वीरता और प्रेम की जीती-जागती तस्वीर थीं 'रानी दुर्गावती'

कक्षा आठ में भारत की वीर गाथाएं नाम की एक किताब पढ़ी थी। इसमें देश के कई योद्धाओं के विषय में बताया गया था। इसमें एक कहानी थी रानी दुर्गावती की जो कि काफी वीर थीं। रानी दुर्गावती गोंडवाना राज्य की रानी थीं जो भारत की कई सबसे अधिक प्रसिद्ध रानियों में से एक थीं।

कौन थी रानी दुर्गावती?

वीरांगना महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। महोबा के राठ गांव में 1524 ई. की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।

मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी

दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी लेकिन फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर राजा संग्राम शाह ने अपने पुत्र दलपतशाह से विवाह करके, उसे अपनी पुत्रवधू बनाया था। विवाह के चार वर्ष बाद ही पति की मृत्यु के कारण उन्होंने पूरे राज्य का कार्यभार स्वयम ही सम्भाला।

दुर्गावती पराक्रम व वीरता की मिसाल थी

दुर्गावती ने 16 वर्ष तक जिस कुशलता से राज संभाला, उसकी प्रशस्ति इतिहासकारों ने की। आइना-ए-अकबरी में अबुल फ़ज़ल ने लिखा है, दुर्गावती के शासनकाल में गोंडवाना इतना सुव्यवस्थित और समृद्ध था कि प्रजा लगान की अदायगी स्वर्णमुद्राओं और हाथियों से करती थीं। मंडला में दुर्गावती के हाथीखाने में उन दिनों 1400 हाथी थे।

स्त्रीत्व के लिए आदर्श

मालवांचल का सूबेदार बड़ा निकम्मा आदमी था जो रानी की सम्पत्ति पर नजरें गड़ाए बैठा था। पहले ही युद्ध में दुर्गावती ने उसके छक्के छुड़ा दिए और उसका चाचा फतेहा खां युद्ध में मारा गया, पर वह माना नहीं; दुबारा उसने रानी दुर्गावती पर आक्रमण किया, तो रानी ने कटंगी-घाटी के युद्ध में उसकी सेना को ऐसा रौंदा कि बाजबहादुरउसकी की पूरी सेना का सफाया हो गया और दुर्गावती सम्राज्ञी के रूप में स्थापित हुईं।

अकबर के कारण दिया अपना बलिदान

अकबर के कडा मानिकपुर का सूबेदार ख्वाजा अब्दुल मजीद खां जो आसफ़ खां के नाम से जाना जाता था, ने रानी दुर्गावती के विरुद्ध अकबर को उकसाया, अकबर दुसरे राजपूत घरानों की तरह दुर्गावती को भी रनवासे की शोभा बनाना चाहता था। रानी दुर्गावती ने अपने धर्म और देश की दृढ़ता पूर्वक रक्षा की ओर रणक्षेत्र में अपना बलिदान 1564 में कर दिया, उनकी मृत्यु के पश्चात उनका देवर चन्द्रशाह शासक बना व उसने मुग़लों की आधीनता स्वीकार कर ली, जिसकी हत्या उन्हीं के पुत्र मधुकरशाह ने कर दी।

सुभद्रा कुमारी चौहान ने भी की है प्रशंसा

वीर रस की महान कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने भी अपनी कविताओं में रानी दुर्गावती की वीर गाथाओं का वर्णन किया है।

चन्देलों की बेटी थी,
गौंडवाने की रानी थी,
चण्डी थी रणचण्डी थी,
वह दुर्गावती भवानी थी।

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