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क्यों होने लगी है आर्थिक असमानता पर चर्चा?

Aarthik Asamaanta: लोकसभा चुनाव 2014 के प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजस्थान के बांसवाड़ा में भाषण देते हुए आर्थिक संसाधनों के वितरण को लेकर अपने पूर्ववर्ती डॉ मनमोहन सिंह के बयानों की याद दिलाई।

पीएम मोदी ने उनके 18 साल पुराने 'देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों का पहला हक' वाले बयान का जिक्र करते हुए लोगों से पूछा कि मेहनत करके कमाई हुई आपकी संपत्ति को छीन कर वे किसको बांटेंगे?

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पीएम मोदी के भाषण के बाद अचानक राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। अब राहुल गांधी भी अपने हर चुनावी भाषण में आय के आसमान वितरण का जिक्र कर रहे हैं और यह भी दावा कर रहे हैं कि सत्ता में आएंगे तो यह विकृति दूर करेंगे।

क्या है कांग्रेस के घोषणा पत्र में

न्याय पत्र के नाम से जारी काँग्रेस के घोषणा पत्र में कहा गया है कि केंद्र में सत्ता में आने के बाद पार्टी जातिगत जनगणना के साथ ही फाइनेंशियल सर्वे भी कराएगी और एससी, एसटी, माइनॉरिटी और ईडब्ल्यूएस वर्ग की आय की गणना कर उन्हें संसाधनों में समान हिस्सेदारी प्रदान करेगी। इससे पहले दिसंबर, 2023 में भी राहुल गांधी ने हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट के एक समूह के साथ चर्चा में मोदी सरकार के 10 सालों के शासन को कुछ खास लोगों या उद्योगपतियों के हितों में काम करने का आरोप लगा कर कुछ सवाल उठाए थे। उन्होंने भारत में असमान आर्थिक वितरण की तुलना पश्चिमी देशों के साथ भी की थी।

मोदी ने मनमोहन सिंह के बहाने काँग्रेस को घेरा

9 दिसंबर 2006 को राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में मनमोहन सिंह ने अपने संबोधन में कहा था कि हमें ऐसी नई योजनाएं बनानी होंगी जिससे अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिमों को विकास में समान भागीदारी मिल सके। देश के संसाधनों पर उनका पहला हक होना चाहिए। पीएम मोदी ने इसे काँग्रेस की मूल सोच बताकर काँग्रेस के घोषणा पत्र पर प्रहार किया और यह बताया कि कथित एक्सरे के नाम पर काँग्रेस मेहनत से इकट्ठा किए गए धन को लोगों से छीन लेगी और माताओं बहनों का मंगल सूत्र भी दूसरों को दे देगी।

पीएम मोदी के भाषण के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, जयराम रमेश और केसी वेणुगोपाल समेत कई नेताओं ने जोर देकर कहा है कि मेनिफेस्टो में 'व्यापक सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना' का समर्थन किया गया है, ना कि किसी से कुछ लेकर बांटने की बात नहीं कही गई है।

आखिर क्या है यह आर्थिक असमानता

आर्थिक असमानता पर मचे सियासी घमासान के बीच यह लोगों को जानना जरूरी है कि आय के वितरण में भारी अंतर के मायने क्या हैं और यूपीए एवं एनडीए सरकारों के आर्थिक फैसले, योजनाओं और स्कीम से भारत की जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय में क्या बदलाव आया है। इसके साथ ही दुनिया में इसकी क्या स्थिति है।

किसी व्यक्तियों के समूह, आबादी के समूहों या देशों के बीच स्थित आर्थिक अंतर को दर्शाने वाले तथ्यों को आर्थिक असमानता कहा जाता है। कभी-कभी आय असमानता, धन असमानता, या धन के अंतर को बताने के लिए भी आर्थिक असमानता शब्द का इस्तेमाल करते हैं। अर्थशास्त्री आम तौर पर आर्थिक असमानता के अध्ययन के लिए धन, आय और खपत इन तीन मानदंडों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

समानता के विचारों, परिणामों की समानता और अवसर की समानता के लिए आर्थिक असमानता का मुद्दा हमेशा प्रासंगिक रहा है। हालांकि, समाज, ऐतिहासिक काल, आर्थिक संरचनाओं और प्रणालियों के बीच आर्थिक असमानता बदलती रहती है। शोध से पता चलता है कि आर्थिक असमानता विकास में बाधा डालती है।

पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के बाद भी क्यों है असमानता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से ऊपर उठकर पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में सफल हुई है। भारत ने इस दौरान ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इटली और ब्राजील को पीछे छोड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने अक्टूबर, 2022 में ही अनुमान जताया था कि भारत साल 2027-28 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इसके साथ ही वैश्विक वित्तीय फर्म मॉर्गन स्टैनली ने भी अनुमान लगाया है कि साल 2027 तक भारत अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

मौजूदा समय में तीसरे स्थान पर जापान की अर्थव्यवस्था है। यानि भारत ने कुल मिलाकर पहले की तुलना में अधिक संपत्ति अर्जित की है।
देशों की अर्थव्यवस्था की मजबूती जीडीपी के आकार से ही तय की जाती है। पीएम मोदी के 10 साल के कार्यकाल में भारत की जीडीपी में भी तेज उछाल दर्ज किया गया है।

कांग्रेस के कार्यकाल में भी साल 2010 में जीडीपी की अधिकतम विकास दर 8.5 प्रतिशत दर्ज की गई थी। लेकिन पीएम मोदी के कार्यकाल में साल 2014 से 2023 के बीच भारत के जीडीपी में कुल 83 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई है। यह पड़ोसी देश चीन से महज एक प्रतिशत कम है। हालांकि, कोविड-19 महामारी के दौर में दुनिया की सभी अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारत में वृद्धि की जगह गिरावट दर्ज की गई थी।

क्या जनसंख्या वृद्धि है असमान आर्थिक वितरण का कारण?

देश की अर्थव्यवस्था का बढ़ना सकारात्मक तथ्य होने के बावजूद यह विकास का इकलौता पैमाना नहीं है। क्योंकि देश के नागरिकों की समृद्धि जानने के लिए प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों को देखा जाता है। देश की कुल आबादी से जीडीपी को भाग देने पर जो रकम मिलती है वह देश के एक व्यक्ति की एक साल की औसत आय या प्रति व्यक्ति आय कही जाती है।

जीडीपी के मामले में दुनिया में पांचवे नंबर पर पहुंचा भारत प्रति व्यक्ति आय के मामले में दुनिया के पहले 100 देशों में भी नहीं है। अर्थशास्त्र के जानकार इसके लिए जनसंख्या विस्फोट और असमान आर्थिक वितरण को ही कसूरवार ठहराते हैं। प्रतिष्ठित सामाजिक संस्था ऑक्सफैम के मुताबिक, भारत के एक प्रतिशत लोगों के पास देश की चालीस फीसदी संपत्ति है। जोहान्सबर्ग स्थित कंपनी न्यू वर्ल्ड वेल्थ द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत विश्व स्तर पर दूसरा सबसे असमान देश है, जहां कुछ करोड़पति देश की 54 प्रतिशत संपत्ति के मालिक हैं, पर औसत भारतीय अपेक्षाकृत बहुत गरीब है।

लेकिन यदि अधिकांश भारतीयों को सम्मानजनक मानव जीवन जीने के लिए बुनियादी सामाजिक सुविधाओं तक आसान पहुंच हो जाती है तो असमान वितरण की चुभन कम महसूस होती है। पीएम मोदी ने यह किया है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक लाभ के साथ मिश्रित रोजगार के अवसर भी दिए हैं। इससे लोगों के गरीबी से बाहर आने और मध्यम वर्ग में शामिल होने की संभावना बढ़ जाती है।

क्या राहुल गांधी के तरीके से असमान वितरण का मामला सुलझ जाएगा?

तमाम एक्सपर्ट की राय है कि यह तरीका चुनाव में वोट प्राप्त करने का तो हो सकता है, लेकिन किसी से संपति लेकर किसी अन्य को देने का आइडिया एकदम बेकार है। किसी भी देश में आर्थिक समानता स्किल में सुधार और आर्थिक गतिविधियों में अधिकतर लोगों को शामिल कर के ही हो सकती है। यदि आने वाली सरकार तत्काल और साहसिक कदम उठाती है तो यह स्थिति कुछ सालों में बदल सकती है।

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