NATO Forces: तकरीबन 58 लाख सैनिक और छह हजार परमाणु हथियार, जानें कितना ताकतवर है नाटो?
नाटो दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य संगठन है। वर्तमान में दुनिया के 31 देश इसके सदस्य हैं।

NATO Forces: नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (नाटो) के साथ जुड़ने के लिए भारत को अमेरिका की ओर से खुला ऑफर मिला है। अमेरिकी डिप्लोमेट जूलियन स्मिथ ने हाल ही में एक बयान में कहा है कि भारत अगर चाहे तो नाटो में उसके लिए दरवाजे खुले है। हालांकि, दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो में शामिल होने के अपने फायदे और नुकसान हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि नाटो (NATO) आखिर क्या है और यह क्या काम करता है? यह कितना ताकतवर है?
क्या है नाटो?
नाटो, उत्तरी अमेरिका और यूरोप का एक साझा राजनैतिक और सैन्य संगठन है। नाटो की शुरुआत दूसरे विश्वयुद्ध के बाद 4 अप्रैल 1949 को की गई थी। इस संगठन का उस वक्त पहला और सबसे बड़ा मकसद था सोवियत संघ के बढ़ते दायरे को सीमित करना। साथ ही यूरोप में विद्रोही विचारों को रोकने के लिए मिलकर काम करना था ताकि यूरोपीय महाद्वीप में राजनीतिक एकता कायम हो सके। वैसे नाटो की शुरुआत साल 1947 में फ्रांस और ब्रिटेन के बीच हुई डनकिर्क संधि से हुई थी।
तब द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की ओर से हमला होने की सूरत में मिलकर सामना करने के लिए ये संधि हुई थी। क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी की बुरी तरह से हार हुई थी, तब अमेरिका और यूरोपीय देशों को लगता था कि जर्मनी की ओर से पलटवार किया जा सकता है। ऐसी सूरत में मिलकर सामना करने के लिए ये संधि हुई थी। जबकि 1955 में जर्मनी खुद नाटो का सदस्य बन गया। वहीं 1949 में जब नाटो बना तो इसके 12 संस्थापक सदस्य थे - अमेरिका, ब्रिटेन, बेल्जियम, कनाडा, डेनमार्क, फ्रांस, आइसलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, नीदरलैंड्स, नॉर्वे और पुर्तगाल।
नाटो के महत्वपूर्ण घोषणापत्र
नाटो का यह संगठन एक साझा सुरक्षा की नीति पर काम करता है। अगर कोई बाहरी देश किसी नाटो सदस्य देश पर हमला करे तो बाकी सदस्य देश उसे सैन्य और राजनीतिक तरीके से सुरक्षा देंगे। साझा सुरक्षा के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात नाटो घोषणापत्र के अनुच्छेद पांच में लिखी गई है। इसके मुताबिक उत्तरी अमेरिका या यूरोप के किसी एक या एक से ज्यादा सदस्यों पर हथियारों से हमला हुआ तो माना जाएगा कि सब पर हमला हुआ है। साथ ही अगर ऐसा ही हथियारबंद हमला होता है तो हर कोई संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के अनुच्छेद 51 के अनुसार, हमला झेल रहे पक्ष की अकेले या मिलकर और बाकी सदस्यों से बातचीत करके, जरूरी होने पर सैन्य मदद कर उसकी सुरक्षा के लिए कार्रवाई कर सकते हैं।
कितनी ताकतवर है नाटो की सेना?
यहां एक सबसे रोचक बात यह है कि नाटो की अपनी कोई सेना नहीं होती है। उसकी ताकत उसके सदस्य देशों की सेनाएं हैं। उन देशों की सेनाओं की ताकत जोड़कर ही इसकी कुल संख्या दुनिया को बताई जाती है। Statista के ताजा आंकड़ों के मुताबिक नाटो का टोटल मिलिट्री पावर 5,817,100 है। जिसमें एक्टिव जवानों की संख्या 3,358,000 है। वहीं रिजर्व फोर्स की संख्या 1,720,700 है। वहीं पैरामिलिट्री यूनिट्स की बात करें तो 738,400 संख्या में है। वहीं इसके पास कुल 5,943 परमाणु हथियार हैं।
एयरफोर्स की ताकत - नाटो के एयरफोर्स के पास कुल एयरक्राफ्ट 20,633 हैं। वहीं 3398 फाइटर्स/इंटरसेप्टर्स हैं। जबकि ग्राउंड अटैक एयरक्राफ्ट की संख्या 1108 है। ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट की संख्या 1506 है। स्पेशल एयरक्राफ्ट 970 और टैंकर एयरक्राफ्ट 615 हैं। टोटल हेलीकॉप्टर की संख्या 8,614 जबकि कॉम्बैट हेलीकॉप्टर 1,439 हैं।
जमीनी लड़ाकू वाहन - नाटो के पास मुख्य युद्धक टैंक 12,408 है, जबकि बख्तरबंद वाहनों की संख्या 1,004,844 हैं। स्व-चालित तोपखाने 4,532 और टॉवर तोपखाना 6,554 है। कुल स्व-चालित रॉकेट लांचर 3,272 हैं।
नौसैनिक ताकत - नाटो के पास कुल सैन्य जहाज 2,151 हैं। जिसमें विध्वंसक (डिस्ट्रोयर) 112, फ्रिगेट 135, नौसेना के जलपोत 55, हेलीकाप्टर वाहक 13, हवाई जहाज वाहक 16, सबमरीन 143, गश्ती नौकाएं 295, माइनस्वीपर 151 शामिल हैं।
कौन बन सकता है नाटो का सदस्य?
वैसे तो नाटो का सदस्य बनने के लिए यूरोपीय देश होना जरूरी नहीं है। इसलिये नाटो दुनियाभर में अपनी पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से कई अन्य देशों से भी अपने संपर्क स्थापित करता रहा है। अल्जीरिया, मिस्र, जॉर्डन, मोरक्को और ट्यूनिशिया भी नाटो के सहयोगी हैं।
नाटो में कब-कब कौन हुआ शामिल?
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कनाडा (1949), फ्रांस (1949), डेनमार्क (1949), आइसलैंड (1949), बेल्जियम (1949), इटली (1949), नीदरलैंड (1949), नॉर्वे (1949), लक्जमबर्ग (1949), पुर्तगाल (1949), यूनाइटेड किंगडम (1949), यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका (1949), तुर्किये (1952), यूनान (1952), जर्मनी (1955), स्पेन (1982), चेक रिपब्लिक (1999), पोलैंड (1999), बुल्गारिया (2004), लातविया (2004), हंगरी (1999), एस्तोनिया (2004), रोमानिया (2004), लिथुआनिया (2004) क्रोएशिया (2009), मोंटेनिग्रो (2017), अल्बानिया (2009), स्लोवाकिया (2004), स्लोवेनिया (2004), नार्थ मैसेडोनिया (2020), फिनलैंड (2023)।
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