Colony on Moon: कितने लोग रह सकते हैं चांद पर, कैसे बनाई जाएंगी मानव बस्तियां?
Colony on Moon: पृथ्वी से 3 लाख 84 हजार 400 किलोमीटर दूर स्थित चांद प्रेमी जोड़ों के लिए प्यार का प्रतीक माना जाता है। वहीं इस चांद की चांदनी पर दुनिया भर के लिए लेखक साहित्य लिख चुके हैं।
धरती और यहां रहने वाले लोगों से चांद का एक अहम रिश्ता है, जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। वैज्ञानिकों की मानें तो चांद और पृथ्वी का जन्म लगभग एक साथ हुआ है, वहीं कई वैज्ञानिकों का तर्क है कि पृथ्वी से टूटकर ही चांद का निर्माण हुआ।

कई वैज्ञानिक गतिविधियों के जरिए चांद पर जीव तलाशने की कोशिश की गई, हालांकि वहां एलियन जैसे कोई जीव नहीं दिखाई दिए। लेकिन इससे चांद पर मानव बस्ती बसाने की उम्मीद खत्म नहीं होती। चंद्रमा ही धरती का इकलौता ऐसा उपग्रह है, जहां मानव ने सबसे पहले कदम रखा था। इसलिए यहां इंसानी दुनिया बसाने की उम्मीद कई गुना बढ़ जाती है।
यह तो हम सभी जानते हैं कि धरती पर जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, जिसकी वजह से वैज्ञानिक दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावना तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। वैज्ञानिक चांद पर इंसानों को बसाने की तैयारी कर रहे हैं, हालांकि यह काम इतना भी आसान नहीं है। क्योंकि न तो चांद के पास पृथ्वी जैसा वातावरण है और न ही यहां पानी और भोजन के साधन उपलब्ध हैं।
चंद्रमा पर मानव आबादी
दुनिया की तमाम स्पेस एजेंसीज की तरह भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो भी चांद पर मानव बस्ती बसाने का काम कर रही है। इस काम के लिए रोबोट और थ्री डी प्रिंटर की मदद ली जा सकती है। दरअसल इन मशीनों के जरिए चंद्रमा पर मौजूद मिट्टी और दूसरे पदार्थों का इस्तेमाल करके इग्लू जैसे घरों का निर्माण किया जा सकता है।
चांद का पृष्ठीय क्षेत्रफल (सर्फेस एरिया) 3 करोड़ 80 लाख वर्ग किलोमीटर है, इस लिहाज से उस पर 2 अरब लोग आसानी से निवास कर सकते हैं। लेकिन अगर इसकी तुलना पृथ्वी के पृष्ठीय क्षेत्रफल से की जाए तो यहां जनसंख्या घनत्व अलग-अलग है। जैसे अगर चंद्रमा मोनेको देश जितना ज्यादा जनसंख्या घनत्व वाला हो जाए, तो वहां 70,000 करोड़ लोग निवास कर सकते हैं। लेकिन अगर चांद मंगोलिया की तरह कम जनसंख्या घनत्व वाला हो, तो वहां केवल 7 करोड़ 60 लाख लोग ही रह सकते हैं।
यानी अगर पृथ्वी के अलावा किसी दूसरे ग्रह पर जीवन की तलाश की जाए तो मंगल के सिवा हमारे पास चंद्रमा भी एक विकल्प है। अपोलो मिशन को चांद तक पहुंचने में सिर्फ 4 दिन का समय लगा था। इस लिहाज से वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रमा पर इंसानी बस्ती बसाई जा सकती हैं। लेकिन यह काम इतना भी आसान नहीं।
वातावरण
दरअसल चंद्रमा की जमीन और वातावरण पृथ्वी से काफी अलग और कठिन है। यहां रात और दिन के तापमान में बहुत ज्यादा अंतर होता है। रात के समय चंद्रमा का तापमान माइनस 183 डिग्री होता है, जबकि दिन के समय इसका तापमान 127 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे तापमान में इंसान का जीवित रह पाना बेहद मुश्किल है।
दरअसल धरती के पास खुद का वातावरण है, ऐसे में सूर्य की गर्मी का उस पर कोई असर नहीं पड़ता है। धरती का वातावरण अपने आप सूर्य की गर्मी को चारों तरफ बांट देता है, इसलिए यहां दिन और रात के तापमान में ज्यादा फर्क नहीं देखा जाता। लेकिन चंद्रमा के पास अपना कोई वातावरण नहीं है, जिसकी वजह से यहां दिन और रात का तापमान एक जैसा नहीं होता। वहीं चंद्रमा का 1 चक्कर 27 दिन के बराबर होता है, जिसकी वजह से चांद के एक हिस्से में 13.5 दिन तक गर्मी पड़ती है जबकि बाकी के 13.5 दिन ठंड रहती है। सूर्य की तेज किरणों से बचने के लिए चांद के पास मेगनेटिक फील्ड भी नहीं है
ऑक्सीजन
तापमान में भारी अंतर के अलावा चंद्रमा पर ऑक्सीजन की भी कमी है, ऐसे में वहां कुछ दिन तक ऑक्सीजन सिलेंडर के जरिए रहा जा सकता है। लेकिन लंबे समय तक चांद पर रहने के लिए वहीं पर ऑक्सीजन का निर्माण करना होगा, जिसके लिए चांद की मिट्टी का इस्तेमाल किया जा सकता है।
यूरोपियन स्पेस एजेंसी चांद की मिट्टी से ऑक्सीजन का सफल निर्माण कर चुकी है। वैज्ञानिकों ने 3 टन चंद्रमा की मिट्टी से 1 टन ऑक्सीजन बनाने का सफल प्रयोग किया था। चंद्रमा पर ऑक्सीजन की पूर्ति करने के लिए वहां एक बड़ा ऑक्सीजन प्लांट लगाना होगा, जिसके जरिए चंद्रमा पर बसने वाले लोगों को पर्याप्त मात्रा में सांस लेने के लिए ऑक्सीजन मिल सके।
पानी की कमी
सांस लेने के साथ-साथ जिंदगी जीने के लिए पानी बेहद जरूरी है, अगर पीने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी न मिले तो चंद्रमा में बसने का कोई फायदा नहीं। लेकिन वैज्ञानिकों ने इस मुश्किल को हल करने का भी एक तरीका खोज लिया है।
कई सालों तक यह माना जाता था कि चंद्रमा पर पानी बर्फ के रूप में मौजूद है, लेकिन भारतीय स्पेस एजेंसी के मिशन चंद्रयान-1 से यह पता चला कि चंद्रमा पर पानी तरल रूप में भी मौजूद है। हालांकि उस पानी की मात्रा बेहद कम है। लेकिन चंद्रमा पर मौजूद तरल कुछ समय के लिए मानव जीवन के लिए काफी होगा।
खानपान
दरअसल चंद्रमा की जमीन और वातावरण ऐसा नहीं है कि वहां धरती की तरह खेती की जा सके। लेकिन आधुनिक टेक्नोलॉजी की मदद से चंद्रमा पर भी खेती की जा सकती है। हालांकि यह खेती धरती से काफी हद तक अलग होगी।
चाइना की स्पेस एजेंसी ने चैंगे-4 मिशन के जरिए चंद्रमा की कम ग्रेवेटी वाले वातावरण में तकनीकी की मदद से कपास का एक पौधा उगाने में सफलता हासिल की थी। लेकिन यह पौधा स्पेस क्राफट के अंदर उगाया गया था। ठीक इसी तरह चंद्रमा पर आलू की खेती भी की जा सकती है। दरअसल आलू एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जिसकी खेती में न तो ज्यादा मेहनत लगती है और न ही समय।
स्पेस एजेंसी के प्रयास
अलग-अलग देशों ने समय-समय पर मानव रहित और मानव समेत कई मिशन चांद पर भेजे हैं, ताकि उससे जुड़ी तमाम गतिविधियों का पता लगाया जा सके। चंद्रमा पर इंसानी घर बसाने की बात मात्रा एक कल्पना नहीं है, बल्कि यहां पाए गए पानी, चट्टान और मिट्टी की तमाम रिसर्च से यह पता चलता है कि चंद्रमा पर इंसानी बस्ती बसाना मुमकिन है। चंद्रमा के अलावा मंगल ग्रह पर भी जीवन की तलाश की जा रही है, यह ग्रह काफी हद तक धरती से मिलता-जुलता है।
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