Indian Constitution: भारतीय संविधान के साथ की गई सबसे चर्चित ‘छेड़छाड़'
Indian Constitution: भारतीय संविधान के साथ की गई सबसे चर्चित ‘छेड़छाड़'
26 नवंबर 1949 को भारत ने संविधान ग्रहण किया था, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था। संविधान में सरकार के संसदीय स्वरूप की व्यवस्था की गई है। इस दिन भारत द्वारा संविधान ग्रहण करने की वजह से संविधान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। जैसा कि हम जानते हैं भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसमें केन्द्रीय कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के कर्तव्यों और उनके संचारण करने की व्यवस्था के बारे में बताया गया है। हालांकि, भारतीय संविधान के साथ बीते 72 सालों में कई बार छेड़छाड़ की गई है। आज हम आपको भारतीय संविधान के साथ हुई छेड़छाड़ के बारे में बताने जा रहे है।

अनुच्छेद 370
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 (आर्टिकल 370) को संविधान में सबसे बड़ी छेड़छाड़ के रूप में जाना जाता है। जम्मू और कश्मीर के सन्दर्भ में यह अनुच्छेद 17 अक्टूबर 1949 को लाया गया था। गौरतलब है कि सरदार वल्लभभाई पटेल कभी भी इसके पक्ष में नहीं थे, इसलिए उन्होंने इसे निष्प्रभावी बनाने का बहुत प्रयास किया लेकिन जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला की वजह से वे ऐसा नहीं कर सके।
इस अनुच्छेद का साधारण शब्दों में अर्थ था कि देश की संसद द्वारा पारित कोई भी विधेयक को जम्मू और कश्मीर राज्य में पारित होने से पहले वहां की विधानसभा से अनुमति लेनी होगी। इस अनुच्छेद ने भारतीय संसद को अधिमिलन पत्र (Instrument of Accession) में उल्लिखित तीन विषयों - सुरक्षा, विदेश मामले और संचार तक सीमित कर दिया था।
दरअसल, अनुच्छेद 370 को किसी संवैधानिक वजह से नहीं बल्कि इसके पीछे शेख अब्दुल्ला की मंशा कुछ और थी। वे इसकी आड़ में जम्मू और कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ा देना चाहते थे जोकि बाद के सालों में देखने को भी मिला।
इस अनुच्छेद के साथ-साथ 14 मई 1954 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्देश पर भारत के राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा अनुच्छेद 35A भी शामिल किया गया था। गौरतलब है कि 35A भारतीय संविधान का हिस्सा होते हुए भी इसी संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19, 21 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करता था। इसलिए इसे एक विवादित और भेदभाव पैदा करने वाले अनुच्छेद के रूप में देखा गया।
हालांकि, साल 1964 में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के लिए कई प्रस्ताव आए, लेकिन तब इसे समाप्त नहीं किया जा सका। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री भी इसे समाप्त करने को तैयार भी थे, लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य के पिछड़ेपन का हवाला देते हुए अनुच्छेद 370 को हटाने के प्रस्ताव को सदन में वोटिंग के जरिए स्थगित कर दिया गया।
आखिरकार, इस अनुच्छेद को केन्द्र की मोदी सरकार ने वर्ष 2019 में खत्म करके जम्मू और कश्मीर को एक केन्द्र शासित प्रदेश बना दिया। इसके अलावा लद्दाख को जम्मू और कश्मीर से अलग कर एक नया केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया।
आपातकाल - 38वां, 39वां और 42वां संशोधन
आर्टिकल 370 के बाद भारतीय संविधान के साथ आपातकाल के दौरान कई छेड़छाड़ की गई। 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की थी, जिसे आज भी भारतीय संविधान
के काले अध्याय के तौर पर जाना जाता है।
इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने के साथ-साथ संविधान में 38वां, 39वां और 42वां संशोधन करके संविधान के मूल्यों का हनन किया था। इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान साल 1975 में 38वां संशोधन करके न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा का अधिकार छीन लिया था। वहीं, 39वें संशोधन में कोर्ट से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का ही अधिकार छीन लिया गया।
इसके अलावा इंदिरा गांधी द्वारा किए गए 42वें संशोधन में संविधान की प्रस्तावना में तीन नए शब्द समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता को जोड़ा गया। इस संशोधन में मौलिक अधिकारों पर निर्देशक सिद्धांतों की प्रधानता, लोकसभा के कार्यकाल की अवधि को 5 से 6 साल तक बढ़ाना, सभी संवैधानिक संशोधनों को न्यायिक जांच से परे रखना और राष्ट्रपति के लिए मंत्रीपरिषद की सलाह को मानना अनिवार्य किया गया। आपातकाल के दौरान संविधान में किया गया यह व्यापक संशोधन दर्शाता है कि यह केवल राजनैतिक लाभ के लिए किया गया था।
शाह बानो केस
1970 के दशक में इंदौर के एक बड़े वकील मोहम्मद अहमद खान ने अपनी पत्नी शाह बानो को 5 बच्चों के साथ घर से बाहर निकाल दिया और एक कम उम्र की लड़की से शादी कर ली। अहमद खान ने 43 वर्ष तक उनके साथ रही पत्नी और 59 वर्ष की महिला शाह बानो को 1978 में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) देते हुए बेघर कर दिया। अहमद खान बच्चों के परवरिश के लिए शाह बानो को कुछ पैसे कभी-कभी दे दिया कते थे।
अहमद खान ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक, शाह बानो को तलाक-ए-बिद्दत दी थी, जिसमें यह प्रावधान है कि तलाक के तीन महीने तक इद्दत की मुद्दत की अवधि होती है, जिसमें महिला की देखरेख की जिम्मेदारी तलाक देने वाले पति की होती है। अगर, इस दौरान महिला गर्भवती होती है, तो इद्दत की मुद्दत की अवधि बच्चे के जन्म तक की रहती है। दरअसल, यह एक वेटिंग पीरियड होता है, जिसमें महिला चाहे तो दूसरी शादी कर सकती है।
शाह बानो ने पति द्वारा बेघर किए जाने के बाद कोर्ट का रूख किया, जिसमें उसके पक्ष में फैसला आया और अहमद खान को शाह बानो को गुजारा-भत्ता देने के लिए कहा गया। अहमद खान ने हाईकोर्ट में फैसला आने के बाद इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 23 अप्रैल 1985 को सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में यह फैसला दिया कि मोहम्मद अहमद खान तलाक देने के एवज में शाह बानो को हर महीने भरण-पोषण करने के लिए 179.20 रुपये गुजारा भत्ता देंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सरकार को समान नागरिक संहिता लागू करने के बारे में सलाह भी दी। संविधान के अनुच्छेद 44 में भी यह कहा गया है कि राज्य भविष्य में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा। शाह बानो मामले में फैसला आने के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तिलमिला गया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कट्टरपंथियों ने जोरदार विरोध किया।
मुस्लिम लीग के जनरल सेक्रेटरी जीएम बनातवाला शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए जजमेंट के खिलाफ 15 मार्च 1985 में प्राइवेट बिल लेकर आए, ताकि संसद में इस पर चर्चा की जा सके। अगस्त 1985 में तत्कालीन गृह मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलकर बनतवाला के प्राइवेट बिल पर बोलने का आग्रह किया। आरिफ मोहम्मद खान के भाषण के बाद राजीव गांधी सरकार ने सेक्शन 125 में बदलाव करते हुए मुसलमानों को उससे बाहर रखने का फैसला किया। इसके बाद मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून 1986 पारित किया। इसके बाद आरिफ मोहम्मद खान ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
इस बिल का विरोध करते हुए सीपीआई के सांसद सैफुद्दीन चौधरी ने कहा कि यह एक काला बिल है और वो अपना समर्थन यूनिफॉर्म सिविल कोड को करते हैं। इस नए कानून की वजह से शाह बानो अदालत से लड़ाई जीतने के बाद भी हार गई और 1992 में ब्रेन हेमरेज होने की वजह से उनकी मौत हो गई। शाह बनो केस के 3 दशक बाद भी यूनिफॉर्म सिविल कोड को देश में लागू नहीं किया जा सकता है। हालाँकि, केन्द्र सरकार ने 2019 में ट्रिपल तलाक को खत्म कर दिया है, जिससे शाह बानो जैसी अनेक तलाकशुदा मुस्लिम महिला को राहत मिलेगी।
1984 सिख दंगे
1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उत्तेजित कांग्रेस नेताओं ने दिल्ली, कानपुर समेत देश के कई शहरों में सिख विरोधी दंगे कर दिए थे। सरकारी आंकड़ों की मानें तो इस हिंसा की वजह से देश भर में करीब 3,350 सिख मारे गए थे, जिनमें 2,800 सिखों की हत्या राजधानी दिल्ली में हुई थी। इस घटना के 34 साल बाद 17 दिसंबर 2018 को दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेस के नेता सज्जन कुमार को प्रमुख आरोपी बताते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई। वहीं, दंगा भड़काने में शामिल अन्य आरोपियों को 10 साल जेल की सजा सुनाई गई।
दंगे में कांग्रेस नेताओं द्वारा वोटर लिस्ट का दुरुपयोग किया गया। कांग्रेसी नेताओं ने वोटर लिस्ट, स्कूलों के रजिट्रेशन फॉर्म और राशन कार्ड का इस्तेमाल सिख धर्म के लोगों के घरों को चिन्हित करने के लिए किया गया। इस दंगे को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। दंगे की जांच के लिए 10 आयोग या समितियां बनाई गई, लेकिन राजीव गांधी सरकार के गृह मंत्रालय ने जांच को आगे नहीं बढ़ने दिया। इसमें कानून को ताक पर रख दिया गया था। यही नहीं, संविधान में कार्यपालिका को दिए गए अधिकारों की धज्जियां खुलेआम उड़ाई गई थी। दंगा भड़काने वाले लोग इसके बाद सालों तक खुले घूमते रहे, यहां तक की सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर जैसे कांग्रेसी नेता चुनाव लड़े और संसद सदस्य भी बने।












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