15 अगस्त- दिल्ली का पुराना किला और दर्द से करहाते मुसलमान
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। दिल्ली का पुराना किला बेहद तारीखी स्थान है। उस पर कभी बाद में बात करेंगे। क्योंकि आज हम बात करने जा रहे हैं देश के विभाजन और इसके बीच के रिश्ते की। दरअसल यहीं पर उन मुसलमानों को ठहराया गया था, जो देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान जा रहे थे।
स्वतंत्रता के साथ-साथ जब देश के बंटवारे की बात आयी तो दिल्ली और उत्तर के मुसलमान पाकिस्तान की ओर चल पड़े। वाो पुराना किला ही था जहां पर लाखों मुसलमान आकर एकत्र हुए और फिर उन्हें ट्रेन से पाकिस्तान भेजा जाता था। ट्रेनें दिल्ली से कराची और लाहौर जाती थीं। ज्यादातर दिल्ली-यूपी के मुसलमान कराची जा कर बस गये।
सरहद के उस पार
इन लोगों को निजामउद्दीन रेलवे स्टेशन से पाकिस्तान जाने वाली ट्रेनों में सरहद के उस पार भेज जाता था। हिन्दी के महान कथाकार भीष्म साहनी जी ने उन दिनों की दिल्ली को अपनी कहानियों में बेहद सुदर तरीके से रखा है। रोज इधर सैकड़ों मुसलमान एकत्र होते थे। उन दिनों हालात तो बेहद खराब थे ही। प्रशासन नाम की कोई चीज थी नहीं। बारिश के मौसम के बावजूद लोग खुले आसमान में दिन-रात गुजारते थे। पानी की सही व्यवस्था ना होने के कारण बहुत से लोग बीमार हो गए थे।
15 अगस्त 1947 आजादी की रात की कहानी तस्वीरों की जुबानी
जब भर गया पुराना किला
पुराना किला भर गया तो और भीड़ बहुत बढ़ने लगी तो लोग हुमायूं के मकबरे में जाकर ठहरने लगे। वहां पर बड़ा मैदान है। उनके लिए गाडियों की व्यवस्था जब हो जाती थी तब उन्हें पाकिस्तान भेज दिया जाता था।
जो ट्रेन दिल्ली से मुसलमानों को लेकर जाती थी, वही ट्रेन लाहौर या कराची से हिंदुओं को भर कर लौटती थी। वे दिल्ली आने के बाद अपने संबंधियों के घरों में रहते थे या फिर किसी धर्मशाला में। उस दौर के कुछ लोगों को अब भी उन दिनों की यादें ताजा है। वरिष्ठ हिन्दी लेखक प्रताप सहगल बताते हैं कि उनके माता-पिता पाकिस्तान के शहर झंग से दिल्ली आए थे। वे बेहद काले दिन थे। अपने वतन को छोड़ना कोई आसान नहीं था।














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