Karnataka Elections: कर्नाटक ने दी कांग्रेस को ऊर्जा, पहले भी इंदिरा और सोनिया की बदली थी किस्मत
कर्नाटक चुनावों में जीत से संकटग्रस्त कांग्रेस को नयी ऊर्जा मिल गयी है। पहले भी जब कांग्रेस नेताओं के लिए सारे रास्ते बंद हो गए थे तो कर्नाटक उनका सहारा बना था।

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Karnataka Elections: कर्नाटक की राजनीति उत्तर भारत की राजनीति से अलग दिखती है। कांग्रेस का इस राज्य से बहुत ही पुराना नाता है। क्योंकि जब-जब कांग्रेस मुश्किल में आई है, तो इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक सबने कर्नाटक की ओर देखा है। आज हम आपको इतिहास में घटित कर्नाटक की राजनीति से जुड़े पांच ऐसे दिलचस्प किस्से बताएंगे, जो कांग्रेस, बीजेपी और कर्नाटक की कहानियां बयां करते हैं।
जब एक विधायक ने मुख्यमंत्री को दी चुनौती
यह कहानी साल 1962 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों की है। दो बार के विधायक रहे देवराज अर्स के खिलाफ चुनाव लड़ने वाला कोई नहीं था, इसके बावजूद कांग्रेस से टिकट नहीं मिल रही थी। तब उनके हुंसुर विधानसभा क्षेत्र के समर्थकों ने उन्हें दिल्ली जाने को कहा, लेकिन अर्स ने कहा कि मैं किसी के सामने भीख नहीं मागूंगा। फिर हुंसुर के ही एक नेता ने देवराज अर्स के लिए दिल्ली का टिकट बुक कर दिया। जहां कांग्रेस वर्किंग कमेटी में उनका सामना कर्नाटक के सीएम रहे निजलिंगप्पा से हो गया। निजलिंगप्पा नहीं चाहते थे कि देवराज अर्स को टिकट मिले। उन्होंने सबके सामने कहा कि वह जीत नहीं पाएंगे।
जबकि लाल बहादुर शास्त्री और पंडित नेहरू, देवराज के पक्ष में थे तो उन्हें टिकट मिल गई। गौरतलब है कि वह निर्विरोध चुने गये। तब कर्नाटक में इस तरह की यह पहली जीत थी। बता दें कि उस समय कर्नाटक का नाम मैसूर था। साल 1973 में इसका नाम स्टेट ऑफ मैसूर से बदल कर कर्नाटक रखा गया था।
जबकि निजलिंगप्पा, जो देवराज के चुनाव की भविष्यवाणी कर रहे थे वह खुद अपनी सीट हार गये। इसके बावजूद निजलिंगप्पा समर्थकों के दम पर मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। तब देवराज ने पार्टी के सामने आपत्ति जताई। उस दौर में निजलिंगप्पा बहुत बड़े नेता थे और किसी की हिम्मत नहीं थी कुछ बोलने की।
देवराज अर्स नहीं माने और उन्होंने खुद निजलिंगप्पा से मिलकर आपत्ति दर्ज कराई। कहा कि इस समय आपको मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहिए, यह नैतिक रूप से सही नहीं है। जिस पर आप भरोसा करते हैं, उनका नाम सीएम के लिए दीजिए और आप दोबारा चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन जाइये। निजलिंगप्पा मान गए और अपने खास को मुख्यमंत्री बना दिया। तीन महीनों बाद वे उपचुनाव जीतकर आए और मुख्यमंत्री बन गये। इस पूरे प्रकरण ने देवराज को सबकी नजरों में ला दिया। इसके बाद निजलिंगप्पा कैबिनेट में देवराज को ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर बनाया गया।
बांग्लादेश से आया 'फरमान', देवराज को सीएम बनाओ
साल 1972 में इंदिरा गांधी, बांग्लादेश के गठन के बाद पहली बार कर्नाटक के दौरे पर थी और उस समय विधानसभा चुनावों की सरगर्मी थी। तब इंदिरा गांधी ने टिकट बंटवारे की जिम्मेदारी देवराज अर्स को दी थी क्योंकि देवराज कांग्रेस में सिंडीकेट वाले दोफाड़ में इंदिरा के साथ थे। इस टिकट बंटवारे ने कर्नाटक का समीकरण बदल दिया था। क्योंकि इससे पहले कर्नाटक में 223 में से लिंगायत समुदाय को सबसे ज्यादा 150 सीटें दी जाती थी, जिसकी वजह से पार्टी को उन्हीं का नेता चुनना पड़ता था। इस बार देवराज ने 133 उम्मीदवार पिछड़े, दलित और मुस्लिम समुदाय से उतारे। जबकि 90 सीट पर लिंगायत, वोक्कालिगा और ब्राह्मण उम्मीदवारों को दिया। पार्टी के अंदर विद्रोह भी हुआ पर देवराज और इंदिरा अपनी जिद पर अड़े रहे।
चुनाव में कांग्रेस को 163 सीटों पर जीत मिली। इनमें 92 विधायक दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों के थे। लेकिन, मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए? इस पर विधायक दल के नेताओं के बीच एक राय नहीं बन रही थी। फिर तय हुआ कि इंदिरा गांधी फैसला करेंगी लेकिन उस समय वो बांग्लादेश दौरे पर थी। पार्टी ने किसी तरह उनसे संपर्क साधा और उधर से जवाब आया कि देवराज अर्स अगले मुख्यमंत्री बनेंगे। ऐसा कर्नाटक (मैसूर) में पहली बार हुआ कि लिंगायत और वोक्कालिग्गा समुदाय से अलग कोई पिछड़े वर्ग का नेता मुख्यमंत्री चुना गया।
'एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर-चिकमंगलूर'
चुनावों में 'नारों' की भूमिका कभी इतिहास बन जाती है। ऐसा ही एक नारा कभी साल 1978 के उपचुनावों में सुनने को मिला था। 'एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर-चिकमंगलूर'। यह नारा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए था। दरअसल इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस और इंदिरा गांधी को चारों तरफ से हार का सामना करना पड़ा था। इसलिए उन्हें लोकसभा में पहुंचाने के लिए एक सुरक्षित सीट खोजी गयी जो थी चिकमंगलूर। इस सीट पर पहले से ही कांग्रेस का कब्जा था और चंद्र गौड़ा यहां के सांसद थे। उन्होंने इंदिरा गांधी के लिए सीट छोड़ दी। उपचुनाव हुए और तब इंदिरा गांधी के खिलाफ कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल ने उम्मीदवारी भर दी।
यह चुनाव काफी कठिन होने वाला था क्योंकि पूरे देश में इंदिरा के खिलाफ लहर थी। फिर भी इंदिरा गांधी ने पूरी ताकत लगा दी क्योंकि हर हाल में वो चुनाव जीतना चाहती थीं। तब पार्टी ने इस नारे को गढ़ा, जो उनके व्यक्तित्व को दर्शाता था। 'एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर-चिकमंगलूर'। अंतत: इंदिरा गांधी उपचुनाव 77 हजार से ज्यादा वोटों से जीत गईं।
18 साल बाद ढहा कांग्रेस का किला?
इमरजेंसी के बाद जिस चिकमंगलूर ने 1978 में इंदिरा गांधी को लोकसभा में भेजा था। इसके बाद वहीं से कांग्रेस के टिकट पर कई लोगों ने वहां से चुनाव लड़ा और आसानी से जीतते गये और चिकमंगलूर कांग्रेस का अभेद्य किला बन गया। लेकिन, 18 सालों बाद साल 1996 में यह किला जनता दल सेक्युलर के उम्मीदवार बीएल शंकर ने ढहा दिया।
दरअसल साल 1992 में बाबरी विध्वंस की घटना के बाद चिकमंगलूर में बाबा बुडन गिरी आंदोलन शुरू हो गया था और हिंदुत्व और संघ परिवार के घटक दल इलाके में हावी होने लगे थे। तब एचडी देवगौड़ा की अपनी छवि भी कांग्रेस पर भारी पड़ रही थी। इन्हीं कारणों की वजह से जेडीएस ने बीएल शंकर पर दांव खेला और सही साबित हुए।
बड़ी बात यह है कि दो साल बाद ही 1998 में बीएल शंकर ने जेडीएस को छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया था। इसके बाद 1998, 1999, 2004 में यह सीट भाजपा के खाते में गई। उसके बाद इस सीट को मर्ज करके उडुप्पी चिकमगलूर सीट नाम दिया गया। वहां से भी 2009, 2014 और 2019 के चुनावों में भाजपा उम्मीदवार को जीत मिली। वहीं 2012 के उपचुनाव में यह सीट कांग्रेस जीत गई।
जब सुषमा स्वराज बोलने लगीं 'धाराप्रवाह कन्नड़'
21 मई 1991 को कांग्रेस नेता राजीव गांधी की हत्या के बाद पार्टी के लोग सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना चाहते थे लेकिन सोनिया गांधी ने साफ इंकार कर दिया। लेकिन, विरासत में मिली सत्ता से वह ज्यादा समय दूर नहीं रह सकीं। साल 1999 में सोनिया गांधी ने उत्तर प्रदेश की अमेठी और कर्नाटक की बेल्लारी यानी दो लोकसभा सीटों से चुनावी पर्चा भरा था। उनके पीछे-पीछे बीजेपी नेता सुषमा स्वराज भी बेल्लारी पहुंच गईं और कांग्रेस के गढ़ में माने जाने वाले बेल्लारी में सोनिया को चुनौती दे दी।
दरअसल कर्नाटक की बेल्लारी सीट से कांग्रेस 1952 से अब तक हारी नहीं थी और मुकाबला काफी दिलचस्प होने वाला था। नामांकन भरने के बाद सुषमा स्वराज ने अपने प्रस्तावक डॉक्टर बीके श्रीनिवास मूर्ति के घर पर ही डेरा जमा लिया। यहीं से वह चुनाव प्रचार में जुट गईं थी। यह वो दौर था जब सोनिया गांधी टूटी-फूटी हिंदी बोला करती थीं। सुषमा स्वराज ने बेल्लारी का चुनाव के लिए पूरा जोर लगा दिया था। यही नहीं, उन्होंने कुछ ही दिनों में कन्नड़ बोलना सीख लिया था। इसके बाद सुषमा स्वराज चुनावी रैलियों में धाराप्रवाह कन्नड़ में भाषण देती थी। उन्हें कोई ट्रांसलेटर की जरूरत नहीं पड़ती थी।
हालांकि, चुनाव के नतीजे जब आए तो सुषमा 56 हजार मतों से सोनिया से चुनाव हार गईं थीं। चुनाव हारने के बाद सुषमा ने कहा था कि मैं भले ही युद्ध हार गई, लेकिन यह लड़ाई मेरे नाम रही। क्योंकि इससे पहले यहां लाखों वोटो के अंतर से कांग्रेस नेता जीता करते थे।












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