Protests in Iran: कौन हैं आयतुल्लाह अली खामेनेई, जिनकी भांजी ने दुनिया से ईरान से संबंध तोड़ने की अपील की है?

ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शन को कुचलने के लिए सेना के हिंसात्मक उपायों की अयातुल्लाह अली खामेनेई ने तारीफ की है। इससे नाराज फरीदेह मोरादखानी ने विश्व के सभी देशों से ईरान के साथ अपने संबंधों को तोड़ने की अपील की है।

Protests in Iran: ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई (Ayatollah Ali Khamenei) की भांजी और मानवाधिकार कार्यकर्ता फरीदेह मोरादखानी (Farideh Moradkhani) ने विश्व के सभी देशों से ईरान के साथ अपने संबंधों को तोड़ने की अपील की है। उन्होंने यह अपील ईरान सरकार के हिंसक और बर्बर रवैये के खिलाफ की है, जिसने एक ईरानी युवती महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में मौत के बाद उपजे जनाक्रोश को दबाने के लिए बर्बरतापूर्वक कदम उठाये हैं।

Iran’s Supreme Leader Ayatollah Ali Khamenei niece appealed to the world to break ties with Iran?

फरीदेह मोरादखानी को 23 नवंबर को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके दो दिन बाद उनका पहले से रिकॉर्ड किया गया एक वीडियो फरीदेह के भाई ने यूट्यूब पर प्रसारित किया, जिसमें फरीदेह ने स्वतंत्र और लोकतांत्रिक लोगों से कहा था कि अपनी सरकारों से कहो कि वे बच्चों की हत्या करने वाली इस हत्यारी सरकार का समर्थन करना बंद करें। यह शासन अपने किसी भी धार्मिक सिद्धांत के प्रति वफादार नहीं है और बल प्रयोग और सत्ता बनाए रखने के अलावा उसे कुछ नहीं आता।

उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि सभी स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश ईरान से अपने प्रतिनिधियों को वापस बुलाएं और इस क्रूर शासन के प्रतिनिधियों को अपने देश से निष्कासित करें। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता की भी आलोचना की।
पेशे से इंजीनियर फरीदेह के पिता अली मोरादखानी जाने-माने ईरानी नेता थे। उनकी शादी अली खामेनेई की बहन से हुई थी। फरीदेह मृत्युदंड के विरोध में अभियान चला चुकी हैं और उन्हें इसके पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका है।

फरीदेह ने यह वीडियो संदेश ऐसे समय में जारी किया है, जब ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शनों में 450 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 18 हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है। ये विरोध प्रदर्शन 22 वर्षीय कुर्द ईरानी महिला महसा अमीनी की मौत के बाद शुरू हुए थे।

कौन हैं अयातुल्लाह अली खामेनेई?

83 वर्षीय ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अली खामेनेई का जन्म 1939 में ईरान के नगर मशहद के एक शिया धार्मिक परिवार में हुआ था। इनके पिता सैयद जवाद खामेनेई मशहद के वरिष्ठ धर्मगुरुओं में से एक थे। खामेनेई 1981-1989 तक ईरान के राष्ट्रपति भी रहे। 1989 में तत्कालीन धार्मिक प्रमुख रुहोल्लाह खोमैनी (Ruhollah Khomeini) की मृत्यु के बाद अली खामेनेई को ईरान का दूसरा धार्मिक प्रमुख चुना गया।

ईरान में चल रहे हिजाब विरोधी प्रदर्शन को कुचलने के लिए सेना के हिंसात्मक रवैये की अयातुल्लाह अली खामेनेई ने तारीफ की है। उन्होंने कहा कि सेना ने दंगाईयों से लोगों की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया है। खामेनेई ने ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शनों के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार ठहराया है।

इससे पहले, ईरान के हिजाब विरोधी प्रदर्शनकारियों ने अली खामेनेई को अपना निशाना बनाया। प्रदर्शनकारियों ने खामेनेई की तस्वीर को आग के हवाले कर दिया। कुछ लोग ईरानी शासन पर इस्लामिक धर्मगुरुओं का प्रभाव खत्म किए जाने का आह्वान भी कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी 'तानाशाहों की मौत हो और मुल्लाओं को जाना होगा' जैसे नारे लगा रहे हैं।

फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए दंगों पर भी आयतुल्लाह अली खामेनेई ने बयान दिया था। उन्होंने अपने एक ट्वीट में कहा था कि भारत में मुसलमानों के नरसंहार पर दुनिया भर के मुसलमानों का दिल दुखी है। इस्लामिक जगत की ओर से भारत को अलग-थलग किए जाने से बचने के लिए भारत सरकार को कट्टर हिंदुओं और उनकी पार्टियों पर रोक लगानी चाहिए। खामेनेई जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले की भी निंदा कर चुके हैं।

2019 में खामेनेई को उनके पद से हटाने की भी मांग की गई। अरब देशों की 14 प्रमुख हस्तियों ने एक संयुक्त वक्तव्य में कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता को उनके पद से हटाया जाए और देश में लोकतांत्रिक, संघीय शासन तंत्र स्थापित किया जाए।

कितने ताकतवर हैं ईरान के सर्वोच्च नेता?

ईरानी राज व्यवस्था में सर्वोच्च नेता का पद सबसे ताकतवर माना जाता है। 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से अब तक सिर्फ दो लोग सर्वोच्च नेता के पद तक पहुंचे हैं। इनमें से पहले सर्वोच्च नेता, ईरानी इस्लामिक गणराज्य के संस्थापक अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमैनी थे और दूसरे उनके उत्तराधिकारी वर्तमान अयातुल्लाह अली खामेनेई हैं। ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासन के खात्मे के बाद इस पद को ईरान के राजनीतिक ढांचे में सबसे ऊंचे स्थान पर जगह दी गई।

सर्वोच्च नेता ईरान की सशस्त्र सेनाओं का प्रधान सेनापति होता है। उसके पास सुरक्षाबलों का नियंत्रण होता है। वे न्यायपालिका के प्रमुखों, प्रभावशाली 'गार्डियन काउंसिल' के आधे सदस्यों, शुक्रवार की नमाज के नेताओं, सरकारी टेलीविजन और रेडियो नेटवर्क के प्रमुखों की नियुक्ति करते हैं। सर्वोच्च नेता की अरबों डॉलर वाली धर्मार्थ संस्थाएं ईरानी अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को नियंत्रित करती हैं।

ईरान के प्रथम धार्मिक प्रमुख

1963 में ईरान में जब श्वेत क्रांति की घोषणा हुई तो इसका बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया। इस विरोध का नेतृत्व रुहोल्लाह खोमैनी कर रहे थे, जिससे वहां के शाह मोहम्मद रजा पहलवी नाराज हो गए और खोमैनी को 1964 में गिरफ्तार कर लिया गया। उसके बाद उन्हें 1965 में देश से बाहर निकाल दिया गया। इसके बाद वे पहले तुर्की में रहे। फिर इराक चले गए।

1973 में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के चलते शाह की श्वेत क्रांति की मंशा पूरी नहीं हो सकी। सितंबर 1978 में ईरान के शाह के खिलाफ तेहरान में हजारों की संख्या में लोगों ने एकत्रित होकर प्रदर्शन किया। इससे घबराकर शाह ने ईरान में मार्शल लॉ लगा दिया।

शाह के इस तानाशाही रवैये के बाद लगातार हालात उनकी पकड़ से बाहर होते गए। जनता सड़कों पर उतरकर खोमैनी को वापस बुलाने की मांग करने लगी। ये प्रदर्शन इस हद तक बढ़ गए थे कि इसके सामने मार्शल लॉ अप्रभावी होने लगा। ईरानी जनता वहां के शासक ही नहीं, प्रशासन और सेना पर भी भारी पड़ रही थी। शाह को अपनी जान का खतरा नजर आने लगा। इसी डर के कारण वे ईरान की सत्ता शापौर बख्तियार (Shapour Bakhtiar) को सौंपकर जनवरी 1979 में अमेरिका भाग गए।

प्रधानमंत्री बनने के बाद शापौर ने जनता के दबाव में खोमैनी को ईरान आने की अनुमति दे दी। फरवरी 1979 में खोमैनी वापस स्वदेश लौट आए। उनकी वापसी का देश की जनता ने जबरदस्त स्वागत किया। जनता को खोमैनी से बड़ी उम्मीद थी। खोमैनी ने देश में बख्तियार के अलावा मेहदी बाजारगन (Mehdi Bazargan) को नया प्रधानमंत्री बना दिया। इस फैसले के बाद देश एक अजीबो-गरीब स्थिति में पहुंच गया। वहां पर दो प्रधानमंत्री थे। सेना भी बंट चुकी थी। शाह की समर्थन वाली इंपीरियल गार्ड्स और खोमैनी के समर्थन वाली वायुसेना के बीच सत्ता को लेकर युद्ध छिड़ गया, जिसमें शाह समर्थक सेना की हार हुई।

1979 में एक जनमत संग्रह के बाद ईरान को इस्लामिक गणराज्य घोषित किया गया। इसके साथ ही खोमैनी को देश का सर्वोच्च नेता चुना गया। उन्होंने प्रधानमंत्री का पद समाप्त करके इसके स्थान पर राष्ट्रपति का पद स्थापित किया। खोमैनी की ताजपोशी के साथ ही ईरान से अमेरिकी समर्थकों का भी खात्मा हो गया। इसके बाद अमेरिका ने ईरान से सारे संबंध तोड़ लिए। इसकी जवाबी कार्रवाई में ईरान ने अमेरिकी दूतावास के 52 अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया, जिन्हें 444 दिनों बाद 1981 में रोनाल्ड रीगन के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद छोड़ा गया।

1980 में इराक ने ईरान पर हमला किया तो उसका साथ रूस, अमेरिका और ब्रिटेन ने दिया। लेकिन आठ साल तक चले इस युद्ध में अमेरिका को कुछ हासिल नहीं हुआ। आखिरकार अमेरिका को मजबूरन समझौता करना पड़ा। इसके बाद यह दुश्मनी तब और बढ़ गई जब 1988 में ईरान के एक यात्री विमान को अमेरिका ने मार गिराया। इसमें दस भारतीय समेत कुल 290 यात्री सवार थे। इस हत्या के खिलाफ ईरान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय तक गया। खोमैनी ने इसके बाद देश को नई ताकत देने के लिए परमाणु कार्यक्रम शुरू किया।

1988 में ही रुहोल्लाह खोमैनी ने भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी की हत्या का आह्वान करते हुए एक फतवा जारी किया। इस फतवे में कहा गया कि सलमान रुश्दी ने जो उपन्यास 'द 'सेटेनिक वर्सेज' लिखी है, उसमें उन्होंने रसूल की तौहीन की है। 1989 में खोमैनी के निधन के बाद सैयद अली खामेनेई को देश का सर्वोच्च नेता बनाया गया।

कैसे चुना जाता है ईरान का सर्वोच्च नेता?

ईरान में सर्वोच्च नेता का चुनाव 88 इस्लामिक जानकारों का एक समूह करता है। इस समूह को 'असेंबली ऑफ एक्स्पर्ट्स' कहा जाता है। इस असेंबली के सदस्यों को प्रत्येक आठ साल में ईरानी जनता चुनती है, लेकिन उम्मीदवारों के नाम पर 'गार्डियन काउंसिल' सहमति देती है।

गार्डियन काउंसिल के सदस्यों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च नेता ही चुनता है। इसका मतलब सर्वोच्च नेता का असेंबली और गार्डियन काउंसिल दोनों पर प्रभाव होता है। पिछले तीन दशकों में अली खामेनेई ने असेंबली के लिए रूढ़िवादियों को चुना है, ताकि वे उनके मुताबिक उत्तराधिकारी चुन सकें। एक बार चुन लिए जाने के बाद सर्वोच्च नेता आजीवन इस पद पर रह सकता है।

ईरान के संविधान के मुताबिक, सर्वोच्च नेता को अयातुल्लाह होना जरूरी है यानी एक वरिष्ठ शिया धार्मिक नेता। लेकिन जब खामेनेई को चुना गया था, तब वे अयातुल्लाह नहीं थे। इसलिए उन्हें सर्वोच्च नेता बनाने के लिए कानूनों में बदलाव किया गया था।

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