R&AW Chief: कैसे हुई थी ‘रॉ’ की स्थापना, कौन थे इसके पहले प्रमुख?
R&AW Chief: 19 जून 2023 को भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के वरिष्ठ अधिकारी रवि सिन्हा को भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) का नया प्रमुख नियुक्त किया गया है। वह छत्तीसगढ़ कैडर के 1988 बैच के अधिकारी है। इससे पहले मंत्रिमंडल सचिवालय में विशेष सचिव के रूप में कार्यरत थे। रवि सिन्हा अब सामंत कुमार गोयल की जगह लेंगे, जिनका कार्यकाल 30 जून 2023 को पूरा हो रहा है।
रॉ पर विदेशी इंटेलिजेंस की जानकारी जुटाने की जिम्मेदारी होती है। अगर किसी देश के घटनाक्रम का भारत पर असर हो सकता है तो रॉ उस पर नजर रखती है। साथ ही राष्ट्रहितों के लिए कई तरह के ऑपरेशंस को रॉ अंजाम भी देती है। वैसे क्या आपको पता है कि रॉ कब, क्यों और किसने शुरू किया? इससे भारत को क्या फायदा हुआ?

खुफिया एजेंसी की जरुरत
यह किस्सा साल 1962 (भारत और चीन) और 1965 (भारत और पाकिस्तान) के युद्धों के दौरान का है। तब इन दोनों युद्धों के समय आईबी ने जो भी खुफिया जानकारी इकट्ठा की, उससे देश को उतना फायदा नहीं मिला था, जितने की उम्मीद थी। फिर 11 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानंमत्री बनी। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह एहसास हुआ कि आईबी 1962 और 1965 के युद्धों में चीन और पाकिस्तान की तैयारियों का पूर्वानुमान लगाने में विफल रही थी।
इसलिए 1968 में प्रधानमंत्री गांधी ने सीआईए (अमेरिका) और एमआई 6 (ब्रिटेन) की तर्ज पर भारत में भी देश के बाहर के खुफिया मामलों के लिए एक एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) बनाने का फैसला किया। इसके लिए इंदिरा गांधी ने रामेश्वरनाथ काव की सहायता ली।
रामेश्वरनाथ काव तब आईबी के सबसे सीनियर पद पर थे। साथ ही वह देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी संभाल चुके थे। प्रधानमंत्री गांधी ने इन्हें भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) का पहला चीफ नियुक्त किया और 21 सितंबर 1968 को रॉ का गठन किया गया।
रामेश्वरनाथ काव कौन थे?
रामेश्वरनाथ काव का जन्म 10 मई 1918 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक कश्मीरी पंडित के घर हुआ था। मगर उनका बचपन चाचा पंडित त्रिलोकीनाथ काव की देखरेख में बिता। स्कूली शिक्षा बड़ौदा में हुई और यहां से उन्होंने 1932 में मैट्रिक तथा 1934 में इंटरमीडिएट किया।
1936 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में मास्टर डिग्री हासिल करने का फैसला किया। वहीं साल 1940-1941 में वह इंपीरियल पुलिस में शामिल हो गये और उन्हें उत्तर प्रदेश कैडर में नियुक्त किया गया। फिर 3 जून 1947 को उन्हें सेंट्रल इंटेलिजेंस ब्यूरो में बतौर सहायक निदेशक नियुक्त किया गया।
काव ने दिखाया अपना दम
रॉ बनने के बाद सबसे पहले इसने अपनी उपयोगिता साल 1971 के भारत और पाकिस्तान युद्ध में दिखाई। आपको बता दें कि बांग्लादेश के गठन में रॉ की खास भूमिका थी। भारतीय सेना के बांग्लादेश पहुंचने से पहले मुक्ति वाहिनी के गठन और पाकिस्तानी सेना से उसके संघर्ष में रॉ ने जबरदस्त मदद दी थी। रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव रहे बी. रमन ने अपनी किताब 'द काऊ बॉएज ऑफ रॉ' में लिखते हैं कि 1971 में रॉ को इस बात की पूरी जानकारी थी कि पाकिस्तान किस दिन भारत पर हमला करने जा रहा है।
80 के दशक में रॉ के प्रमुख रहे आनंद कुमार वर्मा ने बीबीसी को बताया था कि जब रॉ को वायरलेस के जरिए एक कोडेड संदेश मिला था, जिसे डिकोड करने में थोड़ी गलती हो गई। यह संदेश था कि पाकिस्तान 1 दिसंबर 1971 को हमला करेगा। इस सूचना पर वायु सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया। लेकिन, 2 दिसंबर तक हमला नहीं हुआ। इस पर वायु सेना प्रमुख पी.सी. लाल ने रॉ के चीफ रामेश्वर काव से कहा कि आपकी सूचना में कितना दम है? वायु सेना को इस तरह हाई अलर्ट पर बहुत दिनों तक नहीं रखा जा सकता है।
तब काव ने कहा कि एक दिन और रुक जाइये। एयर चीफ मार्शल मान गये और अगले ही दिन 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने 11 भारतीय वायु सेना स्टेशनों पर हवाई हमले शुरू कर दिये। भारतीय वायु सेना उसके लिए पूरी तरह से तैयार थी। हालांकि, इसके बाद ही भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान में बांग्लादेश स्वतंत्रता संग्राम में सीधे तौर पर शामिल हो गयी थी। ये रॉ ही था, जिनकी सूझबूझ से भारत ने पाकिस्तान को मात दी थी।
सिक्किम के भारत में विलय में रॉ की भूमिका
रॉ के एक पूर्व अधिकारी आर.के. यादव अपनी किताब 'मिशन आर एंड डब्ल्यू' में लिखते हैं कि सिक्किम के विलय की योजना रॉ प्रमुख काव ने ही बनाई थी। दरअसल सिक्किम के महाराज चोग्याल ने एक अमरीकी महिला से शादी कर ली थी और उसकी वजह से सीआईए (अमेरिका खुफिया एजेंसी) उस क्षेत्र में अपने पांव पसारने लगी थी।
सीआईए का दखल होने से भारत पर खतरा मंडराने लगा था क्योंकि अमेरिका उस वक्त पाकिस्तान का खुलकर समर्थन करता था। वहीं 1962 में चीन-भारत युद्ध से भारत के लिए खतरा बढ़ गया था, क्योंकि तिब्बत पर चीन का कब्जा हो गया था, जो सिक्किम से सटा है। अब चीन एक झटके में सिक्किम पर कब्जा कर लेगा तो भारत का उत्तरी क्षेत्र खतरे में आ जायेगा।
बीबीसी के मुताबिक तब रॉ प्रमुख काव ने इंदिरा गांधी को सिक्किम को भारत में विलय करने की सलाह दी। इस बात को केवल तीन लोगों को पता था। इंदिरा गांधी, पी.एन. हक्सर और रामेश्वरनाथ काव। काव अपने सिर्फ तीन अफसरों के साथ इस ऑपरेशन को अंजाम दे रहे थे। यहां तक कि रॉ के नंबर 2 के शंकरन नायर को भी इसकी जरा भी भनक नहीं लगी थी। चीन की सेना सीमा पर थीं, लेकिन काव के कुशल नेतृत्व और शानदार रणनीति की वजह से बगैर खून बहे ही 3000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र का भारत में विलय कराया गया और सिक्किम भारत का 22वां राज्य बना।
काव ने तीन प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया
रामेश्वरनाथ काव ऐसे शख्स थे, जिन्होंने भारत के तीन प्रधानमंत्रियों के करीब रहकर उनके साथ काम किया। काव को देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मिलकर काम किया और रॉ के निदेशक के रूप में 1968 से 1977 तक अपनी सेवा दी। उनके काम से प्रभावित होकर प्रधानमंत्री गांधी ने उनका कार्यकाल बढ़ाने का फैसला किया था। उसके बाद काव को केंद्रीय कैबिनेट का सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया था। फिर उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी सुरक्षा के मामलों और खुफिया विभाग के अध्यक्षों से संबंध स्थापित करने में विशेष सलाहकार के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं।
काव के काम को दुनिया ने माना
साल 1982 में फ्रांस की खुफिया एजेंसी एसडीईसीआई के प्रमुख काउंट एलेक्जांड्रे से जब एक इंटरव्यू में पूछा गया था कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खुफिया प्रमुखों में वे किसे रखेंगे? तो काउंट ने पांच नाम बताये थे। इन नामों में आर.एन. काव का नाम उन्होंने दूसरे नंबर पर लिया था।
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