मालेगांव ब्‍लास्‍ट मामले में खुलने लगी परतें

वर्ष 2008 में हुए मालेगांव ब्लास्ट मामले गिरफ्तार साध्वी प्रज्ञा सहित अन्य पांच आरोपियों को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने क्लीन चिट दे दी है। एनआईएन ने अदालत में आरोप-पत्र दाखिल करते हुए इस बात को स्वीकार किया है कि साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ कोई सुबूत उपलब्ध नहीं हैं। लिहाजा अब यह तय हो गया है कि लगभग साढ़े सात साल से जेल में बंद साध्वी प्रज्ञा बाहर आएंगी। गौरतलब है कि साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित सहित अन्य आरोपियों को एटीएस द्वारा मकोका के तहत जेल में बंद रखा गया था, जिसे एनआईए ने बेहद गलत बताया है और कर्नल पुरोहित के उपर से मकोका हटाने की बात कही है। साध्वी प्रज्ञा ने क्षिप्रा नदी में लगाई डुबकी, मांगी दुआ

Malegaon Blast
एनआईए द्वारा दाखिल वर्तमान आरोप-पत्र एवं एटीएस द्वारा मकोका के तहत गिरफ्तार किये गये साध्वी प्रज्ञा सहित अन्य आरोपियों से जुड़े इस मामले को समझने के लिए कई दृष्टिकोणों से मामले के देखने की जरूरत है। चूँकि जब 29 सितम्बर को मालेगांव धमाका हुआ उसके बाद यह मामला एटीएस के पास चला गया और शुरुआती कार्रवाई एटीएस ने की थी। जब यह मामला चल रहा था तब एटीएस चीफ हेमंत करकरे थे जो 26/11 मामले में आतंकियों का शिकार बने। वर्ष 2011 में यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अंतर्गत आ गया और अपनी जांच में एनआईए ने एटीएस की तमाम कार्यवाहियों को सिरे से गलत ठहराते हुए खारिज किया है। Sadhvi Pragya Thakur's Biography: बिंदास जिंदगी से साध्वी बनने की कहानी

एनआईए ने माना है कि महज एक मोटर साइकिल को आधार बनाकर किसी को मकोका के तहत इतने वर्षों तक जेल में नहीं रखा जा सकता है। दरअसल इस पूरे मामले का अगर बहुआयामी विश्लेषण करें तो यह एक देश के अंदर की राजनीतिक साजिश के साथ-साथ अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी हिन्दुओं को लेकर एक गलत अवधारणा विकसित करने की कोशिश के रूप में नजर आता है। चूंकि मालेगांव ब्लास्ट के बाद अमेरिका का न्यूयार्क टाइम्स, लन्दन का बेलफ़ास्ट-टेलीग्राफ एवं बीबीसी ने 'हिन्दू टेरिरिज्म' शब्द का इस्तेमाल किया।

न्यूयार्क टाइम्स ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था 'कि 110 करोंड़ की जनसंख्या वाले हिन्दू बहुल देश में पहली बार पुलिस ने हिन्दू आतंकी संगठनों से जुड़े लोगों को गिरफ्तार करने की बात कहीं है। गौर करना होगा कि उधर विदेशी मीडिया हिन्दू आतंकवाद शब्द को स्थापित करने में बढ-चढ़कर काम रही थी तो वहीँ देश के कांग्रेस-नीत सरकार के मंत्री और घटक दल 'हिन्दू आतंकवाद' शब्द को स्थापित करने की कोशिश में लग गये थे। यूपीए के तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार अपने भाषणों में हिन्दू संगठनों पर निशाना साध रहे थे।

शरद पवार का जिक्र इसलिए जरुरी है क्योंकि महाराष्ट्र में तब कांग्रेस-एनसीपी की सरकार थी और गृहमंत्रालय एनसीपी के पास था। शरद पवार ने भाषण में स्पष्ट कहा था कि हिन्दू संगठनों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। मुंबई एटीएस ने इन्हीं शब्दों को अमल किया और बिना पुख्ता साक्ष्य के साध्वी प्रज्ञा को गिरफ्तार कर लिया। आरोप के तहत मुकदमा चलाने की बजाय मकोका के तहत उन्हें जेल में डाल दिया गया। मुम्बई एटीएस ने साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी की तारीख भी गलत बताई।

हिन्दू संगठनों से हुई इस गिरफ्तारी के बाद अन्तराष्ट्रीय मीडिया तो 'हिन्दू आतंकवाद' को स्थापित करने में लग ही गयी, देश का सेक्युलर खेमा भी जोर-शोर से सक्रीय हो गया। इस घटना के बाद मुंबई में 26/11 की आतंकी वारदात होती है और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दुनिया में यह कहते फिरते हैं कि यह पाकिस्तान की साजिश है, जबकि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह एक किताब '26/11 आरएसएस साजिश' का न सिर्फ विमोचन करते हैं बल्कि यहां तक कह देते हैं कि हेमंत करकरे ने उन्हें फोन पर बताया कि उनको हिन्दू संगठनों से धमकियां मिल रही हैं।

कहीं न कहीं दिग्‍विजय सिंह यह साबित करना चाहते थे कि 26/11 का हमला संघ की देन है और हेमंत करकरे को हिन्दू संगठनों ने मारा है। हालांकि आज जब एनआईए ने अपने आरोप पत्र में एटीएस पर ही तमाम सवाल खड़े किये हैं तो एक बड़ा सवाल दिग्विजय सिंह से यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर मुंबई एटीएस चीफ किस प्रोटोकॉल के तहत कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह से अपना दुखड़ा रो रहे थे? चूंकि जब हेमंत करकरे से बातचीत का दावा दिग्विजय सिंह किये हैं, उस दौरान दिग्विजय सिंह न तो देश के गृहमंत्री थे और न ही सरकार में थे। वे कांग्रेस पार्टी के महासचिव थे।

भला एक एटीएस चीफ एक राजनीतिक दल के नेता से अपना दुखड़ा क्यों साझा कर रहा था ? यह गंभीर सवाल दिग्विजय सिंह से पूछा जाना चाहिए और हेमंत करकरे पर उठाया जाना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि एटीएस को कैसे काम करना है, इसका निर्देश कांग्रेस मुख्यालय से जा रहा था ? ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि तत्कालीन एटीएस चीफ हेमंत करकरे कांग्रेस नेता के संपर्क में थे और एनआईए ने यह दावा किया है कर्नल पुरोहित के घर आरडीएक्स एटीएस ने ही रखवाया था। एनआईए ने बकायदे उस सब-इंस्पेक्टर शेखर बागडे का नाम लिया है जिसने कर्नल पुरोहित और चतुर्वेदी के घर आरडीएक्स रखा था।

यह सब कुछ किसके इशारे पर हो रहा था, इसकी जांच अवश्य होनी चाहिए। हालांकि गौर करना जरुरी है कि इधर राजनीति के मैदान से कांग्रेस और उसके सहयोगी 'हिन्दू आतंकवाद' शब्द को स्थापित करने की फिराक में जी-जान से जुटे थे तो वहीँ केंद्र सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने 'भगवा आतंकवाद' के पता चलने की बात कहकर इसे सरकारी स्वीकारोक्ति दे दी। इतना ही नहीं बल्कि 2013 में कांग्रेस-नीत सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री सुशील शिंदे ने भी 'भगवा आतंकवाद' शब्द का प्रयोग किया।

ये सबकुछ महज एक संयोग वश हो रहा था, ऐसा नहीं माना जा सकता है। जिस ढंग से कांग्रेस के नेता, सेक्युलर खेमे के प्रोफेसर्स, अन्तराष्ट्रीय मीडिया ने एक ही शब्द को वर्षों तक पकडे रखा, इससे यह साबित होता है कि ये संयोग नहीं बल्कि साजिशन किया गया कृत्य था। आज जब एनआईए ने इस मामले के तमाम पहलुओं को सामने रखा है तो इसबात की जांच भी होनी चाहिए कि वो कौन लोग हैं जो साजिश की बुनियाद रच रहे थे। वो कौन लोग हैं जो एटीएस चीफ हेमंत करकरे के संपर्क में थे ?

इसमें कोई शक नहीं कि बिना किसी आरोप के साध्वी प्रज्ञा को इतने वर्षों तक जेल में रखा गया और उन्हें प्रताड़ित किया गया। सिर्फ हिन्दू आतंकवाद को सही साबित करने और वोटबैंक को दुरुस्त करने के लिए साजिशन इतना बड़ा झूठ रचा गया। हालांकि लाख प्रयासों के बावजूद अभी तक एक भी हिन्दू आतंकवादी साबित कर पाने में ये लोग नाकाम रहे हैं। सबकुछ बता देने वाला गूगल भी एक हिन्दू आतंकवादी खोज पाने में नाकाम ही है। अगर वाकई साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ सुबूत होते तो कांगेस के छ: साल के कार्यकाल में तो कम से कम उन साक्ष्यों को रखा गया होता। लेकिन नहीं, कोई साक्ष्य नहीं, कोई सुबूत नहीं और कोई आधार नहीं बन पाने की स्थिति में साध्वी को मकोका के तहत बंद किया गया।

एनआईए की वर्तमान चार्ज शीट ने सेक्युलरिज्म की कांग्रेसी राजनीति को एकबार फिर बेपर्दा किया है। साध्वी को जब साढ़े सात साल बिना किसी पुख्ता आरोप के जेल में रखा गया था तो एक भी मानवाधिकारवादी के बोल नहीं फूटे, एक भी महिलावादी सन्गठन को इसबात का दर्द नहीं हुआ कि एक महिला को बिना किसी आरोप के क्यों प्रताड़ित किया जा रहा। दरअसल इन मानवाधिकारवादियों एवं महिलावादियों के रिहाई मंच की सच्चाई यही है कि फंड पोषित एक ख़ास एजेंडे के लिए काम करने वाले लोग हैं जो सेक्युलरिज्म का बाना ओढ़कर देश में बंटवारे की राजनीति को हवा देते हैं।

एकबार फिर साध्वी के बहाने देश के सामने इनका चेहरा बेपर्दा हुआ है। हालाँकि इतना पर्याप्त नहीं हैं। साध्वी को फंसाने वालों की जांच भी जरुरी है। जिन्होंने हिन्दू आतंकवाद के इस झूठ को सच साबित करने की बेजा कोशिश की उन्हें भी जेल में होना चाहिए, उनपर भी मुकदमा चलाया जाना चाहिए। साजिशों के बूते सियासत करने की अपनी पुरानी परम्परा से कांग्रेस अभी बाज नहीं आ रही है। यही वजह है कि देश अब उनके असलियत को पहचानने लगा है। अब इसमें कोइ शक नहीं रहा कि महज 'हिन्दू आतंकवाद' शब्द को स्थापित करने के लिए संगठित रूप से सेक्युलरिज्म के तथाकथित ठेकदार इस साजिश को अंजाम दे रहे थे, जिसमे साध्वी प्रज्ञा सहित न जाने कितने लोग वर्षों पीड़ित रहे। (लेखक परिचय: डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउन्डेशन में रिसर्च फेलो हैं)

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