Internet Shutdown: जानें किस नियम के तहत बंद की जाती है इंटरनेट सेवा
Internet Shutdown: हरियाणा के कुछ इलाके अभी हिंसा की चपेट में है। दो समुदायों के बीच जारी हिंसा में अब तक छह लोगों की जान चली गई है और 60 से अधिक लोग घायल हुए हैं। हरियाणा के नूंह में हुई हिंसा के बाद साइबर सिटी गुरुग्राम के अलावा नूंह, फरीदाबाद, पलवल, सोहाना और पटौदी में इंटरनेट सेवा 5 अगस्त तक स्थगित कर दी गयी है। इस वजह से लाखों लोग परेशान हैं। परेशानी स्वाभाविक इसलिए भी है क्योंकि इंटरनेट सेवा का उपयोग करने के मामले में दुनिया में चीन के बाद दूसरे स्थान पर भारत आता है।
राज्यों में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य प्रशासन इंटरनेट सेवा अस्थायी रूप से अक्सर बंद कर देता है। इससे पहले मणिपुर में हुई हिंसा के बाद भी यह सेवा बंद की गयी थी। जम्मू-कश्मीर में तो ऐसा कई बार किया गया है। राजस्थान और गुजरात में तो इंटरनेट सेवा बंद किए जाने पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गयी थी।

क्या कहता है कानून?
प्रशासनिक अधिकारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों या दंगों को शांत करने के लिए इंटरनेट सेवा पर रोक लगाने का काम करते हैं। उनके लिए इंटरनेट शट डाउन एक तात्कालिक उपाय है ताकि ऐसी किसी भी अफवाह या जानकारी को फैलने से रोका जा सके जिससे हिंसा भड़क सकती है या जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है।
इंटरनेट सेवा का उपयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत मिले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के तहत आता है। इंटरनेट सेवा को अस्थायी रूप से स्थगित किया जा सकता है लेकिन इसे अनिश्चित काल के लिए बंद नहीं किया जा सकता। हालांकि 'द टेम्परेरी सस्पेंशन ऑफ टेलीकॉम सर्विसेज' यानी दूरसंचार सेवाओं का अस्थायी निलंबन (सार्वजनिक आपातकाल या सार्वजनिक सुरक्षा) नियम, 2017 का इस्तेमाल राज्य सरकारें कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए करती हैं।
8 अगस्त 2017 को जारी भारत सरकार के गजट नोटिफिकेशन के अनुसार, केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के सचिव या राज्य सरकार के गृह सचिव की अनुमति के बिना इंटरनेट सेवा को स्थगित नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में कहें तो इंटरनेट शटडाउन का आदेश देने का अधिकार केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव स्तर से नीचे के अधिकारी के पास नहीं है। फिलहाल कोई जिलाधिकारी या अन्य प्रशासनिक अधिकारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आपातकाल में ऐसा करता है तो उसे 24 घंटे के अंदर राज्य के गृह सचिव से इसकी स्वीकृति लेनी होगी, ऐसा नहीं करने की स्थिति में यह खुद ब खुद अमान्य हो जाएगा।
2017 में इस कानून के लागू होने से पहले यह अधिकार जिलाधिकारी के पास होता था। तब जिलाधिकारी सीआरपीसी की धारा 144 के तहत इंटरनेट सेवा बंद करने का आदेश जारी करते थे।
कैसे बंद की जाती है इंटरनेट सेवा
इसमें प्रशासन जरूरत पड़ने पर इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर को किसी खास क्षेत्र में नेटवर्क कनेक्टिविटी बंद करने का आदेश दे सकता है। इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर इंटरनेट पर मौजूद सभी वेबसाइट और सर्वर के आईपी एड्रेस तक यूजर की पहुंच रोक देते हैं। इसके लिए सर्विस प्रोवाइडर डीएनडी ब्लॉकिंग, स्पीड थ्रॉटलिंग, ब्लैकलिस्टिंग जैसे तरीकों का भी इस्तेमाल करते हैं।
लॉ एंड आर्डर के दौरान इंटरनेट कितना बड़ा खतरा?
विश्व आर्थिक मंच (WEF) के अनुसार वर्ष 2019 में इंटरनेट का उपयोग करने वाले 60% भारतीयों ने नेट पर स्थानीय भाषा में सामग्री देखी थी। एक दिलचस्प आंकड़ा यह भी आया कि केवल एक चौथाई इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की उम्र ही 35 वर्ष से अधिक थी। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में इंटरनेट का उपयोग करने वाली 75% आबादी युवाओं की है।
सामान्य तौर पर माना जाता है कि ये युवा किसी भी तरह की अफवाह सुनकर बहकावे में आ सकते हैं और कानून-व्यस्था के लिए समस्या पैदा कर देंगे। 31 दिसंबर 2019 तक के आंकड़ों को लें तो भारत में जियो (51.60%), एयरटेल (23.24%), वोडाफोन आइडिया (19.77%), बीएसएनएल (4.21%) और एट्रिया कन्वर्जेंस टेक्नोलॉजीज (0.21%) ग्राहकों के पांच सबसे बड़े इंटरनेट सेवा प्रदाता (आईएसपी) ब्रॉडबैंड और नैरोबैंड सेवाएं दे रहे थे। इनमें दस सबसे बड़े आईएसपी का कुल ग्राहक आधार का 99.50 प्रतिशत हिस्सा है। वैसे कुल सेवा प्रदाताओं की संख्या 358 थी।
2023 में अब तक 58 बार बंद हुई इंटरनेट सेवा
ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल वर्ष 2023 में 58 बार इंटरनेट सेवा बंद की गयी है। सबसे अधिक 2020 में यह 132 बार बंद किया गया। साल 2022 में 77 बार और साल 2021 में 101 बार यह सेवा बंद हुई। जबकि 2019 में 109 बार इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा। वहीं, अब तक सबसे अधिक 422 बार जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट सेवा बंद रही। 98 संख्या के साथ राजस्थान दूसरे नंबर पर और 32 के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर है।
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