वीरता पुरस्कार से सम्मानित पुट्टीजुंगशी की साहसिक कहानी
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। 26 मई, 2005, वक्त था दिन के एक-दो बजे का। जगह थी नगालैंड का मोकोकचुंग शहर। उस शहर पर बारिश का कहर। उस दिन बारिश बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। लग रहा था कि अनेकों बादल एक साथ फट गए हों। बारिश का मिज़ाज देख नगालैंड पुलिस में हवलदार बेंदागटोबा हिम्मत करके घर से निकले। देखा नाले में पत्थर फंसे हुए हैं। सोचा निकाल दें। बेंदागटोबा आगे बढ़े और नाले में उतर गये।

देखते ही देखते आधा शरीर दलदली मिट्टी के अंदर चला गया। बारिश हलकी हो गई थी, लेकिन वो धीरे-धीरे नाले के अंदर धंसते जा रहे थे। वो चिल्लाने लगे, 'बचाओ-बचाओ...' आस-पड़ोस के लोग बाहर निकले, और बेंदागटोबा को मौत के मुंह में जाते हुए भी देखा, लेकिन किसी ने भी नाले में उतरने की हिम्मत नहीं की। इसी बीची पुट्टीजुंगशी नाम का एक बालक अपने साथियों के साथ घर से निकले। उसने देखा हवलदार साहब के घर के बाहर भीड़ लगी है। पुट्टीजुंगशी और उसके साथी भी वहां पहुंच गए। तब तक बेंदागटोबा छाती तक कीचड़ में धंस चुके थे। उनके बचने की उम्मीद लगभग न के समान हो चुकी थी।
मौत की तलहटी
बारिश की वजह से ऊपरी पहाड़ी की ढलान से बारिश का पानी धीरे-धीरे तलहटी तक पहुंच रहा था, साथ में पत्थर और मिट्टी का मलबा भी लेकर आ रहा था। इस वजह से वहां कीचड़ और पानी का स्तर तेजी से बढ़ रहा था। तमाम लोग यह मान चुके थे कि अब बेंदागटोबा की जलसमाधि यहीं पर बन जायेगी। लेकिन पुट्टीजुंगशी ने बिना वक्त बर्बाद किए कीचड़ को हाथ से ही हटाना शुरू किया। ये देखकर कुछ और लोग उसके साथ जुट गए।
ये जटिल काम था, क्योंकि एक तरफ कीचड़ तो दूसरी तरफ खायी। कीचड़ कम होते है। देखते ही देखते पुट्टीजुंगशी के साथ पूरा मोहल्ला दलदली मिट्टी हटाने में जुट गया और बेंदागटोबा को रस्सी फेंक कर बाहर निकाल लिया गया। यह वो दिन था जब इस शहर में भूस्खलन से भी भारी तबाही हुई थी। पर पुट्टी के साहसिक कार्य को तमाम लोगों ने देखा।
2006 में मिला सम्मान
पुट्टी ने बेंदागटोबा की जान बचाने के अलावा कई ऐसे काम किये, जिसकी वजह से तमाम लोग मौत की खायी में जाने से बचे। उसके साहसिक कार्यों के लिए साल 2006 में उसे राष्ट्रीय वीरता सम्मान से नवाजा गया।
कोई नहीं आया पुट्टी के लिये
जिस पुट्टी ने भूस्खलन जैसी भयावह प्राकृतिक आापदा से लड़-लड़ कर लोगों की जानें बचाने का काम किया, जब उस पुट्टीजुंगशी के सामने मौत आकर खड़ी हुई, तब उसे बचाने के लिये कोई नहीं आया। साल 2011 में जब उसके शहर में भूस्खलन हुआ तो वह उसकी चपेट में आ गया। उनका दोस्त ईलम बताता है कि भूस्खलन के वक्त पुट्टी मदद के लिये पुकार लगाता रहा, लेकिन हर कोई अपनी जान बचाने में लगा था, जिस कारण उसकी आवाज़ किसी के कानों तक नहीं गई।
ईलम ने बताया कि इससे भी ज्यादा अफसोस की बात यह है कि पुट्टीजुंगशी की अंत्येष्टि में कोई प्रशासन का अधिकारी या नेता परिवार के प्रति संवदेना प्रकट करने के लिए उसके घर नहीं पहुंचा।












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