NT Rama Rao : 17 बार भगवान श्रीकृष्ण का रोल किया, सिनेमा के बाद राजनीति के भी ‘सुपरस्टार’ रहे एनटी रामा राव
पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में जोरदार सहानुभूति की लहर थी। मगर आंध्र प्रदेश की 42 सीटों में से 30 सीटों पर टीडीपी की जीत हुई थी।

NT Rama Rao : एक फिल्म अभिनेता थे, जिसे सर्किट हाउस में कमरा नहीं मिला। इस बात को अपना अपमान समझकर उसने एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया। पार्टी का नाम रखा तेलुगु देशम। जी, हां वह अभिनेता थे नन्दमूरी तारक रामा राव। एनटी रामा राव के नाम से मशहूर इस अभिनेता ने दक्षिण भारत के सिनेमा में धाक जमाई तो वहीं राजनीति में भी अपना जलवा दिखाया। 1984 में भारी बहुमत से जीतकर उन्होंने आंध्र प्रदेश में अपनी सरकार बनाई। अपने तीन कार्यकालों में सात वर्षों तक वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
28 मई 1923 को कर्नाटक में जन्में राव किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे। जब वह सिनेमा में थे तो उन्होंने एक से एक शानदार दक्षिण भारतीय फिल्में दीं। इसके बाद जब उन्होंने राजनीति की राह पकड़ी तो एक मिसाल साबित हुए। आज उनके जन्मदिन के मौके पर उनसे जुड़ी कुछ बातों के बारे में जानेंगे।
फिल्मी करियर
एनटी रामा राव ने तेलुगू फिल्म 'माना देशम' से करियर की शुरुआत की। 50 के दशक में उन्होंने भगवान कृष्ण, शूरवीर कर्ण और भगवान राम जैसे किरदारों से परिपूर्ण फिल्मों में काम किया। आपको बता दें कि रामा राव ने अपने फिल्मी करियर में 17 बार श्रीकृष्ण का रोल अदा किया था। 1963 में उनकी फिल्म लवकुश ने उस समय एक करोड़ रुपयों का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन किया था।
इसके साथ ही उन्होंने कई फिल्मों को डायरेक्ट भी किया था। श्रीनाथ कवि सर्वभौमुदु एनटी रामा राव के करियर की अंतिम फिल्म थी। आजकल इनके पोते जूनियर एनटीआर इन दिनों सुपरस्टार है। हाल ही में उनकी फिल्म RRR और उस फिल्म के गाने नाटू नाटू ने दुनिया भर में धूम मचाई थी।
राजनैतिक करियर पर एक नजर
सिनेमा जगत में योगदान देने के बाद एनटी रामा राव ने राजनीति में भी ऊंचे मुकाम हासिल किये। 1983 से 1994 के बीच वह तीन बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब देश में पीएम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के पक्ष में जोरदार सहानुभूति की लहर थी तब भी आंध्र प्रदेश में कांग्रेस जीत नहीं सकी। इतना ही नहीं उस समय तेलुगु देशम पार्टी लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल भी बन गयी।
यह एनटीआर ही थे जिन्होंने राजनैतिक रथ यात्राओं का प्रचलन शुरू किया था। उस समय उन्होंने 9 महीनों में 40 हजार किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा की। लोगों से मिले। उनकी परेशानियों को जाना। इस बात को लेकर उनका नाम 'गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में भी दर्ज हुआ।
दामाद ने किया भीतरघात
उनकी सरकार को 1995 में उनके ही दामाद चंद्रबाबू नायडू ने गिरवा दिया था। इस बारे में 'एनटीआर अ पोलिटिकल बॉयोग्राफी' में रामचंद्र मूर्ति कोंडूभाटला ने लिखा कि जिस तरह से नायडू ने एनटीआर के खिलाफ माहौल बनाया था, वह उनकी राजनैतिक रणनीति की चतुराई का नमूना था। चंद्रबाबू नायडू ने अपने साले डॉक्टर दग्गूबती वैंकटेश्वर राव को उप-मुख्यमंत्री पद का लालच देकर अपनी तरफ कर लिया। जबकि बुजुर्ग एनटीआर अपने दामाद नायडू की महत्वाकांक्षाओं को पढ़ पाने में पूरी तरह नाकाम रहे थे।
उस समय नायडू ने अपने पक्ष में 171 विधायक कर लिए थे। होटल वायसराय से उन्होंने राज्यपाल को फैक्स किया कि एनटी रामाराव विधानसभा में अपना बहुमत खो चुके हैं। इसके बाद राज्यपाल ने राव को 30 अगस्त तक बहुमत सिद्ध करने का समय दिया। इस दौरान एनटीआर बीमार हो गए और जब उन्हें देखने राज्यपाल अस्पताल में गए तो वहां पर एनटीआर ने अपना इस्तीफा उनको सौंप दिया। इसके बाद चंद्रबाबू नायडू ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली।
प्रधानमंत्री पद पाने को पहने महिलाओं के कपड़े
जेडीयू नेता और पूर्व सांसद के.सी. त्यागी का हिंदी अखबार में एक लेख प्रकाशित हुआ। इसमें उन्होंने दावा किया था कि एनटीआर पीएम बनने की इच्छा रखते थे। इसके लिए किसी ज्योतिषी के कहने पर वह रात के वक्त महिलाओं के कपड़े पहनकर सोते थे। इतना ही नहीं हिंदी सीखने के लिए दो लोग भी नियुक्त कर लिए थे। 18 जनवरी 1996 को हार्ट अटैक से एनटीआर का निधन हो गया। उनको साल 1968 में पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजा गया था।












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