Political Funding: पहले कैसे मिलता था राजनीतिक चन्दा, अन्य देशों में कैसे जुटाया जाता है चुनावी फंड
Political Funding: इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक पार्टियों को बड़ा झटका दिया है। चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बॉन्ड के पिछले पांच सालों का हिसाब-किताब भी मांगा है। अब निर्वाचन आयोग को बताना होगा कि पिछले पांच सालों में किस पार्टी को किसने कितना चंदा दिया है।
इलेक्टोरल बॉन्ड ऐसे आया अस्तित्व में
दरअसल 2017 में केंद्र सरकार ने चुनावी बॉन्ड योजना को फाइनेंस बिल के जरिए संसद में पेश किया था। संसद से पास होने के बाद 29 जनवरी 2018 को चुनावी बॉन्ड योजना का नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया। उसके बाद हाल तक इसके जरिए ही सभी राजनीतिक दलों को चंदा मिलता रहा।

हालांकि इलेक्टोरल बॉन्ड योजना के शुरू होने के बाद से ही ये इस पर सवाल उठते रहे थे। क्योंकि इस योजना के तहत कौन व्यक्ति, कंपनी, या कॉरपोरेट समूह किसको चुनावी बॉन्ड खरीदकर दे रहा है, इसकी जानकारी गुप्त रखी जाती है। राजनीतिक दल इस बॉन्ड को बैंक में भुनाकर रकम हासिल कर लेते थे।
भारतीय स्टेट बैंक की 29 शाखाओं को इलेक्टोरल बॉन्ड जारी करने और उसे इनकैश करने के लिए अधिकृत किया गया था। सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से एक करोड़ रुपये तक के इलेक्टोरल बॉन्ड्स कोई खरीद कर अपनी पसंद की राजनीतिक पार्टी को डोनेट कर सकता था।
जब 2018 में इस योजना की शुरुआत की गई तब तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने दावा किया था कि इससे राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ेगी और बिल्कुल साफ-सुथरे तरीके से पार्टियों को चंदा मिलेगा। साथ ही ब्लैक मनी रोकने में इसकी भूमिका होगी लेकिन इसकी पारदर्शिता सवालों के घेरे में रही।
चुनावी बॉन्ड से पहले कैसे मिलता था चंदा?
इस चुनावी बॉन्ड के आने से पहले देश के राजनीतिक दलों को बड़ी-बड़ी कंपनियां, संस्थाएं चेक के जरिए चंदा देती थी। इस चंदे से जुड़ी पूरी जानकारी पार्टियां अपनी सलाना रिपोर्ट में चुनाव आयोग को देती थी। इसमें चंदा देने वाले का नाम और कितना चंदा मिला सब जानकारी होती थी। इसके अलावा राजनैतिक दलों की आमदनी स्वैच्छिक दान, क्राउड फंडिंग, कूपन बेचकर, पार्टी साहित्य बेचकर, सदस्यता अभियान के जरिए भी होती थी।
सभी राजनीतिक पार्टियों के पास एक रसीद बुक हुआ करती थी। इस बुक को लेकर पार्टी के कार्यकर्ता घर-घर जाते थे और लोगों से चंदा वसूलते थे। इलेक्ट्रॉल बॉन्ड पर सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखते हुए नवंबर, 2023 में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि वित्त वर्ष 2004-05 से 2014-15 के बीच 11 साल की अवधि के दौरान राजनीतिक दलों की कुल आय का 69 फीसदी हिस्सा 'अज्ञात स्रोतों' से प्राप्त हुआ था।
कोर्ट में एडीआर रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि इस अवधि के दौरान 'अज्ञात स्रोतों' से राष्ट्रीय पार्टियों की आय 6,612.42 करोड़ रुपये और क्षेत्रीय पार्टियों की आय 1,220.56 करोड़ रुपये थी। अज्ञात स्रोत का अर्थ हुआ कि ऐसे राजनीतिक चंदे का कोई लेखा जोखा नहीं होता था। ऐसे राजनीतिक चंदे कैश में दिए जाते हैं और जो बैंकिंग सिस्टम से बाहर रहते हैं। इस कारण ऐसे चंदे को 'ब्लैक मनी' बताया जाता था।
दुनिया के अन्य देशों में कैसे चंदा जुटाती हैं पार्टियां?
अमेरिका और यूरोपीय देशों की बात करें तो यहां राजनीतिक फंडिंग में पूरी पारदर्शिता है। अमेरिका में पार्टियों को किससे कितना फंड मिल रहा है, इसकी जानकारी देने की परंपरा 1910 से चली आ रही है। वहीं यूरोपीय देशों की बात करें तो यहां साल 2014 में पार्टियों की फाइनेंसिंग को लेकर कई तरह के नियम बनाए गए। जिसमें दान की सीमा, कितना पैसा किससे मिला, सबकी जानकारी सार्वजनिक करना शामिल है।
यूरोप, अमेरिका व जर्मनी जैसे देशों में फंड जुटाने का तरीका बहुत ही परंपरागत है। जैसे भारत में पहले स्वैच्छिक दान, क्राउड फंडिंग के जरिये जुटाया जाता था। यूरोप और अमेरिका में राजनीतिक दल फंड जुटाने के लिए कंपनियों, स्टार्टअप और बड़ी-बड़ी संस्थाओं को टारगेट करते हैं। साथ ही क्राउंड फंडिंग उनका मुख्य जरिया होता है। यूरोप और अमेरिका में बड़े मीडिया हाउस इस तरह की क्राउड फंडिंग में बखूबी उनका साथ भी देते हैं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप के 2016 के प्रेसिडेंशियल कैंपेन में 69 फीसदी राशि क्राउडफंडिंग के जरिए छोटे दानदाताओं से जुटाई गई थी। पहले अमेरिकी चुनावों में सियासी दलों के कार्यकर्ता लोगों से दान मांगने घर-घर जाते थे। आज, राजनेता अपने समर्थकों से दान लेने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। अमेरिका के ज्यादातर सीनेटर इसी प्रकार की राजनीतिक क्राउडफंडिंग के सहारे रहते हैं। अब ये समर्थक समुदाय में मजबूत भावना पैदा करने का तरीका बन रहा है।
अमेरिकी कानून में चुनाव के लिए एक उम्मीदवार को कोई भी व्यक्ति 2,800 डॉलर से ज्यादा का चंदा नहीं दे सकता है। हालांकि, राष्ट्रपति के रेस में उतरा उम्मीदवार अपनी प्राइवेट प्रॉपर्टी से जितना चाहें उतना पैसा चुनाव प्रचार के लिए खर्च कर सकता है। जबकि पॉलिटिकल एक्शन कमेटियों को चुनाव प्रचार के दौरान असीमित धन जमा करने की छूट होती है। लेकिन, ये कमेटियां सीधे तौर पर उम्मीदवारों से जुड़ी नहीं होती हैं और इस खर्च की कुछ सीमाएं भी हैं।
साल 2020 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडेन पहले ऐसे कैंडिडेट थे जिन्होंने अपनी पार्टी के लिए अमेरिका के इतिहास में एक लगभग एक अरब डॉलर डोनेशन प्राप्त किया था, जबकि डोनाल्ड ट्रम्प को 596 मिलियन डॉलर डोनेशन मिला था।
जर्मनी में राजनीतिक दलों को कहां से मिलता है पैसा?
जर्मनी की बात करें तो यहां राजनीतिक दलों के पार्टी फंड और चुनाव अभियान कोष में कोई अंतर नहीं है। कैंपेनिंग को भी यहां राजनीतिक दलों के काम का हिस्सा माना जाता है। जर्मनी की कर प्रणाली यहां के राजनीतिक दलों को मदद देती है। साल 2021 में राष्ट्रीय टैक्स से राजनीतिक दलों को 20 करोड़ यूरो की वित्तीय मदद मिली। इसी रकम से चुनावी अभियानों की भी फंडिंग की जाती है।
डीडब्ल्यू की रिपोर्ट की माने तो टैक्स से मिलने वाली सबसिडी के अलावा कॉरपोरेट व वैयक्तिक दानकर्ता राजनीतिक दलों को गैर सरकारी फंड का एक बड़ा हिस्सा देते हैं। राजनीतिक पार्टियां सदस्यता शुल्क से भी भारी फंड जमा करती है। वैसे जर्मनी में सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों को संघीय सरकार से फंड मिलता है, लेकिन उन्हें दी जाने वाली धनराशि इस बात पर निर्भर करती है कि हरेक पार्टी राज्य, संघ व यूरोपीय संघ के स्तर पर चुनावों में कैसा प्रदर्शन करती हैं और उन्हें कितने वोट मिले हैं।
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