Thrissur Pooram: जानें विशाल हाथियों, शानदार छतरियों वाले केरल के त्रिशूर पूरम उत्सव के बारे में
केरल में सबसे प्रसिद्ध मंदिर उत्सव त्रिशूर पूरम की शुरुआत हो चुकी है। यहां के 10 मंदिर मिलकर वडक्कुनाथन मंदिर में भगवान शिव की वंदना करते हैं।

केरल का सबसे बड़ा उत्सव त्रिशूर पूरम हर साल त्रिशूर के वडक्कुनाथन मंदिर में धूमधाम और पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस साल भी इसकी शुरुआत हो गई है। इसमें भव्य जुलूस निकाले जाते हैं और जुलूस में हाथियों, शानदार छतरियों और ताल संगीत का प्रदर्शन किया जाता है जो केरल की संस्कृति को दर्शाता है।
बता दें कि त्रिशूर पुरम हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। त्रिशूर पुरम, त्रिशूर नगर का वार्षिक उत्सव है। यह उत्सव थेक्किनाडु मैदान पर्वत पर स्थित वडक्कुन्नाथन मंदिर में, नगर के बीचों बीच आयोजित होता है। इसका इतिहास 200 साल पुराना है। इस उत्सव में त्रिशूर के 10 मंदिर शामिल होते हैं। यह एक ऐसा उत्सव होता है जिसमें सभी देवता साथ मिलकर नगर के बीचों-बीच वडक्कुनाथन मंदिर में भगवान शिव की वंदना करते हैं।
त्रिशूर पूरम का इतिहास
त्रिशूर पूरम, राम वर्मा कुन्हजिप्पिला थंपुरन, या राम वर्मा IX ने शुरू किया था। जो अपनी जनता के बीच महाराजा सकथान थंपुरन के नाम से प्रसिद्ध थे। वह कोचीन के 1790-1805 के बीच महाराजा थे। हुआ यूं कि केरल में त्रिशूर पूरम से पहले सबसे बड़ा मंदिर उत्सव आराट्टुपुझा में आयोजित होता था। वह एक दिवसीय उत्सव हुआ करता था, जिसे अराट्टुपुझा पूरम के नाम से जाना जाता था। उस दौरान त्रिशूर शहर और उसके आसपास के मंदिर नियमित प्रतिभागी हुआ करते थे।
साल 1798 में उस शहर में लगातार भारी बारिश हुई और इस कारण त्रिशूर के मंदिरों को अराट्टुपुझा पूरम जाने में देर हो गई थी। उत्सव में प्रवेश से वंचित किये जाने पर शर्मिंदगी और नाराजगी महसूस करते हुए मंदिर के अधिकारियों ने इस मुद्दे को महाराज सकथान थंपुरन के सामने उठाया।
तब महाराज सकथान थंपुरन ने अप्रैल-मई में उसी दिन, त्रिशूर पूरम अपना स्वयं का उत्सव शुरू करने का फैसला किया। यह उत्सव तब से केरल में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र बन गया। जो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों पर्यटकों को आकर्षित करता है। आज, यह दुनिया के सबसे प्रसिद्ध मंदिर उत्सवों में से एक है। यहां गौर करने वाली बात यह है कि वर्तमान समय में इसका आयोजन केरल के टूरिज्म डिपार्टमेंट और केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के समग्र प्रयासों से किया जाता है।
महाराजा थंपुरन ने 10 मंदिरों को दो समूहों में बांटा
जब इस उत्सव की शुरुआत हुई तब वडक्कुनाथन मंदिर (शिव मंदिर) के आसपास स्थित 10 मंदिरों को एकजुट करने का निर्णय लिया गया और त्रिशूर पूरम को एक सामूहिक उत्सव के रूप में मनाया गया। उन्होंने वडक्कुनाथन मंदिर के पीठासीन देवता भगवान वडक्कुनाथन (भगवान शिव) को श्रद्धा अर्पित करने के लिए त्रिशूर शहर में अपने देवताओं के साथ मंदिरों को आमंत्रित किया था। तब महाराज थंपुरन ने मंदिरों को दो समूहों में विभाजित किया, जिनके नाम हैं 'परमेक्कावु पक्ष (पूर्वी समूह)' और 'थिरुवंबाडी पक्ष (पश्चिमी समूह)'। जो उस उत्सव का नेतृत्व प्रमुख प्रतिभागियों के द्वारा करते हैं।
पूर्वी समूह के मंदिर
- परमेक्कावु भगवती मंदिर
- चेम्बुक्कावु भगवती मंदिर
- पनमुक्कुमपल्ली संस्था मंदिर
- चूड़ाकोट्टुकावु भगवती मंदिर
- पुक्कट्टिक्कारा - करमुक्कु भगवती मंदिर
- कनिमंगलम संस्था मंदिर
पश्चिमी समूह के मंदिर
- थिरुवंबादी श्री कृष्ण मंदिर
- लालूर भगवती मंदिर
- अय्यांथोल श्री कार्तियानी मंदिर
- नेथिलक्कवु भगवती मंदिर
इस उत्सव की कुछ खास बातें
- यह वार्षिक उत्सव यहां के हिन्दू समुदाय द्वारा प्रथम मलयालम महीना मेड़म में मनाया जाता है। पूरम का अर्थ होता है उत्सव।
- त्रिशूर पूरम की शुरुआत ध्वजारोहण समारोह (कोडियेट्टम) से होती है जो त्योहार से सात दिन पहले होता है।
- त्रिशूर पूरम में हाथी बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। उन्हें नेट्टीपट्टम (सजावटी सुनहरे आभूषण) से सजाया जाता है। जो सजावटी घंटियों और गहनों से तैयार किया जाता है।
- पूरम की आतिशबाजियां भी मुख्य फोकस में होती हैं। कुल 2 आतिशबाजियां होती हैं, जिनमें से एक ध्वजारोहण के 4 दिन बाद होती है और एक मुख्य पूजा के दिन।
- मुख्य त्योहार की यात्रा प्रातःकाल सबसे बड़े मंदिर से शुरू होती है, जिसका स्वागत अन्य 9 मंदिरों के सामने उपस्थित श्रद्धालुओं द्वारा किया जाता है।
- इस उत्सव में इस्तेमाल होने वाली हर चीज को हर साल नए तरीके से बनाया जाता है। चाहे वे छाता हो, तस्वीरें हो या कुछ भी।
- त्रिशूर पूरम में केरल का संगीत मुख्य आकर्षणों में से एक है। जिसमें मद्दलम, एडक्का, थिमिला, चेंडा और कोम्बू जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है।
- पूरम का अंतिम दिन, जो सातवां दिन होता है, जो 'पाकल पूरम' कहलाता है। इस दिन थिरुवंबाडी श्री कृष्ण मंदिर और परमेक्कावु भगवती मंदिर की मूर्तियों को मुख्य द्वार से उनके संबंधित मंदिरों में पूरम उत्सव के अंत में चिन्हित करने के लिए ले जाया जाता है।
कैसे मनाते हैं त्रिशूर पूरम को
दअसल त्रिशूर पूरम उत्सव में त्रिशूर के ही थिरुवंबादी श्री कृष्ण मंदिर और परमेक्कावु भगवती मंदिर इस विशेष उत्सव के आयोजन में बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं। वास्तव में त्रिशूर पुरम की रोचकता इन्हीं दो मंदिरों के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण बढ़ जाती है। विशेष पारंपरिक ढोल नगाड़े और कलाकारों सहित हाथी उत्सव के मुख्य आकर्षण होते हैं।
इस उत्सव के लिए 250 से अधिक कलाकार यहां आकर अपनी कला को लोगों के बीच दिखाते हैं। वहीं इस पर्व के दौरान ढोल बजाने वाले कलाकारों को लोग स्वयं भगवान का रूप भी मानते हैं, इसलिए इन्हें राज्य में विशेष सम्मान दिया जाता है।
त्रिशूर पूरम उत्सव के अंत में ये दोनों समूह वडक्कुनाथन मंदिर के पीठासीन देवता भगवान वडक्कुनाथन (भगवान शिव) के पश्चिमी द्वार से अंदर आते हैं और दक्षिणी द्वार से बाहर जाते हैं। यहां एक चीज गौर करने वाली यह होती है कि इस दक्षिण द्वार को हाथी द्वारा धक्का देकर खोला जाता है। जहां से त्रिशूर पूरम का आयोजन होता है, जिसके ऊपर 'नीथिलक्कविलम्मा' की मूर्ति होती है।
इसके बाद दोनों मंदिरों के समूहों के बीच की प्रतिस्पर्धा को देखा जाता है। यह प्रतिस्पर्धा न केवल हाथियों की साज-सज्जा, कलियारपट्टू नृत्य और कुडमट्टम प्रतियोगिता के रूप में दिखती है, बल्कि दोनों समूहों के बीच आतिशबाजियों की टक्कर के रूप में भी होती है।












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