India China Faceoff: तवांग में भिड़े भारत-चीन के जवान, इस बार जमकर चीनियों ने ‘खाई लात’

साल 1962 की जंग के बाद से चीन हमेशा भारत पर हावी रहने का प्रयास करता रहा है। जबकि शायद वो भूल गया है कि ये ‘नया भारत’ है। 1962 से लेकर अब तक भारत की सामरिक, आर्थिक, कूटनीतिक स्थिति में बहुत बदलाव आ गया है।

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9 दिसंबर 2022 को अरुणाचल प्रदेश में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर तवांग सेक्टर में भारत और चीन के सैनिकों के बीच झड़प हुई। इस झड़प में भारत के 6 जवान घायल हुए, जिन्हें गुवाहाटी के अस्पताल ले जाया गया है। वहीं मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ज्यादा नुकसान चीनी सैनिकों का हुआ है और तकरीबन 30 सैनिक घायल हुए हैं।

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    न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक 17 हजार फीट की ऊंचाई पर यह झड़प हुई थी। चीन के 300 सैनिकों ने घुसपैठ की कोशिश की थी, लेकिन भारतीय सैनिकों ने उनकी हरकत का मुंहतोड़ जवाब दिया। वहीं घटना के बाद कमांडर लेवल की बातचीत हुई और दोनों ही पक्षों के जवान वहां से हट गए। इस क्षेत्र में दोनों सेनाएं कुछ हिस्सों पर अपना-अपना दावा ठोकती आई हैं। यहां साल 2006 से यह विवाद जारी है।

    चीन ने गलवान समझने की भूल की
    15 जून 2020 को लद्दाख की गलवान घाटी में भी चीनी सैनिकों ने ऐसी ही घुसपैठ की कोशिश की थी, तब भी भारतीय सेना के जवानों ने उनके मंसूबों को नाकाम कर दिया था। तब दोनों सेनाओं के बीच झड़प में 20 भारतीय सैनिक बलिदान हो गए थे, जबकि चीन के 38 सैनिक मारे गए थे। हालांकि चीन ने सरकारी तौर पर 4 सैनिक मारे जाने की बात ही कबूली थी।

    गोली न चलाने पर बनी थी सहमति
    1962 के युद्ध के बाद 1966-67 के बीच दोनों सरकारों की ओर से इस बात पर सहमति बनी थी कि सीमा पर चाहे कितने भी गहरे मतभेद और विवाद हो जाएं, तनाव की स्थितियां बनें लेकिन वो फायरिंग नहीं करेंगे। साथ ही मिलिट्री लेवल पर एक समझौता है। इसके तहत दोनों देशों के सैनिक एक तय दायरे में फायरिंग आर्म्स यानी रायफल या ऐसे ही किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं करेंगे। इसलिए भारत-चीन के सैनिकों के बीच बॉडी टू बॉडी फाइट होती है। लेकिन, गलवान झड़प में चीनी सैनिकों ने कांटेदार डंडों का इस्तेमाल किया था। इसके बाद भारतीय सैनिकों ने भी इसी तरह के इलेक्ट्रिक बैटन और कांटेदार डंडों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।

    चीन और भारत के बीच विवाद
    साल 1962 के बाद से भारत और चीन के बीच छह बार (1967, 1975, 1987, 2017, 2020 और 2022) छोटा बड़ा विवाद हो चुका है। वहीं News18 India की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 से लेकर 2018 के बीच चीनी सेना ने भारतीय सीमा में 1025 बार घुसने की कोशिश की और ये आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है।

    अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे है विवाद का कारण?
    दरअसल 1962 की जंग के बाद से अरुणाचल प्रदेश के तवांग पर चीन की बुरी नजर है। चीन सीमा बंटवारे पर मैकमोहन रेखा (1914) को नहीं मानता है, इसलिए 1962 के बाद से वह अरुणाचल को दक्षिणी तिब्बत बताता है। भारत चीन के साथ तकरीबन 3488 किमी की सीमा साझा करता है। चीन भारत के साथ तीन तरफ से सीमा साझा करता है- ईस्टर्न सेक्टर (अरुणाचल और सिक्किम), सेंट्रल सेक्टर (हिमाचल प्रदेश) और LAC यानि अक्साई चीन। दरअसल साल 1914 में मैकमोहन लाइन को भारत और चीन के बीच की सीमा मानी गई थी लेकिन 1962 जंग के बाद अक्साई चीन पर कब्जा कर लिया तो भारत ने बड़ा दिल दिखाते हुए साल 1993 में LAC (Line of Actual Control) को अपनी सीमा मान लिया।

    अब सवाल ये है कि फिर विवाद क्यों? दरअसल चीन ने पिछले कुछ सालों में तवांग, लद्दाख और LAC के करीब इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण को तेज रफ्तार दी है। हाईवे से लेकर मिलिट्री पोस्ट्स, हैलीपैड्स और मिसाइल लॉन्चिंग साइट्स तक उसने तैयार कर ली हैं। इसी को ध्यान में रखकर मोदी सरकार ने भी पिछले आठ साल में पूर्वोत्तर में सीमा पर अवसंरचना निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी ताकि सैन्य आवाजाही आसान हो सके और चीन के किसी भी दुस्साहस का करारा जवाब दिया जा सके। भारत ने चीन सीमा पर अरुणाचल प्रदेश में सड़क बनाने के लिए 40 हजार करोड़ का बजट दिया गया है। इसके कारण चीन को उसके मंसूबे फेल होते दिखाई दे रहे हैं क्योंकि भारतीय सेना का पहाड़ों पर आसानी से आवागमन हो जाएगा। यही बात चीन को दिक्कत दे रही है। इसी को अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे (आंशिक रूप से पूर्ण) नाम दिया गया है। यह देश की सबसे लंबी 2000 किमी और कठिन राजमार्ग परियोजना है जिसमें ब्रह्मपुत्र नदी के अंदर सुरंग (पूर्ण होने के करीब) भी होगी। यह 13 हजार फुट की ऊंचाई पर दो लेन की सुरंग है। जो रक्षा और निजी वाहनों को सीमा तक आवागमन सुनिश्चित करेगा।

    'LAC पर बदलाव बर्दाश्त नहीं'
    पिछले दिनों ही संसद में विदेश मंत्री जयशंकर प्रसाद ने एक सवाल पर कहा था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) में किसी भी तरह के एकतरफा बदलाव को भारत बर्दाश्त नहीं करेगा। हम चीन के साथ बहुत स्पष्ट कह रहे हैं कि हम LAC में किसी एकतरफा बदलाव को बर्दाश्त नहीं करेंगे। वहीं CDS ले. जनरल अनिल चौहान ने भी चीन को लेकर कहा कि सीमा के विवादित क्षेत्र से चीन की सेना अभी पूरी तरह से हटी नहीं है। ऐसे में भारतीय सेना भी सुरक्षा के मद्देनजर सभी ऐहतियाती कदम उठा रही है।

    तवांग में किसे मिलेगा फायदा?
    अगर तवांग में अभी भारत और चीन का युद्ध होता है तो भारत को तकनीकी रूप से बहुत फायदा होगा क्योंकि भारत तवांग में ऊंचाई पर तैनात है। ऐसे में हमें चीन के मुकाबले बढ़त हासिल है। साथ ही भारतीय सेना को ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तैनाती का बेहतर अनुभव है। हाई एल्टीट्यूड पर वॉर के मामले में भारतीय जवानों की कुशलता चीनी सैनिकों के मुकाबले बेहतर है। आपको याद होगा कि बीते साल जब लद्दाख के प्योंगयांग झील के पास विवाद हुआ था, तब ठंड बढ़ने पर चीनी सैनिक भाग खड़े हुए थे।

    सैन्य खर्च के मामले में भारत से आगे चीन
    हालांकि, सेनाओं पर खर्च करने के मामले में चीन भारत से कहीं आगे है। दुनियाभर में अमेरिका के बाद चीन का रक्षा खर्च 252.30 अरब डॉलर है। जबकि भारत का रक्षा खर्च 72.89 अरब डॉलर है। इस तरह चीन भारत के मुकाबले अपने रक्षा बजट पर चार गुना अधिक रकम खर्च करता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन का प्रति व्यक्ति सैन्य खर्च 175.3 डॉलर है। भारत का प्रति व्यक्ति सैन्य खर्च 52.8 डॉलर है।

    भारत की क्या है तैयारी
    चीन के साथ सीमा विवाद के बीच भारत अपनी सेना को मजबूत करने में जुटा है। सेना को लगातार विदेशी और स्वदेशी अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया जा रहा है। पूर्वी लद्दाख में विवाद के बीच भारत ने चीन सीमा पर हाई फ्रीक्वेंसी एयर डिफेंस सिस्टम, लेजर गाइडेट अत्याधुनिक मिसाइलें, मॉर्डन ड्रोन, आर्टिलरी गन, अत्याधुनिक कार्बाइन, पहाड़ी और दुर्गम स्थानों के अनुरूप तैयार टैंक को भी तैनात किया है। साथ ही लद्दाख में सुपर सोनिक क्रूज मिसाइल और माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प भी वहां ऑपरेशनल है। जबकि तवांग में भारत ने न्यू एज सर्विलांस सिस्टम भी लगाया हुआ है। पिछले साल ही तवांग में चिनूक हेलीकॉप्टर तैनात किए गए थे। इसके अलावा तवांग में बोफोर्स के बाद एम-777 हॉवित्जर की तैनाती की गई है।

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