबर 1961 को भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन विजय अभियान' शुरू कर गोवा, दमन और दीव को पुर्तगालियों के शासन से मुक्त कराया था। जबकि लोहिया, गोवा में 1946 से उसकी आजादी के लिए लड़ाई लड़ रहे थे और इसके लिए पुर्तगालियों ने उन्हें जेल में भी डाला था।
65 हजार वोटों से हारे लोहिया
इस चुनाव के खत्म होने के बाद जब रिजल्ट की घोषणा हुई तो जवाहरलाल नेहरू को कुल 1 लाख 18 हजार 931 वोट मिले। वहीं, राममनोहर लोहिया 54 हजार 360 वोट मिले। यह अपने आप में बड़ी बात थी क्योंकि उस समय भारत के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सत्ता ही थी। इसके बाद साल 1963 में उत्तर प्रदेश की फर्रुखाबाद सीट पर उपचुनाव हुआ और यहां राम मनोहर लोहिया को जीत मिली और इसके बाद वो संसद पहुंचे।
'तीन आना बनाम पंद्रह आना' का भाषण
चुनाव जीतने के बाद 21 अगस्त 1963 लोकसभा में अपने भाषण में लोहिया ने कांग्रेस सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने एक दिन पहले कृषि मंत्री के भाषण का हवाला देकर कहा था कि देश की 60 प्रतिशत आबादी हर दिन 3 आना पर जीवनयापन कर रही है और प्रधानमंत्री के कुत्ते पर हर दिन 3 रुपये खर्च हो रहा है।
खुद प्रधानमंत्री पर रोज 25 हजार रुपये खर्च होता है। इस पर प्रधानमंत्री नेहरू ने लोहिया की बातों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि योजना आयोग की रिपोर्ट कहती है कि 70 प्रतिशत लोग 15 आना रोजाना कमा रहे हैं। तब लोहिया बोले, "तीन आना बनाम 15 आना छोड़िए, 25 हजार में तो लाखों आने होते हैं।"












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