बिहार: आरक्षण की चिंगारी में झुलसे राजनीतिक दल, नेता खोज रहे बरनौल
पटना (मुकुन्द सिंह)। बिहार चुनाव से ठीक पहले गुजरात में हार्दिक पटेल ने आरक्षण का मुद्दा उठाया, तो लोगों ने उसे हलके में ले लिया। देखते ही देखते गुजरात में उसी आरक्षण की वजह से आग की लपटें उठने लगीं। कितनी बसें, कारें और दुकानें जलकर खाक हो गईं। उन्हीं लपटों की चिंगारी बिहार तक भी पहुंची और यहां शुरू हो गई आरक्षण पर राजनीति। मजेदार बात यह है कि तर्क और भावनाओं के बीच आरक्षण की चिंगारी में लगभग सभी दल झुलस रहे हैं। फिर चाहे वो एनडीए हो या महागठबंधन या फिर तीसरा-चौथा मोर्चा।
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कहां से उठी चिंगगारी
मोहन भागवत ने आम्बेडकर-मंडल के द्वारा दलितों-पिछड़ों को दिये गये आरक्षण के अधिकार को खत्म करने की बात कही। बस उसी के तुरंत बाद विरोधी दलों ने भाजपा पर को निशाना बनाना शुरू कर दिया। देखते ही देखते नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह याव ने जमकर पीएम नरेंद्र मोदी पर तीर चलाये और कहा कि भाजपा दलितों और पिछड़ों के विरुद्ध साजिश रच रही है।
आक्षण की वास्तविकता
सच्चाई है कि वर्ष 1990 के पहले जब पिछड़ा वर्ग आरक्षण का अधिकारी नहीं तब आरक्षण को लेकर सवाल नहीं के बराबर उठते थे। आरक्षण खत्म करने की मांग में तेजी 1990 के बाद ही आयी। इस संबंध में लालू प्रसाद ने सही समय पर सही जवाब देते हुए आरक्षण विरोधियों को दो टूक कह दिया है कि वे चाहकर भी आरक्षण को खत्म नहीं कर सकते। दरअसल यह बात समझने की है कि आखिर सवर्ण आरक्षण खत्म क्यों करना चाहते हैं। इसके पीछे की राजनीति क्या है?
वर्ष 1990 के बाद के भारत पर गौर करें तो कहना गलत नहीं होगा कि आरक्षण के कारण पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व सरकारी नौकरियों में बढ़ा है। पिछड़े वर्ग के आने से सवर्णों का वर्चस्व खत्म हुआ है और इस कारण दलित भी मुखर हुए हैं। संभवतः यही वजह है कि आज भी ब्राह्म्णवादी व्यवस्था को सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार मानने वाले विचलित हो रहे हैं। वे तर्क दे रहे हैं कि आरक्षण का लाभ उन्हें नहीं मिल रहा है, जो इसके वास्तविक लाभार्थी हैं।
राजनीति का हथियार है आरक्षण का मुद्दा
वे इसे राजनीति के हथियार के रुप में साजिश के तहत प्रचारित कर रहे हैं। आंशिक तौर पर ये बातें सही भी हैं, लेकिन यह तो स्वभाविक ही है। जब इस देश में धर्म के आधार पर राजनीति को जायज ठहराया जा सकता है तो फ़िर जाति आधारित राजनीति को गलत कैसे ठहराया जा सकता है?
हाल ही में एक भाजपा के नेता ने कहा कि गीता हिन्दुस्तान की आत्मा है। जबकि इस देश में कुरान और बाइबिल को भी धर्मग्रंथों के रुप में सम्मान हासिल है। ताज्जुब तो तब होता है जब इस सोच में विश्वास रखने वाले ये कहते हैं कि देश में जाति व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। जबकि सबसे बड़े जातिवादी वे स्वयं हैं।
कैसे फंसी भाजपा
आरएसएस से सीधा जुड़ाव रखने वाली भाजपा अब परेशान है कि क्या करे। अगर आरक्षण का समर्थन करती है, तो सवर्ण वर्ग का वोट खतरे में पड़ जायेगा और अगर विरोध करती है, तो दलित-पिछड़ा वर्ग के लोग कभी करीब नहीं आयेंगे। भाजपा द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर जारी उम्मीदवारों की सूची है। सूची में 22 उम्मीदवार केवल यादव जाति से हैं, जबकि सवर्ण उम्मीदवारों की कुल संखा अस्सी से अधिक है। वहीं पिछड़ा वर्ग और अति पिछड़ा वर्ग (बनिया छोड़कर) को के नीचे समेट दिया गया है।
लालू-नीतीश का हाल
महागठबंधन ने 16% सामान्य वर्ग को, 55% पिछड़ा वर्ग को, % अनुसूचित जाति एवं जनजाति को, 14% मुसलमानों को और 10% महिलाओं को टिकट दिये। यह साफ दर्शा रहा है कि महागठबंधन पूरी तरह आरक्षण का समर्थन कर रहा है। ऐसे में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रीय, आदि के वोट कट सकते हैं। और यदि ऐसा हुआ तो नीतीश के करियर को सबसे बड़ा खतरा होगा।
क्या करें मांझी, पासवान और कुशवाहा
जिस लक्ष्य के साथ जीतन राम मांझी, राम विलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए में जोड़ा गया है, वह लक्ष्य भी अब खतरे में है। क्योंकि मोहन भागवत के बयान के बाद ये तीनों परेशान हैं कि वो किसका साथ दें-आरक्षण विरोधियों का या फ़िर आरक्षण समर्थकों का?
कैसा है मंजर?
आरक्षण पर चल रहे विवादों के बीच चुनावी रणभूमि में मंजर यह है कि अब हर कोई नेता लाग-लपेट कर भाषण दे रहा है, और दूसरों पर कीचड़ उछाल रहा है। उन्हें लगता है कि दूसरों पर कीचड़ उनके खुद के लिये बरनौल का काम करेगा। सच पूछिए तो अंदर ही अंदर ये नेता अब भी ऐसे बरनौल की तलाश में हैं, जो चिंगारी के असर को ठंडा कर सके।













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