कैसे होती है CBI डायरेक्टर की नियुक्ति, जानिये सीबीआई प्रमुखों से जुड़े पुराने विवाद

सीबीआई, भारत सरकार की प्रमुख जांच एजेंसी है। यह आपराधिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच करने का काम करती है।

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CBI Director Selection: कर्नाटक के डीजीपी प्रवीण सूद सीबीआई के नये चीफ बनने जा रहे है। मौजूदा सीबीआई चीफ सुबोध कुमार जायसवाल 25 मई को रिटायर होंगे। 13 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और लोकसभा नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी की एक उच्चस्तरीय बैठक हुई, जिसमें प्रवीण सूद के नाम पर सहमति बनी।

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      हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के रहने वाले प्रवीण सूद 1986 बैच के कर्नाटक कैडर के आईपीएस अफसर हैं। साल 2020 में उन्हें कर्नाटक का डीजीपी बनाया गया था। वैसे प्रवीण सूद को कांग्रेस नेता ज्यादा खास पसंद नहीं करते है। दरअसल, दो महीने पहले ही कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार ने प्रवीण सूद को 'नालायक' तक कह दिया था। वह उन पर भाजपा के इशारे पर काम करने का आरोप लगा चुके है। हालांकि, सीबीआई और राजनैतिक विवादों का नाता बहुत ही पुराना रहा है।

      क्या है सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति प्रक्रिया?

      सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति, भारत के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति (एसीसी) द्वारा की जाती है। एसीसी में प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस, और लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता शामिल होते हैं। नियुक्ति की प्रक्रिया गृह मंत्रालय द्वारा पात्र अधिकारियों से आवेदन आमंत्रित करने के साथ शुरू होती है।

      सीबीआई प्रमुख के पद के लिए पात्र होने के लिए एक अधिकारी के पास भारतीय पुलिस सेवा (IPS) या अन्य अखिल भारतीय सेवाओं में न्यूनतम 30 वर्ष की सेवा होनी चाहिए। अधिकारी के पास एक साफ रिकॉर्ड और किसी भी आपराधिक मामले या विभागीय जांच में अभियुक्त नहीं होना चाहिए। साथ ही अधिकारी के पास जांच, खुफिया जानकारी एकत्र करने और अभियोजन का भी अनुभव होना चाहिए।

      सीबीआई प्रमुख को हटाने की प्रक्रिया

      साल 1997 से पहले सरकार द्वारा कभी भी सही या गलत लगने पर सीबीआई प्रमुख को उनके पद से हटा दिया जाता था। कुल मिलाकर कहें तो 'रहम का पद' था। लेकिन, साल 1997 में विनीत नारायण मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद कार्यकाल को कम-से-कम दो साल का कर दिया गया, ताकि डायरेक्टर मुक्त होकर अपना काम कर सके।

      जानें सीबीआई प्रमुख से जुड़े कुछ खास विवाद

      त्रिनाथ मिश्रा - 19 नवंबर 1998 की बात है। जब सीबीआई ने मुंबई में धीरूभाई अंबानी के घर पर छापा मारा। साथ ही मुंबई और दिल्ली में रिलायंस के दफ्तरों पर भी छापेमारी की। खबरों के मुताबिक इस छापेमारी से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी खुश नहीं थे। लेकिन, सीबीआई चीफ त्रिनाथ मिश्रा ने एक जानकारी के दम पर छापा मारा था। इस छापेमारी पर विपक्ष ने बहुत हो-हंगामा किया था। इसके दो महीने बाद 4 जनवरी 1999 को उन्हें पद से हटा दिया गया।

      अमर प्रताप सिंह - मार्च 2011 में इंडिया टुडे में छपे एक लेख के मुताबिक तत्कालीन सीबीआई प्रमुख अमर प्रताप सिंह एक दिन पीएमओ पहुंचे। जहां उन्होंने सीधे तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की। इस दौरान सीबीआई सबसे चर्चित टू जी घोटाले की जांच कर रही थी। वहीं टेलिकॉम मंत्री ए. राजा सीबीआई पर इस केस में जांच धीमी करने का दबाव बना रहे थे। तब सीबीआई प्रमुख ने सीधे तौर पर मनमोहन सिंह से कहा कि अगर सरकार चाहती है कि इस केस की जांच सही तरह हो, तो मुझे आजाद होकर, बिना किसी दबाव के काम करने देना होगा।

      रंजीत सिन्हा - 1974 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे रंजीत सिन्हा साल 2012 से 2014 के बीच सीबीआई प्रमुख के पद पर रहे। अगर सबसे विवादित प्रमुख इनको कहा जाये तो गलत नहीं होगा। क्योंकि सीबीआई प्रमुख रहते हुए अपने आवास पर कोयला आवंटन (कोलगेट स्कैम) के कुछ आरोपियों से मुलाकात की थी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सिन्हा की संदिग्ध भूमिका की जांच के लिए सीबीआई को एफआईआर तक के आदेश दिये थे। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने रंजीत सिन्हा को 2जी मामले की जांच से हटा दिया था। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इसी कोलगेट स्कैम को लेकर 'पिंजड़े में बंद तोता' तक कह दिया था।

      राकेश अस्थाना - 2 दिसंबर 2016 को अनिल सिन्हा द्वारा सीबीआई प्रमुख का पद छोड़ने के बाद राकेश अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर के तौर पर सीबीआई प्रमुख का पद संभालने का जिम्मा दिया गया। इस पद पर वो 1 फरवरी 2017 तक रहे। तब उन पर कोई आरोप नहीं लगा। लेकिन, जब आलोक कुमार वर्मा ने सीबीआई प्रमुख का पद संभाला तब विवाद देखने को मिला।

      आलोक कुमार वर्मा - 1 फरवरी 2017 को आलोक वर्मा ने सीबीआई प्रमुख का पद संभाला। इसके बाद अक्टूबर 2018 में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना ने एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया। दोनों ने कोर्ट का भी रूख किया। जबकि आलोक वर्मा ने अस्थाना के खिलाफ 15 अक्टूबर 2018 को एफआईआर भी दर्ज कर ली। तब पीएमओ को बीच में आना पड़ा और 24 अक्टूबर 2018 को वर्मा और अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया गया। जिसके बाद वर्मा सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, फिर 8 जनवरी, 2019 को वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद पर लौटने की इजाजत दे दी। लेकिन, सीवीसी कमिटी ने 48 घंटे के अंदर उन्हें सीबीआई प्रमुख के पद से 10 जनवरी, 2019 को हटा दिया।

      नागेश्वर राव - आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना विवाद के बीच 24 अक्टबर, 2018 को नागेश्वर राव को सीबीआई का अंतरिम निदेशक बनाया गया था। इस नियुक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई। आरोप लगा कि सरकार ने निदेशक की नियुक्ति में पारदर्शिता नहीं दिखाई है। साथ ही नागेश्वर राव के पद संभालते ही दर्जनभर अधिकारियों का तबादला इधर से उधर कर दिया गया। जिसके खिलाफ भी कुछ अधिकारी नागेश्वर राव के खिलाफ शिकायत लेकर कोर्ट पहुंचे थे।

      क्या है सीबीआई का इतिहास?

      दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भ्रष्टाचार के मामलों से निपटने के लिए साल 1941 में ब्रिटिश सरकार ने स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट का गठन किया गया था। इसके बाद 1943 में फिर स्पेशल पुलिस फोर्स का गठन हुआ। जब विश्व युद्ध खत्म हुआ तो 1946 में दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट लागू किया गया। तब इसे स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट ही कहा जाता था।

      इसके बाद 1963 में इसका नाम सीबीआई (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन) रखा गया। इसकी स्थापना गृह मंत्रालय के एक प्रस्ताव द्वारा की गई थी। यह दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 से अपनी शक्तियां प्राप्त करता है। यह केंद्र सरकार की एक प्रमुख अन्वेषण एजेंसी है। यह केंद्रीय सतर्कता आयोग और लोकपाल को भी सहायता प्रदान करता है। साथ ही यह भारत में एक नोडल पुलिस एजेंसी है जो इंटरपोल सदस्य देशों की जांच में साथ देती है।

      अब सीबीआई कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में आता है। सीबीआई के पास IPC में 69 केंद्रीय कानूनों, 18 राज्य अधिनियमों और 231 अपराधों से संबंधित अपराधों की जांच करने का अधिकार क्षेत्र है। सीबीआई का नेतृत्व एक निदेशक करता है।

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