Neelam Sanjiva Reddy: मुख्यमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, राष्ट्रपति रहे नीलम संजीव रेड्डी, मगर फिर भी भुला दिये गये?
1956 में आंध्र प्रदेश का गठन हुआ तो नीलम संजीव रेड्डी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। इसके बाद लोकसभा के अध्यक्ष और फिर 1977 में देश के छठे राष्ट्रपति बने। उनका जन्म 19 मई 1913 को हुआ था।

Neelam Sanjiva Reddy: 1977 में राष्ट्रपति चुनाव हुए। नीलम संजीव रेड्डी ने निर्विरोध वह चुनाव जीता। यह इतना आसान नहीं था। उस समय 37 उम्मीदवारों ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन का पर्चा भरा था। पर किस्मत का खेल कहें या कुछ और, तत्कालीन राष्ट्रपति चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर अवतार सिंह ने नामांकन पत्रों की जांच की तो रेड्डी के सिवा अन्य सभी 36 उम्मीदवारों के नामांकन शर्तों पर खरे नहीं उतर सके। इस तरह, चुनाव मैदान में एकमात्र उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी बचे और मतदान करवाने की जरूरत नहीं पड़ी। इस तरह देश को छठा राष्ट्रपति मिल गया।
नीलम संजीव रेड्डी का जन्म 19 मई 1913 को इल्लुर ग्राम, अनंतपुर जिले में हुआ था। आंध्र प्रदेश के कृषक परिवार में जन्मे नीलम संजीव रेड्डी की छवि अनुभवी राजनेता, कवि और कुशल प्रशासक के रूप में थी। भारत के सबसे युवा राष्ट्रपति के तौर पर निर्वाचित हुए नीलम संजीव रेड्डी ने 1 जून 1996 को दुनिया को अलविदा कहा था। आइये जानते हैं उनके राजनैतिक जीवन से जुड़े कुछ रोचक पहलू।
आंध्र प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री
नीलम संजीव रेड्डी पहले ऐसे राजनेता थे, जो राष्ट्रपति पद पर पहुंचने से पहले एक राज्य के मुख्यमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष पद पर भी रहे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की थी। साल 1946 में कांग्रेस पार्टी से मद्रास विधानसभा के लिए चुने गये। पार्टी ने उन्हें विधायक दल का सचिव नियुक्त कर दिया।
रेड्डी 1949 से 1951 तक मद्रास प्रांत के मंत्री रहे। उस समय आंध्र प्रदेश, मद्रास प्रेजिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था। 1 अक्टूबर 1953 को आन्ध्र ने कर्नूल को अपनी राजधानी बनाया। फिर साल 1956 में आंध्र प्रदेश को राज्य बनाने के लिए हैदराबाद के तेलूगु भाषी हिस्से के साथ विलय कर दिया गया। जब आंध्र प्रदेश राज्य का गठन हुआ तो रेड्डी उसके पहले मुख्यमंत्री बने। इसके बाद साल 1959 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया तो उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। साल 1962 में वह फिर से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।
तीन प्रधानमंत्रियों के साथ किया काम
अमूमन देखा जाता है कि राष्ट्रपति अपने एक कार्यकाल में एक या दो प्रधानमंत्रियों के साथ काम करते हैं। पर नीलम संजीव रेड्डी ने अपने राष्ट्रपति के कार्यकाल में एक नहीं बल्कि तीन-तीन प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया। इनमें जनता पार्टी के मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह सहित कांग्रेस की इंदिरा गांधी शामिल थीं।
गौरतलब है कि इंदिरा गांधी ने 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में नीलम संजीव रेड्डी के नामांकन का विरोध किया था। इस बात से रेड्डी इतने दुखी हो गये थे कि उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ही ले लिया और अपने गृह अनंतपुर जाकर खेती-बाड़ी करने लगे। फिर 1977 में वह राष्ट्रपति भी बने और 1980 में इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ भी दिलवाई।
सन्यास के बाद फिर शुरू की राजनीति
नीलम संजीव रेड्डी ने इंदिरा गांधी से मतभेदों के बाद राजनीति से सन्यास लिया और फिर दुबारा सार्वजनिक तौर पर राजनीति की शुरूआत की। अपनी वापसी के बारे में रेड्डी ने अपनी आत्मकथा 'विदाउट फियर ऑर फेवर' में लिखा कि "1975 में आपातकाल लगने से पहले जेपी (जय प्रकाश नारायण) को हैदराबाद में एक जनसभा में भाषण देना था। मैं भी शहर में ही था। जेपी का भाषण सुनने मैं भी सभा में पहुंच गया और आम जनता के बीच जाकर बैठ गया। वहीं इस बीच मंच पर जेपी के साथ बैठे हुए कुछ लोगों ने मुझे पहचान लिया और यह बात जेपी को बता दी। मुझे न चाहते हुए भी जेपी के आग्रह पर मंच पर जाना पड़ा।"
नहीं ली पूरी सैलरी
नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति पद पर रहते हुए मात्र तीस प्रतिशत सैलरी ही लेते थे। अपनी सैलरी का 70 प्रतिशत हिस्सा वह सरकारी निधि में दे देते थे। उन्होंने अन्य राष्ट्रपतियों की तरह नौकर-चाकरों का अमला अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए नहीं रखा। वे 1952 में पहली बार राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे और तीन बार इस ऊपरी सदन के सदस्य रहे। इसके अलावा, उन्होंने इंदिरा सरकार में जनवरी 1966 से मार्च 1967 तक परिवहन, नागरिक उड्डयन और पर्यटन मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली।
लोकसभा अध्यक्ष रहते विपक्ष ने नहीं किया वॉकआउट
'इंडिया: पास्ट एंड प्रेजेंट' पुस्तक में प्रकाश चंदर लिखते है कि "रेड्डी के लिये सत्ता लोगों का कल्याण करने का माध्यम थी। लोकसभा अध्यक्ष के रूप में रेड्डी न केवल निष्पक्ष प्रतीत रहते थे बल्कि उन्होंने इसका अभ्यास भी किया।" चंदर आगे लिखते है कि उन्होंने बतौर अध्यक्ष सदन की कार्यवाही इतनी कुशलता से संचालित की कि एक भी ऐसा अवसर ऐसा नहीं आया जब विपक्ष ने सदन से वॉकआउट किया हो।












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