Autism: संभव होगा ऑटिज़्म का इलाज

Autism: हाल ही में प्रकाशित नेचर न्यूरोसाइंस जर्नल के अनुसार भविष्य में ऑटिज़्म का निदान और इलाज संभव हो सकता है। येल यूनिवर्सिटी के नेतृत्व वाले एक नए अध्ययन के अनुसार मस्तिष्क के विकास की शुरुआत के कुछ ही हफ्तों बाद उत्पन्न होने वाली दो अलग-अलग न्यूरोडेवलपमेंटल असामान्यताएं ऑटिज्म स्पेक्ट्रम के लिए जिम्मेदार हो सकती हैं। शोधकर्ताओं ने ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों की स्टेम कोशिकाओं से मस्तिष्क ऑर्गेनोइड विकसित किया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि विशिष्ट असामान्यताएं बच्चे के मस्तिष्क के आकार से तय होती हैं। यह रिपोर्ट 10 अगस्त 23 को प्रकाशित हुई है।

येल स्कूल ऑफ मेडिसिन के चाइल्ड स्टडी सेंटर में प्रोफेसर हैरिस और डॉ. फ्लोरा वैकारिनो का कहना है कि समान लक्षण वाले बच्चों में दो अलग-अलग प्रकार के परिवर्तित तंत्रिका नेटवर्क होते हैं। ऑटिज्म से पीड़ित 13 लड़कों की स्टेम कोशिकाओं के अध्ययन, जिसमें मैक्रोसेफली से पीड़ित आठ लड़के शामिल थे, से पता चलता है कि आटिज्म पीड़ित बच्चों का सिर बड़ा हो जाता है। एक येल टीम ने एक प्रयोगशाला डिश में मस्तिष्क ऑर्गेनॉइड (विकासशील मस्तिष्क की छोटी, त्रि-आयामी प्रतिकृतियां) बनाईं। जो भ्रूण में न्यूरोनल विकास को दर्शाने वाली हैं। फिर उन्होंने इन प्रभावित बच्चों के मस्तिष्क के विकास की तुलना उनके पिता से की। ऑटिज्म के लगभग 20 प्रतिशत मामलों में मैक्रोसेफली वाले बच्चे के सिर का आकार जन्म के समय 90 प्रतिशत या उससे अधिक होता है। ऑटिज़्म के मामलों में ये अधिक गंभीर होते हैं।

Nature Neuroscience journal report treatment of autism may be possible in the future

4 साल के बच्चों में ऑटिज़्म की शीघ्र पहचान

अध्ययन के अनुसार 2016 में पैदा हुए बच्चों में 2012 में पैदा हुए बच्चों की तुलना में 4 साल की उम्र तक ऑटिज़्म के इलाज की 56 प्रतिशत से अधिक सम्भावना थी। यह देखा गया कि लड़कियों के मुकाबले लड़कों में ऑटिज़्म से पीड़ितों की संख्या ज्यादा है। ऑटिज़्म से पीड़ित प्रत्येक चार में से तीन बच्चों का परीक्षण तब किया जा चुका था जब वे 3 वर्ष के थे।

ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों के साथ सामाजिक होना और दोस्त बनाना आसान नहीं होता है। ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर या एएसडी से पीड़ित लोग अन्य लोगों की तुलना में अधिक संघर्ष करते हैं। उनके लिए दूसरों के साथ संवाद करना कई बार बहुत मुश्किल होता है। लेकिन कई बार देखा गया है कि एएसडी से पीड़ित लोगों में कुछ अत्यधिक प्रतिभावान होने से लेकर गंभीर चुनौतियों का सामना करने वाले भी होते हैं।

वैज्ञानिक अभी भी एएसडी के सटीक कारणों को नहीं जानते हैं। जीन, जीव विज्ञान और पर्यावरण सभी इसके लिए कारण हो सकते हैं। एएसडी से पीड़ित अपने नाम पर प्रतिक्रिया नहीं देते, आंखों से संपर्क करने से भी बचते हैं। ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे आमतौर पर यह नहीं समझ पाते हैं कि दूसरे बच्चों के साथ कैसे खेलें या उनके साथ कैसे जुड़ें।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में बाल मानसिक स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ डॉ. डेनिस वॉल बताते हैं, ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे उतने सामाजिक नहीं होते हैं। उन्हें उस सामाजिक दुनिया में लाने की जरूरत है। शोधकर्ता ऑटिज़्म से पीड़ित लोगों को बेहतर ढंग से शामिल करने के तरीकों का अध्ययन कर रहे हैं। वे ऐसे उपकरण विकसित कर रहे हैं जो भावनाओं को सीखने और दूसरों के साथ बातचीत करने में सहायता करते हैं। एएसडी के लक्षण आमतौर पर दो साल की उम्र के आसपास दिखाई देते हैं। इसीलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि 18 से 24 महीने के बच्चों की ऑटिज्म की जांच करा ली जाए।

शोधकर्ता व्यवहार संबंधी लक्षण प्रकट होने से पहले मस्तिष्क में होने वाले परिवर्तनों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि जोखिम वाले बच्चों की पहचान जल्दी कर सकते हैं, तो आप उनके विकास पर अधिक बारीकी से नज़र रख सकते हैं और तत्काल उपाय कर उस जोखिम को कम करने का प्रयास कर सकते हैं।

अमेरिका के मनोचिकित्सक व प्रतिष्ठित प्रोफेसर जो पिवेन कहते हैं कि हमने जीवन के पहले वर्ष में मस्तिष्क को देखा और अनुमान लगाया कि उनमें से कौन से बच्चे में दो साल की उम्र में ऑटिज़्म मिलेगा, हमने पाया कि जिन बच्चों में ऑटिज्म विकसित हुआ, उनके मस्तिष्क की सतह के हिस्से मूल रूप से तुलनात्मक बच्चों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़े। उन्होंने मस्तिष्क नेटवर्क के कार्य करने के तरीके में भी अंतर पाया। उनकी टीम अब अधिक बच्चों के साथ अध्ययन में इन परिणामों की पुष्टि करने की कोशिश कर रही है। प्रोफेसर पिवेन का कहना है कि यदि शैशवास्था में कोशिश की जाए तो मस्तिष्क को बदलना आसान हो सकता है।

ऑटिज्म के वर्तमान उपचार में व्यवहार थेरेपी को भी शामिल किया जा रहा है। इसे व्यवहार विश्लेषण, या एबीए, थेरेपी कहा जाता है। यह थेरेपी चेहरे की भावनाओं की समझ को मजबूत करने के लिए फ्लैश कार्ड जैसे उपकरणों का उपयोग करती है। इसलिए फ्लैशकार्ड में खुश चेहरे और उदास चेहरे रखे जाते हैं। इस थेरेपी का कम्प्यूटरीकृत संस्करण भी बनाया गया है। यह इयर पीस के माध्यम से भावनाओं को व्यक्त करने वाली एक कम्प्यूटरीकृत आवाज भी निकालता है।

ऑटिज्म से पीड़ित जिन बच्चों के साथ इस तकनीक का उपयोग किया गया, उनके सामाजिक व्यवहार में सुधार पाया गया। अब बच्चों को भावनाओं पर अभिनय करना सीखने में मदद करने के लिए एक ऐप भी बाजार में आने वाला है। यह ऐप एक गेम की तरह काम करता है।

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