Lok Sabha Elections: 17 बार हुए देश में हुए आम चुनाव, जानें क्या रहे मुख्य मुद्दे?
Lok Sabha Elections: देश में चुनाव का माहौल बनने लगा है। उम्मीद है कि मार्च में चुनाव की तारीखें आ जाएंगी। 17वीं लोकसभा का कार्यकाल मई में समाप्त हो जाएगा। समय है कि अभी तक हुए आम चुनाव पर एक नजर डालें।
15 अगस्त, 1947 में आजादी मिलने के बाद से अगले 30 सालों तक भारत में कांग्रेस ही सत्ता में रही थी। जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर रहे, जबकि दो बार गुलजारी लाल नंदा देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने।

लेकिन, आजादी के 30 साल बाद साल 1977 में देश को पहला गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री मिला, जब जनता पार्टी की सरकार बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।
भारत में अब तक 17 बार लोकसभा के लिए आम चुनाव हो चुके हैं। जिनमें 10 बार कांग्रेस की सरकार बनी, जिनमें जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में तीन चुनाव (1952, 1957, 1962), इंदिरा गांधी के नेतृत्व में तीन चुनाव (1967, 1971, 1980) राजीव गांधी के नेतृत्व में एक चुनाव (1984), पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में एक चुनाव (1991), मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दो चुनाव (2004, 2009) जीतकर कांग्रेस सरकार बनी। इनमें 1977, 1989, 1996 और 1998 के चुनाव में गठित लोकसभा अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी और क्रमश 1980, 1991, 1998 और 1999 में मध्यावधि चुनाव कराने पड़े।
1962 के लोकसभा चुनाव जीतकर नेहरू प्रधानमंत्री बने लेकिन 1964 में उनकी मृत्यु हो गई तो लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने। किंतु लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने से पहले 1966 में शास्त्री का भी देहांत हो गया तो लोकसभा का कार्यकाल (1962 -1967) पूरा होने तक एक वर्ष के लिए इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी।
इसके अलावा पांच बार भाजपा की सरकार ने शपथ ली, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी (1996, 1998, 1999) और नरेंद्र मोदी (2014, 2019) प्रधानमंत्री बने। एक बार जनता पार्टी (1977) और एक बार जनता दल (1989) की सरकार बनी। हालांकि 1996 में अटल बिहारी की सरकार मात्र 13 दिन ही चल पाई। दूसरी बार 1998 में हुए मध्यावधि चुनाव के बाद बनी अटल बिहारी सरकार भी एक वर्ष ही टिक सकी और 1999 में फिर से मध्यावधि चुनाव कराने पड़े।
आपातकाल के बाद हुए 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को बहुमत मिला और उसकी सरकार बनी (1977 में मोरारजी देसाई और 1979 में चरण सिंह प्रधानमंत्री बने), तो 1996 में अटल बिहारी सरकार के बहुमत सिद्ध करने में विफल रहने के बाद बनी संयुक्त मोर्चा सरकार में एचडी देवेगौड़ा (1996) और इंद्र कुमार गुजराल (1997) प्रधानमंत्री रहे।
1989 के चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी लेकिन विपक्षी एकता के कारण जनता दल की सरकार बनी, जिसके प्रधानमंत्री वीपी सिंह बने। 11 महीने बाद वीपी सिंह सरकार गिर गई और कांग्रेस के समर्थन से समाजवादी नेता चंद्रशेखर प्रधानमंत्री चुने गए। लेकिन वे भी मात्र 4 महीने ही सरकार चला पाए और 1991 में मध्यावधि चुनाव कराने पड़े।
जानें, किन-किन मुद्दों पर लड़े गए 17 लोकसभा चुनाव?
आजादी के बाद पहला आम चुनाव किन मुद्दों पर लड़ा गया ये तो स्पष्ट नहीं है लेकिन बीबीसी में छपे एक लेख के मुताबिक नेहरू का पहला चुनावी भाषण पंजाब में लुधियाना में हुआ। तब उन्होंने सांप्रदायिक दलों पर हमला बोलते हुए कहा था कि कुछ लोग हिंदू और सिख संस्कृति के नाम पर सांप्रदायिकता को वैसे ही बढ़ावा दे रहे हैं जैसा एक जमाने में मुस्लिम लीग ने किया था। उनकी पार्टी छुआछूत और जमींदारी की प्रथा मिटाने के लिए कृत संकल्प है। यानि पहला चुनाव धर्म, जाति, छुआछूत और सांप्रदायिकता को लेकर लड़ा गया था। नेहरू लगातार तीन चुनाव (1952, 1957, 1962) जीतने में सफल रहे।
चौथा आम सभा चुनाव बहुत खास था क्योंकि तीसरी लोकसभा का कार्यकाल देश में युद्ध, खाद्यान्न की कमी, सामाजिक तनाव और राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था। 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ, इसके बाद 1965 की भारत-पाक जंग हुई। भारत-चीन युद्ध के सदमे से बीमार हुए नेहरू की मौत हो गई। 1966 में ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की भी मौत हो चुकी थी। हिंदुस्तान ने 1962 से 1966 के 4 प्रधानमंत्रियों दौर देखा था। नेहरू, गुलजारी लाल नंदा (दो बार कार्यवाहक), लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी का।
1971 में हुए पांचवे आम चुनाव में इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने लोकसभा की 352 सीटें जीतीं। चुनाव प्रचार में इंदिरा कहती थी 'वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, हम कहते हैं गरीबी हटाओ'। 1977 में हुए छठे आम चुनाव में हवा इंदिरा गांधी के खिलाफ थी। आपातकाल के बाद हुए इस चुनाव में इंदिरा गांधी के खिलाफ नारे लगे थे - सिंहासन खाली करो, जनता आती है।
1980 में हुए सातवें चुनाव का मुद्दा खुद इंदिरा गांधी बनीं। क्योंकि, 1977 जब जनता दल के गठबंधन की सरकार बनीं तब मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाने से नाराज अन्य नेताओं ने आपस में विवाद खड़े कर दिए। जिसकी वजह से गठबंधन की सरकार गिर गई और कांग्रेस के समर्थन से चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। लेकिन 6 महीने से पहले ही कांग्रेस ने उनकी सरकार गिरा दी। 1980 में सातवां आम चुनाव हुआ और इंदिरा गांधी पुनः सत्ता में लौट आईं।
आठवां लोकसभा का चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुआ। यही इस चुनाव का एकमात्र मुद्दा भी बना। भावनाओं में बहकर लोगों ने राजीव गांधी को जमकर वोट दिया और कांग्रेस को 404 सीट मिलीं।
नौवीं लोकसभा चुनाव का मुद्दा बना बोफोर्स घोटाला, पंजाब में बढ़ता आतंकवाद, एलटीटीई और श्रीलंका सरकार से बढ़ा तनाव। इन सब कारणों से राजीव गांधी की सरकार चली गई और 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के आठवें प्रधानमंत्री बने।
साल 1989 में हुए आम चुनाव के 16 महीने बाद ही नौवीं लोकसभा भंग हो गई। देश 10वें आम चुनाव के मुहाने पर था जो कि मध्यावधि चुनाव था। साल 1991 में 10वां आम चुनाव मंडल बनाम कमंडल पर लड़ा गया। उस वक्त देश में मंडल और मंदिर का माहौल गर्म था। राम जन्मभूमि विवाद और मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के माहौल में यह चुनाव लड़ा गया था। इसी दौरान राजीव गांधी की हत्या हो गई। राजीव की मृत्यु के बाद उपजी सहानुभूति से नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी।
1996 में 11वां आम चुनाव हुआ। पीवी नरसिम्हा राव सरकार का नाम कई घोटालों में घसीटा जा चुका था। उनकी सरकार को आर्थिक सुधारों की सफलता के बावजूद हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा से निबटने में विफल माना गया। यही इस चुनाव में मुख्य मुद्दा बना और बीजेपी बड़ी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में बीजेपी के 161 जबकि कांग्रेस के 140 सांसद जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। पहली बार अटल बिहार वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी, हालांकि वाजपेई सरकार बहुमत सिद्ध नहीं कर सकी और 13 दिन बाद ही उसे हटना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से संयुक्त मोर्चा सरकार बनी जिसमें पहले एक साल एच.डी. देवगौड़ा और बाद में एक साल इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री रहे।
1998 में 12वां आम चुनाव हुआ। राजनीतिक स्थिरता को ही बीजेपी ने चुनाव का मुद्दा बनाया। बीजेपी ने चुनाव प्रचार में भ्रष्टाचार को खत्म करने और देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बात कही। 182 सीटें जीतकर आई भाजपा के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन ने सरकार बनाई लेकिन 13 महीने बाद एक मत से विश्वास मत हारने की वजह से वाजपेई सरकार गिर गई।
1999 में 13वां आम चुनाव हुआ। इस चुनाव का मुद्दा था कश्मीर। क्योंकि, जब पाकिस्तान से युद्ध हुआ तब अटल बिहारी वाजपेयी कार्यकारी प्रधानमंत्री थे। 3 मई 1999 को पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ करके युद्ध की शुरुआत की और 2 महीने तक चले युद्ध के बाद 4 जुलाई को भारतीय सेना ने कारगिल को वापस ले लिया। यही मुद्दा 1999 में चुनाव में छाया रहा और एक बार फिर वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनी।
2004 में 14वां आम चुनाव हुआ। इस चुनाव में विपक्ष के पास ऐसा कोई खास मुद्दा नहीं था, न ही अटल बिहारी वाजपेयी की तरह का कोई करिश्माई व्यक्तित्व। आत्मविश्वास से लबरेज अटल सरकार ने समय से पहले चुनाव में जाने का फैसला किया। लेकिन, नतीजा जब आया तो खुद अटल जी भी हैरान हो गए। सोनिया गांधी की अगुवाई में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी और यूपीए गठबंधन की सरकार में मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री बने। इसके बाद नरेगा से रोजगार और किसान कर्ज माफी के मुद्दों के साथ 15वें आम चुनाव में भी कांग्रेस 206 सीटों के साथ मजबूत पार्टी बनकर उभरी और मनमोहन सिंह दुबारा यूपीए सरकार में प्रधान मंत्री बने।
2014 में 16वां आम चुनाव हुआ। इस चुनाव को मोदी की आंधी चली और 10 साल तक लगातार सत्ता में रही कांग्रेस 50 सीटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाई। जबकि भाजपा ने अबकी बार मोदी सरकार, अच्छे दिन आएंगे के नारे और कांग्रेस के घोटालों का मुद्दा उठाया और गुजरात मॉडल को दिखाकर 282 सीटों पर बीजेपी अकेले विजयी रही और पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल किया।
2019 में हुआ 17वां आम चुनाव। इस चुनाव में राहुल गांधी को आगे करके कांग्रेस ने किसान, नौकरी, राफेल, एनआरसी, मॉब लिचिंग, 'चौकीदार चोर है' जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार को खूब घेरा। दूसरी तरफ बीजेपी ने पीएम मोदी के मजबूत नेतृत्व, आतंकवाद पर नियंत्रण, देश का विकास, विभिन्न वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं, राम मंदिर और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों का खूब भुनाया। इसका फायदा बीजेपी को मिला। बीजेपी ने 303 सीटों पर जीत हासिल की।












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