Niti Aayog Boycott: विपक्षी मुख्यमंत्रियों ने पहले भी किया है नीति आयोग की मीटिंग का बहिष्कार, कब और क्यों?
नीति आयोग की ताजा मीटिंग में स्वास्थ्य, कौशल विकास, महिला सशक्तिकरण और बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित मुद्दों पर चर्चा के लिए मुख्यमंत्रियों को बुलाया गया था।

Niti Aayog Boycott: नीति आयोग गवर्निंग काउंसिल की 27 मई (शनिवार) को हुई 8वीं बैठक की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अध्यक्षता की। इस बैठक में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, उपराज्यपाल, पदेन सदस्यों के रूप में केंद्रीय मंत्री और नीति आयोग के उपाध्यक्ष और सदस्य को भी आमंत्रित किया गया था।
इस बार सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इस बैठक से दूरी बनायी है। इन पार्टियों का यह रुख तब सामने आया, जब 21 विपक्षी दलों ने नये संसद भवन के उद्घाटन समारोह का विरोध किया है। इनमें दिल्ली के अरविंद केजरीवाल, पंजाब के भगवंत मान, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, बिहार के नीतीश कुमार, तेलंगाना के केसीआर, राजस्थान के अशोक गहलोत और केरल के पी. विजयन इस बैठक में शामिल नहीं हुए।
अब सवाल ये है कि नीति आयोग की बैठक में अगर मुख्यमंत्री शामिल नहीं होंगे तो क्या इससे आयोग के कामकाज पर कोई असर पड़ेगा? क्या मुख्यमंत्रियों को इस बैठक में रहना जरूरी है? आखिर क्या है नीति आयोग का पूरा इतिहास? आइए जानते हैं इसके बारे में।
नीति आयोग क्या है?
पीआईबी के मुताबिक नीति आयोग (NITI : नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) भारत सरकार द्वारा गठित एक नया संस्थान है। 13 अगस्त 2014 को योजना आयोग खत्म कर दिया गया और इसके स्थान पर नीति आयोग का गठन हुआ। एक जनवरी 2015 को यह अस्तित्व में आया।
नीति आयोग, योजना आयोग की तरह भारत सरकार के कार्यकालीन संकल्प (केंद्रीय मंत्रिमंडल) द्वारा बनाया गया है। इसलिए यह ना तो संवैधानिक (जिसका संविधान में जिक्र हो) है, ना ही वैधानिक (एक्ट द्वारा बनाया गया हो) है। यह एक संविधानेतर निकाय है।
नीति आयोग भारत सरकार का 'थिंक टैंक' है जो निदेशकीय और नीतिगत दोनों प्रकार के इनपुट प्रदान करता है। साथ ही यह भारत सरकार के लिए रणनीतिक और दीर्घकालीन नीतियों का ड्राफ्ट तैयार करता है और केंद्र व राज्य को प्रासंगिक तकनीकी सलाह देता है।
इस आयोग की संरचना योजना आयोग से काफी अलग है। इस आयोग में राज्य के मुख्यमंत्रियों और निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को अधिक अहम भूमिका दी गई है, जो संघीय ढांचे को मजबूत करती है।
नीति आयोग का इतिहास?
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नीति आयोग का इतिहास योजना आयोग से जुड़ा हुआ है। साल 2014 में भारत में सत्ता परिवर्तन के बाद भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने कार्य करना शुरू किया। नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2014 को भारत के स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र के लिए नई संस्था नीति आयोग लाने की घोषणा की थी, जिसके बाद एक मंत्रिमंडल के प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए 1 जनवरी 2015 में नीति आयोग का गठन किया गया।
इसके गठन का कारण ये था कि योजना आयोग में जो पॉलिसी बनती थी, वो सभी राज्यों पर समान लागू होती थी। अब सोचने वाली बात ये है कि बिहार की जो जरूरत है, हो सकता है वह इतनी जरूरत केरल की ना हो। वहीं योजना आयोग में केंद्र की भूमिका रहती थी लेकिन राज्य की नहीं। लेकिन, नीति आयोग के तहत केंद्र और राज्य मिलकर योजना बनाते हैं।
नीति आयोग की संरचना क्या है?
● अध्यक्ष: नीति आयोग का अध्यक्ष भारत का प्रधानमंत्री होता है और वर्तमान में इसके तात्कालिक अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।
● उपाध्यक्षः नीति आयोग के उपाध्यक्ष की नियुक्ति भारत के प्रधानमंत्री करते हैं। अभी सुमन बेरी इस पद पर हैं।
● गवर्निंग काउंसिल: नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल में भारत के सभी मुख्यमंत्रियों, केंद्रशासित प्रदेश के राज्यपाल और प्रशासकों को सम्मिलित किया गया है।
● विशेष आमंत्रित सदस्य: संबंधित कार्य क्षेत्र की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञ और कार्यरत लोग, विशेष आमंत्रित के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा नामित किये जाते हैं। वर्तमान में नितिन गडकरी, पीयूष गोयल, अश्विनी वैष्णव, राव इंद्रजीत सिंह और डॉ. विरेन कुमार विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में कार्य कर रहे हैं।
● पदेन सदस्य: भारत के नीति आयोग के पदेन सदस्य के रूप में चार केंद्रीय मंत्री कार्य करते है। वर्तमान में राजनाथ सिंह, अमित शाह, निर्मला सीतारमण और नरेंद्र सिंह तोमर पदेन सदस्य के रूप में कार्य कर रहे हैं।
● पूर्णकालिक सदस्य: इनकी संख्या पांच हो सकती है। वर्तमान में डॉ. वी के सारस्वत, प्रो. रमेश चंद, डॉ. वी के पॉल, डॉ. अरविंद विरमानी और परमेश्वरन अय्यर इसके पूर्णकालिक सदस्य हैं।
● अंशकालिक सदस्य: अग्रणी विश्वविद्यालय शोध संस्थानों और संबंधित संस्थानों से अधिकतम दो पदेन सदस्य, अंशकालिक सदस्य बारी के आधार पर होंगे।
● नीति आयोग के सीईओ (CEO): केंद्र के सचिव स्तर का अधिकारी, जिसे निश्चित कार्यकाल के लिए नियुक्त किया जाता है। वर्तमान में इसके सीईओ बी. वी. आर. सुब्रह्मण्यम हैं।
कब-कब आयोग की बैठक का मुख्यमंत्री ने किया विरोध?
फरवरी, 2015 में नीति आयोग की पहली बैठक दिल्ली में हुई थी। तभी से इस बैठक में कुछ मुख्यमंत्रियों का न आने का सिलसिला जारी है। इसमें सबसे ऊपर हैं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। इस बैठक को भी राजनीतिक तौर पर विपक्षी पार्टियां देखती आई है, इसलिए नीति आयोग की 8 बैठकें हो चुकी हैं। हर बार विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री इसका विरोध करते आये हैं।
● फरवरी, 2015 में पहली बैठक हुई थी। तब इस बैठक में सभी मुख्यमंत्री पहुंचे केवल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को छोड़कर। हालांकि, तब इसे लेकर कोई बयान नहीं आया था।
● दूसरी बैठक 15 जुलाई 2015 को हुई, ममता बनर्जी इसमें भी गैरहाजिर रहीं। हालांकि, नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल के अलावा नौ राज्यों के मुख्यमंत्री भी इस बैठक में नदारद रहे। जबकि जयललिता ने अपना प्रतिनिधि भेजा।
● तीसरी बैठक अप्रैल, 2017 में हुई। तब दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बैठक में शरीक ना होने का फैसला किया।
● चौथी बैठक जून, 2018 में हुई। इस दौरान दिल्ली, मणिपुर, गोवा, त्रिपुरा, सिक्किम, मिजोरम, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और ओडिशा के मुख्यमंत्री नहीं पहुंचे। लेकिन पहली बार ममता बनर्जी पहुंची थी लेकिन बीच मीटिंग से ही उठकर चलीं गई और आरोप लगाया कि मोदी सरकार, अरविंद केजरीवाल को परेशान कर रही है।
● पांचवी बैठक जून, 2019 में हुई। इस बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव इसमें शामिल नहीं हुए। हालांकि अमरिंदर सिंह ने वित्त मंत्री को भेजा था।
● छठीं बैठक 20 फरवरी, 2021 को हुई। कोरोनाकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से नीति आयोग की शासी परिषद की छठवीं बैठक हुई। इस बैठक में पश्चिम बंगाल (West Bengal) की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह शामिल नहीं हुए।
● सातवीं बैठक अगस्त, 2022 को हुई। जिसमें दो राज्यों के मुख्यमंत्री नीति आयोग की बैठक में शामिल नहीं हुए। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने केंद्र सरकार पर दोहरा रवैया अपनाने सहित कई आरोप लगाते हुए बैठक का बहिष्कार किया। वहीं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वास्थ्य कारणों से शामिल नहीं हो सके।
नीति आयोग और योजना आयोग के बीच अंतर?
● नीति आयोग एक सलाहकार थिंक टैंक के रूप में कार्य करता है। जबकि योजना आयोग गैर-संवैधानिक निकाय के रूप में कार्य करता था।
● नीति आयोग में व्यापक विशेषज्ञ सदस्य शामिल होते हैं। जबकि योजना आयोग में सीमित विशेषज्ञता थी।
● नीति आयोग सहकारी संघवाद की भावना से कार्य करता है क्योंकि राज्य समान भागीदार हैं। जबकि योजना आयोग में राज्यों ने वार्षिक योजना बैठकों में दर्शकों के रूप में भाग लिया।
● नीति आयोग में प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त सचिवों को CEO के रूप में जाना जाता है। जबकि योजना आयोग में सचिवों को सामान्य प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त किया गया था।
● नीति आयोग योजना के 'बॉटम-अप' दृष्टिकोण पर केंद्रित है। जबकि योजना आयोग में 'टॉप-डाउन' दृष्टिकोण का अनुसरण किया।
● नीति आयोग के पास नीतियां लागू करने का अधिकार नहीं है। जबकि योजना आयोग ने राज्यों पर नीतियों को लागू किया और अनुमोदित परियोजनाओं के साथ धन का आवंटन किया।
● नीति आयोग के पास निधि आवंटित करने का अधिकार नहीं है, जो वित्त मंत्री में निहित है। जबकि योजना आयोग के पास मंत्रालयों और राज्य सरकारों को निधि आवंटित करने का अधिकार था।
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