Food Wastage: एक तरफ भुखमरी और दूसरी तरफ अरबों टन खाने की बर्बादी, आखिर कौन हैं जिम्मेदार
Food Wastage: क्या हम भारतीय दुनिया में सबसे ज्यादा खाना बर्बाद करते हैं? रोम स्थित खाद्य और कृषि संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल इतना भोजन फेंक देते हैं जिनको उपजाने में हम 10 करोड़ लोगों के पीने लायक पानी का इस्तेमाल कर देते हैं। चीन खाना बर्बाद करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है तो भूख से परेशान पाकिस्तान इस मामले में तीसरे स्थान पर है। पिछले महीने प्रकाशित इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर, उत्पादित भोजन का एक तिहाई बर्बाद हो जाता है, जिससे विश्व अर्थव्यवस्था को लगभग 750 बिलियन डॉलर (47 लाख करोड़ रुपये से अधिक) का नुकसान होता है। भारत और चीन मिलकर हर साल 1.3 अरब टन भोजन की बर्बादी के जिम्मेदार हैं।
यह शर्मनाक सच्चाई है कि मौजूदा दौर में दुनिया के करीब 82 देशों में 84 करोड़ से ज्यादा लोग भूखे रहने पर मजबूर होते हैं। यह दुनिया की कुल आबादी का लगभग 10वां हिस्सा है। इनमें से लगभग 35 करोड़ लोग तो भीषण खाद्य संकट से जूझ रहे हैं। जीने के लिए सबसे जरूरी भोजन, पानी और हवा जैसी बुनियादी चीजों में भोजन को लेकर लोगों की लापरवाही और दुनिया का हाल दोनों एक दूसरे के विरोधाभासी है

कोविड के बाद दुनिया में भुखमरी की हालत
पहले दुनिया में भूख की बात करें तो, संयुक्त राष्ट्र की ईकाई वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के आंकड़ों के अनुसार कोविड-19 महामारी से ठीक पहले साल 2019 में दुनिया में 13.5 करोड़ लोग भीषण खाद्य संकट से जूझ रहे थे। कोविड-19 का खतरा कम होने के बाद साल 2022 की शुरुआत में इनकी संख्या बढ़कर 28.2 करोड़ हो गई और अब साल 2023 की शुरुआत में इनकी संख्या दुनिया के 82 देशों में 35 करोड़ तक पहुंच गई।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार साल 2021 में दुनिया भर में सिर्फ भूख की वजह से पांच लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। इस संस्था की ओर से एक साल पहले जारी क्रॉप प्रॉस्पेक्ट्स एंड फूड सिचुएशन रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 45 देशों में करीब पांच करोड़ लोग अकाल जैसी हालत में हैं। इन देशों में अफ्रीका के 33, एशिया के नौ, लैटिन अमेरिका के दो और यूरोप के एक देश का नाम शामिल है। बिना बाहरी मदद के वहां के लोगों के लिए भूखों मरने की नौबत है।
वहीं डब्लूऍफ़पी ने साफ कहा है कि बीते महज पांच साल में दुनिया में अकाल का सामना कर रहे लोगों की संख्या 10 गुना बढ़ गई है। ये सब हालत तब हैं, जबकि दुनिया भर में भूख से पीड़ितों की बदहाली की ओर ध्यान खींचने और सेहतमंद भोजन के लिए जागरूकता बढ़ाने के लिए खाद्य एवं कृषि संगठन 16 अक्टूबर 1979 से ही हर साल वर्ल्ड फूड प्रोग्राम की देखरेख में खाद्य दिवस मनाता आ रहा है।
भारत में कितना खाना होता है बर्बाद
भूख की भयानक हालत से रूबरू होने के बाद चौंककर शर्मिंदा होने की वजह तब आती है जब हम दुनिया भर में भोजन की बर्बादी के आंकड़ों से दो-चार होते हैं। खाद्य संकट बढ़ाने में भोजन की बर्बादी की बड़ी भूमिका है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में साल 2019 में 93.1 करोड़ टन खाद्य सामग्री यानी भोजन बर्बाद हुआ। यह दुनिया के कुल खाद्य उत्पादन का 17 प्रतिशत है। बर्बाद भोजन में घरेलू खाना का हिस्सा सबसे ज्यादा 61 फीसदी है। वहीं, 26 फीसदी भोजन फूड सर्विस में और 13 फीसदी खाद्य सामग्री रिटेल फूड चेन में बर्बाद हुआ है।
भारत में इसकी भयावहता का आलम यह है कि यहां हर एक इंसान हर साल औसतन 50 किलो खाना बर्बाद कर देता है। देश में यह खाना लगभग उतना है, जितना देश में एक साल में पैदा हुए तिलहन, गन्ना और बागवानी का कुल उत्पादन होता है। हालांकि, एशिया और दुनिया के ज्यादातर देश तो इस मामले में भारत से काफी आगे हैं। सबसे ज्यादा खाद्य संकट झेल रहे अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों में भोजन बर्बादी का प्रति व्यक्ति औसत तो 100 किलो से भी ज्यादा है। इससे साफ जाहिर होता है कि भोजन की बर्बादी का भीषण खाद्य संकट से सीधा रिश्ता है। सिर्फ खाना बचाना शुरू करके दुनिया के कई देशों के लोगों को भुखमरी की हालत से बाहर लाया जा सकता है।
वर्ल्ड फूड वेस्ट की रैंकिंग में चीन का हाल बदतर
पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली वेबसाइट ग्रीनली ने अपनी हालिया रिपोर्ट में साल 2023 के वैश्विक खाद्य अपशिष्ट के बारे बताया कि चीन और भारत दुनिया भर में किसी भी अन्य देश की तुलना में हर साल अनुमानित 92 मिलियन और 69 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक घरेलू खाद्य अपशिष्ट पैदा करते हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि दोनों देशों की आबादी विश्व स्तर पर अब तक की सबसे बड़ी आबादी है।
अक्सर माना जाता है कि भोजन की बर्बादी अमीर देशों में ज्यादा होती है, लेकिन इससे उलट प्रति व्यक्ति भोजन की बर्बादी के मामले में विकसित और विकासशील देशों के बीच काफी समानताएं हैं। भोजन के सामानों की बर्बादी के सामाजिक प्रभाव भी होते हैं जो हम सभी को प्रभावित करते हैं। इससे न केवल वर्ल्ड इकोनॉमी को हर साल सैकड़ों अरब डॉलर का नुकसान होता है और संसाधनों की कमी होती है, बल्कि यह पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचाता है और जलवायु संकट में योगदान देता है।
आमतौर पर फूड वेस्ट को लैंडफिल साइटों पर फेंक दिया जाता है। वहां सड़ कर यह बड़ी मात्रा में मीथेन गैस पैदा करता है। एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस मीथेन के दुष्प्रभाव से शायद ही कोई अनजान हो। खाद्य अपशिष्ट वैश्विक खाद्य प्रणाली ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का अनुमानित नौ प्रतिशत है। यह साल 2015 में कुल 17.9 बिलियन मीट्रिक टन CO2 के बराबर था।
जिनपिंग के दावों को लगा पलीता
ग्लोबल हंगर इंडेक्स में अपने देश भारत का खराब रैंक बताया जाता है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में साल 2020 में भारत 94वें नंबर पर था। साल 2021 में सात पायदान फिसलकर 101वें नंबर पर जा पहुंचा और साल 2023 में 107वें नंबर पर बताया जा रहा है। इसे देखकर चिंता होना स्वाभाविक है। हाल ही में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के गरीबी-मुक्त देश होने के दावे को लगातार भुखमरी की खबरें पलीता लगा रही हैं।
ग्लोबल टाइम्स ऑफ चाइना की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में ऑपरेशन 'क्लीन योर प्लेट' कैंपेन शुरू कर बताया जा रहा है कि थाली में उतना ही खाना लें, जितनी भूख हो। खाद्य सामग्री की कमी के कारण चीन का काफी लोकप्रिय लाइव और वेबकास्ट शो मुकबंग खतरे में आ गया है। चाइना नेशनल रेडियो के मुताबिक इस शो के दौरान होस्ट ढेर सारा खाना खाते हुए दिखता है। शो के जरिए करोड़ों कमाने वाले होस्ट चीन में स्टेट मीडिया की कड़ी आलोचना से जूझने पर मजबूर है। चीनी मीडिया सरेआम ऐसे होस्ट को भुखमरी का गुनाहगार ठहरा रहा है। माना जा रहा है कि इस टीवी शो पर जल्द ही आधिकारिक तौर पर रोक लगाई जा सकती है।
खाद्य संकट से मुकाबला करने का क्या है कारगर उपाय
360इंफो डॉट ओआरजी की एक रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि दुनिया भर में खाद्यान्न का लगभग 30 प्रतिशत फसल खाने की प्लेट तक नहीं पहुंच पाता है। लिहाजा इसकी पैदावार में लगने वाला बीज, पानी, भूमिगत खनिज और मानव श्रम जैसे संसाधन बर्बाद हो जाते हैं। खाद्यान्न की इस बर्बादी को वितरण की प्रभावशाली सप्लाई और उचित पैकिंग के जरिए रोका जा सकता है। भारत के मामले में बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम मन की बात में भोजन की बर्बादी को रोकने की अपील की थी।
हम थोड़ा गंभीर और जागरूक होकर रहें तो भोजन की बर्बादी को बड़े पैमाने पर रोकने में योगदान कर सकते हैं। इन उपायों में जरूरत से ज्यादा भोजन न बनाना, थाली में खाने से ज्यादा सामान नहीं लेना, समारोहों को बेहद खर्चीला नहीं बनाना, खाद्य सामग्रियों के भंडारण और वितरण में उचित रख-रखाव के नियमों का पालन करना, गरीबों तक हरसंभव तरीके से खाना पहुंचाने में मदद करना, खाना बचाने की सरकारी और गैरसरकारी योजनाओं में हाथ बंटाना जैसे कारगर काम शामिल हैं।
इसके अलावा भारतीय प्राचीन ज्ञान परंपरा में जैसा खाए अन्न वैसा हो मन, अन्न ब्रह्म है, भोजन प्रसाद है, जूठन नहीं छोड़ना, उतना ही लें थाली में जो व्यर्थ न जाए नाली में, मिल-बांटकर खाना, कोई भूखा न रह जाए, खेती और किसानी को महत्व देने, भंडारा-लंगर लगाने जैसे प्रेरक सूत्रों और कामों को अपने जीवन में अमल करना भी खाद्य संकट को मिलकर पराजित करने का सटीक उपाय हो सकता है।
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