Meerut Seat: मेरठ लोकसभा सीट का सियासी इतिहास, कभी यहां से एक साथ चुने गए थे तीन सांसद
गंगा और यमुना के बीच में बसा एक शहर मेरठ जो क्रांति और कौशल की धरा मानी जाती है। ये शहर राजनीति में भी अपनी खास पहचान रखता है। बीजेपी ने मेरठ से लोकप्रिय धारावाहिक रामायण में भगवान राम का किरदार निभाने वाले अरुण गोविल को टिकट दिया है। तभी से यह सीट चर्चाओं का केंद्र बन गई है।
इस सीट से बीजेपी ने जहां अरुण गोविल को मैदान में उतारा है, वहीं समाजवादी पार्टी ने एडवोकेट भानु प्रताप सिंह को कैंडिडेट बनाया है। जबकि बहुजन समाज पार्टी ने देवव्रत त्यागी को मैदान में उतारा है। हालांकि, इस बीच अब खबरें ये आ रही हैं कि अरुण गोविल के मैदान में आने के बाद से समाजवादी पार्टी मेरठ लोकसभा सीट से प्रत्याशी बदल सकती है।

मेरठ का पौराणिक इतिहास और सियासी वर्तमान
वैसे इस शहर का इतिहास रामायण से लेकर महाभारत तक के पौराणिक हिंदू ग्रंथों में है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक मेरठ का नाम मयराष्ट्र से निकला है जिसका अर्थ होता है मय का प्रदेश। दरअसल मय असुरों का राजा हुआ करता था और उसकी बेटी मंदोदरी थी, जो रावण की पत्नी थीं। इसलिए मेरठ को रावण की ससुराल भी कहा जाता है। यही नहीं महाभारत काल में कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर थी, जो वर्तमान में मेरठ जिले के अंतर्गत ही आता था।
जबकि आज के परिदृश्य में यह शहर खेलों से जुड़े अपने प्रोडक्ट की वजह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यह पश्चिम उत्तर प्रदेश का प्रमुख व्यापारिक केंद्र भी माना जाता है। आज मेरठ जिले के तहत 5 विधानसभा सीटें (मेरठ कैंट, मेरठ, मेरठ साउथ, किठौर और हापुड़) आती हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो बीजेपी ने 3 सीटों और सपा ने 2 सीटों पर जीत दर्ज की थी। जबकि वर्तमान में यहां के सांसद बीजेपी के राजेंद्र अग्रवाल हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव में यहां बीजेपी और बसपा के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला था। बीजेपी के उम्मीदवार राजेंद्र अग्रवाल महज 4,729 मतों के अंतर से जीतकर संसद पहुंचे थे। राजेंद्र अग्रवाल को 5,86,184 वोट (48.19% वोट) मिले थे। जबकि बसपा के उम्मीदवार हाजी मोहम्मद याकूब को 5,81,455 वोट (47.8% वोट दर) मिले थे। वहीं तीसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के उम्मीदवार हरेंद्र अग्रवाल को महज 34,479 वोट (2.83% वोट दर) ही मिले थे।
मेरठ संसदीय सीट का राजनीतिक इतिहास
आजादी के बाद साल 1952 में हुए पहले आम चुनाव में मेरठ को तीन लोकसभा क्षेत्रों मेरठ जिला (पश्चिम), मेरठ जिला (दक्षिण) और मेरठ जिला (उत्तर-पूर्व) में बांटा गया था। इन तीनों सीटों से कांग्रेस के उम्मीदवार खुशीराम शर्मा, कृष्णचंद्र शर्मा और जनरल शाहनवाज खान जीते थे। इसके बाद साल 1957 में जब दूसरा आम चुनाव हुआ तब इन सीटों को मिलाकर एक कर दिया गया। इस चुनाव में कांग्रेस के ही जनरल शाहनवाज खान ने जीत दर्ज की।
इसके बाद 1962 में भी उन्होंने जीत की हैट्रिक लगाई। लेकिन, 1967 आते-आते मेरठ का मिजाज बदला और पहली बार गैर-कांग्रेसी पार्टी 'संयुक्त सोशलिट पार्टी' के महाराज सिंह भारती जनरल शाहनवाज खान को हराकर संसद पहुंचे। हालांकि, 1971 में हुए आम चुनाव में एक बार फिर से जनरल शाहनवाज खान मेरठ लोकसभा का चुनाव जीतकर चौथी बार संसद पहुंचे। इसके बाद 1977 में भारतीय लोकदल के कैलाश प्रकाश ने कांग्रेस उम्मीदवार शाहनवाज खान को सवा लाख वोटों से करारी मात दी। इसके बाद शाहनवाज खान कभी चुनाव नहीं लड़े।
दो बार महिला उम्मीदवार ने मारी बाजी
साल 1980 में हुए सातवीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने महिला उम्मीदवार मोहसिना किदवई को जनता पार्टी (एस) के उम्मीदवार हरीश पाल के खिलाफ उतारा। मोहसिना ने हरीश पाल को 57217 वोटों से मात दी। इसके बाद साल 1984 में मोहसिना लोकदल के मंजूर अहमद को 96518 वोटों से मात देकर दूसरी बार मेरठ से लोकसभा पहुंचीं। हालांकि, तीसरी बार 1989 में हुए आम चुनाव में मोहसिना को जनता दल के हरीश पाल ने 122041 वोटों से हराकर उनके जीत के रथ को रोक दिया था। इसके बाद से आज तक कोई भी महिला प्रत्याशी मेरठ लोकसभा से नहीं जीत पाई हैं।
1991 में मेरठ से खुला भाजपा का खाता
मेरठ लोकसभा सीट पर पहली बार भाजपा ने 1991 लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। पहली बार भाजपा के उम्मीदवार ठाकुर अमरपाल सिंह मेरठ से सांसद बनकर संसद पहुंचे थे। इसके वे 1996 और 1998 में भी अमरपाल ने चुनाव जीतकर मेरठ से लोकसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाई थी। हालांकि, 1999 में हुए मध्यावधि चुनाव में अमरपाल सिंह को कांग्रेस अवतार सिंह भड़ाना ने 24836 वोटों से हरा दिया। इसके बाद साल 2004 में बसपा के उम्मीदवार शाहिद अखलाक ने राष्ट्रीय लोकदल के मलूक नागर को मेरठ लोकसभा सीट से मात दी।
भाजपा ने फिर जमाया कब्जा
साल 2009 में हुए 15वीं लोकसभा चुनाव में मेरठ से भाजपा ने राजेंद्र अग्रवाल को मैदान में उतारा। उन्होंने इस चुनाव में बसपा के उम्मीदवार मलूक नागर को 47146 वोटों से हराया। इसके बाद 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव में राजेंद्र अग्रवाल ने मेरठ सीट से जीत की हैट्रिक लगाई। कुल मिलाकर देखें तो 1991 से लेकर अब तक हुए 8 लोकसभा चुनावों में 6 बार बीजेपी को मेरठ से जीत मिली है।
दिलचस्प है 1991 लोकसभा चुनाव की कहानी
साल 1991 के चुनाव ऐसे माहौल में हुए जब मंडल कमीशन का मुद्दा और राम मंदिर मामला पूरे देश की राजनीति की दिशा तय कर रहा था। इस समय ध्रुवीकरण की राजनीति देश में तेजी से फैल रही थी। इससे अछूता मेरठ भी नहीं था। मेरठ लोकसभा सीट से तकरीबन 21 उम्मीदवार मैदान में थे। 20 मई को मतदान होना था लेकिन मतदान के दिन दोपहर तक पूरे मेरठ में बूथ कैप्चरिंग, हंगामा और हिंसा होने लगी। इस चुनावी हिंसा ने सांप्रदायिक हिंसा का रूप ले लिया था।
रिपोर्ट के मुताबिक तब कई तरह के आरोप लगाए गए थे, कहीं आरोप लगे कि वोट नहीं डालने दिया गया तो कहीं आरोप लगे कि वोट पहले ही डाल दिया गया। हिंसा के कारण मजबूरन पुलिस को कर्फ्यू लगाना पड़ा। इस हिंसा के कारण मेरठ लोकसभा के अंतर्गत 12 लोग मारे गए थे। तब चुनाव आयोग के आयुक्त टीएन शेषन थे। शेषन ने अगले ही दिन 21 मई को मेरठ का चुनाव ही रद्द कर दिया।
तब भाजपा उम्मीदवार अमरपाल सिंह समेत कई प्रत्याशियों ने चुनाव आयोग के आदेश के खिलाफ प्रत्यावेदन दिया, तो चुनाव आयोग ने नकार दिया। मामला हाईकोर्ट पहुंचा और वहां से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। तब तीन साल साल की कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट के आदेश पर आयोग ने मेरठ के प्रभावित बूथों पर दोबारा मतदान करवाकर और शेष बूथों पर 1991 में पड़े वोटों की गिनती करवाकर रिजल्ट घोषित करने का आदेश दिया। इस तरह से भाजपा उम्मीदवार अमरपाल सिंह ने 85 हजार वोटों से जीत दर्ज की। इसके बाद से ही भाजपा का खाता मेरठ से खुला था।
मेरठ संसदीय सीट का जातीय समीकरण
2019 के आंकड़ों के मुताबिक मेरठ में दलित और मुस्लिम वोटरों का दबदबा है। यहां 5 लाख 64 हजार के करीब मुस्लिम समुदाय हैं। इसके अलावा यहां जाटव बिरादरी की भूमिका खास है। इनकी आबादी करीब 3 लाख 14 हजार है। जाटों की भी आबादी करीब 1 लाख 30 हजार है। इस लोकसभा सीट पर ब्राह्मण समाज एक लाख 18 हजार, वैश्य 1 लाख 83 हजार, त्यागी समाज के लोगों की आबादी 41 हजार है। वाल्मीकि समाज के मतदाताओं की संख्या 59,000 के करीब है। वैसे गुर्जर समुदाय के लोगों की आबादी भी करीब 56,300 है।












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