Lingayats: जानिए लिंगायत समुदाय के बारे में, जिसके पास है कर्नाटक की सत्ता की चाबी
साल 1956 से लेकर अब तक कर्नाटक में 23 मुख्यमंत्री बने हैं, जिनमें से 10 मुख्यमंत्री लिंगायत समुदाय से रहे। वर्तमान मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत समुदाय से ही आते हैं।

Lingayats: हाल ही में कर्नाटक की भाजपा सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए मुसलमानों के लिए निर्धारित चार प्रतिशत के आरक्षण को समाप्त कर दिया। अब उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्ल्यूएस) कोटे के तहत आरक्षण दिया जायेगा। मुसलमानों को जो चार प्रतिशत आरक्षण अलग से मिल रहा था, उसे अब दो-दो प्रतिशत लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय में बांटा जायेगा। इस तरह लिंगायत समुदाय के लिए निर्धारित आरक्षण पांच प्रतिशत से बढ़कर सात प्रतिशत हो गया है। इसके अतिरिक्त, वोक्कालिगा समुदाय के लिए निर्धारित चार प्रतिशत आरक्षण बढ़कर अब छह प्रतिशत हो गया है।
विधानसभा चुनाव से पूर्व किए गए इस फैसले को बोम्मई सरकार का चुनावी मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा है। जानकारों का मानना है कि इससे कर्नाटक की भाजपा सरकार आगामी विधानसभा चुनाव में लिंगायत के साथ-साथ वोक्कालिगा समुदाय को भी साधने में सफल हो सकती है। वहीं, कांग्रेस का कहना है अगर वह सत्ता में आएगी, तो मुसलमानों के लिए चार प्रतिशत के आरक्षण को बहाल करेगी।
कौन हैं लिंगायत?
लिंगायत समुदाय सनातन धर्म का अभिन्न हिस्सा है। 12वीं सदी में भक्ति आंदोलन से प्रेरित समाज सुधारक महात्मा बसवन्ना (जिन्हें भगवान बसवेश्वर या बसव भी कहा जाता है) ने ब्राह्मणों की वर्चस्ववादी व्यवस्था का विरोध किया था। जबकि महात्मा बसवन्ना का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में ही हुआ था। उन्होंने जन्म आधारित व्यवस्था के स्थान पर कर्म आधारित व्यवस्था को प्रमुखता दी। उन्होंने हिंदू धर्म की कुरीतियों पर भी कुठाराघात किया।
महात्मा बसवन्ना ने एक जातिविहीन समाज की परिकल्पना की और लिंगायत समुदाय की स्थापना की। हालांकि, कुछ विद्वानों का मानना है कि महात्मा बसवन्ना धर्म सुधारक थे, पंथ संस्थापक नहीं। लिंगायत समाज महात्मा बसवन्ना के पहले से ही अस्तित्व में था। वर्तमान में लिंगायत समुदाय की लगभग सौ उप-जातियां भी मौजूद हैं।
लिंगायत समुदाय का राजनीति में दबदबा
साल 1931 के बाद से देश में कोई जातीय जनगणना नहीं हुई है। फिर भी एक अनुमान के मुताबिक कर्नाटक की कुल जनसंख्या में लिंगायत समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 18 प्रतिशत है। जबकि इस समुदाय का असर कर्नाटक की 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर है। कर्नाटक के अतिरिक्त महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में भी लिंगायतों की अच्छी खासी आबादी है।
लिंगायत समुदाय की सत्ता पर पकड़ को इस बात से समझा जा सकता है कि साल 1956 से लेकर अब तक कर्नाटक में 23 मुख्यमंत्री बने हैं, जिनमें से 10 मुख्यमंत्री लिंगायत समुदाय से ही रहे हैं। वर्तमान मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत समुदाय से ही आते है।
लिंगायतों के नेता सभी राजनैतिक दलों में मौजूद हैं। मगर जब भी यह समुदाय एकसाथ लामबंद हुआ तब लिंगायतों के समर्थन से कर्नाटक में मुख्यमंत्री बने हैं। जैसे लिंगायत समुदाय के लोग 1980 के दशक में जनता दल के ब्राह्मण नेता रामकृष्ण हेगड़े के साथ लामबंद हुए थे और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। फिर लिंगायतों का हेगड़े से मोहभंग हो गया और कांग्रेस के लिंगायत नेता वीरेंद्र पाटिल के साथ आ गए और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया।
जब वीरेंद्र पाटिल को कांग्रेस नेतृत्व ने मुख्यमंत्री पद से हटा दिया, तो लिंगायत फिर से रामकृष्ण हेगड़े के साथ आ गए। जब हेगड़े की मृत्यु हो गई, तो लिंगायतों ने भाजपा के नेता बी.एस. येदियुरप्पा को अपना नेता मान लिया और 2008 में वे भी लिंगायतों के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए। येदियुरप्पा को भी लिंगायतों का बड़ा नेता माना जाता है। इसलिए फिलहाल लिंगायत समुदाय के अधिकांश लोगों का झुकाव भाजपा की ओर ज्यादा रहता है।
साल 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में 58 लिंगायत विधायक चुनाव जीते थे। इनमें से 38 लिंगायत विधायक भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते। 16 लिंगायत विधायक कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते। जबकि 4 लिंगायत विधायक जेडीएस के टिकट पर चुनाव जीते। वर्तमान बसवराज बोम्मई सरकार के आठ मंत्री लिंगायत समुदाय से ही आते हैं।
लिंगायत समुदाय पर सांप्रदायिक राजनीति
लिंगायतों को अपनी पार्टी की ओर आकर्षित करने के लिए कांग्रेस की तत्कालीन सिद्धारमैया सरकार ने साल 2018 के विधानसभा चुनाव से कुछ दिनों पहले एक बड़ा राजनीतिक दांव खेला। लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने के लिए गठित जस्टिस नागमोहन दास कमेटी की सिफारिशों को सिद्धारमैया सरकार ने स्वीकार कर लिया और इसे अपने मंत्रिमंडल से पारित भी करवा लिया।
इसके बाद, इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पास भेज दिया गया। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। सिद्धारमैया के इस कदम को लिंगायत समुदाय को बांटने की राजनीति के तहत देखा गया। 2018 के विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा काफी गरम रहा और कांग्रेस की हार के बाद ही यह शांत हुआ।
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