G7 Summit: क्रूड ऑयल की लड़ाई के बीच जाने क्यों और कैसे हुआ जी-7 का गठन?
हिरोशिमा में जी-7 देशों का सम्मेलन शुरू हो गया है। इस समिट में भाग लेने के लिए जी-7 देशों के अलावा भारत सहित कुछ अन्य विशेष आमंत्रित देशों के प्रमुख भी पहुंचे हैं।

जी-7 के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान पहुंच चुके है। इस साल इसकी अध्यक्षता जापान कर रहा है। वैसे भारत जी-7 समूह का हिस्सा नहीं, लेकिन इसके बावजूद भी भारत को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है। प्रधानमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी चौथी बार जी-7 की बैठकों में मौजूद रहने वाले हैं।
जी-7 दुनिया की सात विकसित और उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों का एक वैश्विक समूह है। जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका शामिल हैं। इसे ग्रुप ऑफ सेवन भी कहा जाता है। यह समूह खुद को 'कम्यूनिटी ऑफ वैल्यूज' यानी मूल्यों का आदर करने वाला समुदाय मानता है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि यह संगठन कैसे काम करता है, इसका गठन क्यों किया गया?
क्या है जी-7?
जी-7 दुनिया के बड़ी तथा प्रमुख अर्थव्यवस्था वाले राष्ट्रों का एक अनौपचारिक मंच है। जिसमें सात देश शामिल हैं। इसका प्रत्येक सदस्य देश बारी-बारी से इसकी अध्यक्षता करता है और दो दिवसीय वार्षिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी करता है। इस बार यह मेजबानी जापान कर रहा है। मेजबान देश ही किसी अन्य देश को अतिथि के तौर पर सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित करता है। यह संगठन स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की सुरक्षा, लोकतंत्र और कानून का शासन और समृद्धि और सतत विकास, के प्रमुख सिद्धांत पर काम करता है।
जी-7 देशों की जीडीपी और अर्थव्यवस्था?
दुनिया की कुल आबादी का लगभग 10 प्रतिशत जी-7 देशों में बसती है। जबकि वैश्विक जीडीपी में जी-7 देशों की हिस्सेदारी लगभग 31 प्रतिशत है। गौरतलब है कि यह जीडीपी तीन दशक पहले लगभग 70 प्रतिशत के करीब थी। वहीं वैश्विक व्यापार में भी जी-7 देश प्रमुख देशों के रूप में गिने जाते हैं।
जी-7 की बैठकों का एजेंडा
इसकी पहली बैठक 1975 में हुई थी, तब वैश्विक आर्थिक संकट के संभावित समाधानों पर विचार किया गया था। इसके बाद ऊर्जा नीति, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सुविधाएं और वैश्विक सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चिंतन किया गया। साथ ही चीन और रूस के वैश्विक प्रभाव को थामने पर भी आपसी चर्चा की गयी थी।
इस साल जापान में परमाणु निरस्त्रीकरण, आर्थिक लचीलापन और आर्थिक सुरक्षा, क्षेत्रीय मुद्दे, जलवायु और ऊर्जा समेत कई मुद्दों पर चर्चा होगी। हालांकि, जिन पर चर्चाएं होती हैं, उसे लेकर शिखर सम्मेलन के अंत में एक सूचना जारी की जाती है, जिसमें सहमति वाले बिंदुओं का जिक्र होता है। सम्मलेन में भाग लेने वाले लोगों में जी-7 देशों के राष्ट्र प्रमुख, यूरोपीयन कमीशन और यूरोपीयन काउंसिल के अध्यक्ष शामिल होते हैं।
क्या है जी-7 का इतिहास?
अमेरिकी थिंक टैंक Council on Foreign Relations (CFR) के मुताबिक सीरिया और मिस्र ने 6 अक्टूबर 1973 को 'योम किप्पुर' यानि यहूदी पवित्र दिन पर इजराइल पर हमला कर दिया। इसी दौरान 19 अक्टूबर को अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने अरब देशों से लड़ने के लिए इजराइल को 2.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सैन्य सहायता पैकेज की घोषणा कर दी।
इजराइल की इस मदद से 'ओपेक देश' सऊदी अरब नाराज हो गया और उसने तेल के उत्पादन में 14 प्रतिशत की भारी कटौती कर दी। ऑयल प्रोडक्शन कम करने का मकसद फिलिस्तीन के खिलाफ इजराइल का समर्थन करने वाले पश्चिमी देशों को सबक सिखाना था। नतीजा यह हुआ कि 1974 आते-आते पूरी दुनिया में तेल की किल्लत हो गई। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें कुछ ही महीनों में 40 प्रतिशत तक बढ़ गई। इस वजह से उस दौर के छह विकसित देशों को एक वैश्विक मंच पर आने का मौका मिला।
इसके बाद साल 1975 में दुनिया के 6 अमीर देश - अमेरिका, जर्मनी, जापान, इटली, ब्रिटेन और फ्रांस ने अपने-अपने हितों को साधने के लिए एक संगठन का गठन कर लिया। इसे 'ग्रुप ऑफ सिक्स' कहा गया। इसके एक साल बाद 1976 में कनाडा भी जुड़ गया।
रूस को बनाया सदस्य फिर निकाला क्यों?
साल 1998 में अमेरिका की सलाह पर जी-7 के देशों ने इसमें रूस को शामिल किया था। तब रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन थे और अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन। तब रूस की पॉलिसी अमेरिका और पश्चिमी देशों के समर्थन वाली थी। रूस के शामिल होने पर जी-7 का नाम जी-8 हो गया था। लेकिन, तकरीबन 16 साल बाद साल 2014 में रूस ने क्रिमिया पर कब्जा कर लिया। इससे गुस्साए बाकी सदस्य देशों ने रूस को संगठन से बाहर कर दिया।
क्या भारत जी-7 का सदस्य बनेगा?
साल 2019 से आयोजित हो रहे जी-7 समिट को देखा जाये तो सभी समिट में भारत को एक मेहमान देश के तौर पर बुलाया जा रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि अगर निकट भविष्य में भारत जी-7 का स्थायी सदस्य बन जाता है तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं होगी। हालांकि, भारत या किसी अन्य देश को जी-7 का सदस्य बनाये जाने को लेकर कभी किसी संबंधित देश द्वारा कोई बयान नहीं आया है।
कब-कब भारत बना जी-7 का हिस्सा?
भारत को पहली बार 2003 में फ्रांस ने जी-7 सम्मेलन में गेस्ट कंट्री के तौर पर बुलाया था। उस समय देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी समिट में भाग लेने के लिए फ्रांस गये थे। उसके बाद 2005 से 2009 तक भारत को लगातार जी-7 समिट में भारत को निमंत्रण दिया गया। तब पांचों समिट में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह शामिल हुए थे।
इसके 10 साल बाद भारत को फिर से 2019 में बुलाया गया। 2019 में भी भारत को फ्रांस ने ही बुलाया था। वहीं 2019 के बाद से अब तक लगातार भारत को बुलाया जा रहा है। हालांकि, 2020 में अमेरिका की मेजबानी में होने वाली समिट को कोविड-19 के कारण रद्द कर दिया गया था, जबकि 2021 में ब्रिटेन ने बुलाया था। इसमें पीएम मोदी ने वर्चुअली हिस्सा लिया था। जबकि 2022 में जर्मनी ने बुलाया था और अब जापान ने।
भारत को क्यों मिल रही जी-7 में इतनी अहमियत?
इस अहमियत का मुख्य कारण दुनिया में भारत की बदलती हुई भूमिका है। भारत तेजी से आर्थिक रूप से मजबूत राष्ट्र बन रहा है। आज भारत की जीडीपी पूरी दुनिया में पांचवे स्थान पर है। दूसरी तरफ जी-7 देशों की वैश्विक जीडीपी में हिस्सेदारी लगातार घट रही है। ऐसे में तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में इन देशों को भारत के समर्थन की जरूरत है।
साथ ही प्रशांत हिंद क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे और रूस के प्रभाव को रोकने के लिए दुनिया के इन देशों को भारत की जरूरत है। पश्चिम देश यह महसूस करने लगे है कि एशिया में भारत ही चीन को रोकने का दमखम रखता है। ऐसे में चीन पर लगाम लगाने के लिए जी-7 देश भारत को अपने साथ लाना चाहते हैं।
भारत के साथ इनको भी मिला निमंत्रण?
हर साल गेस्ट कंट्री के तौर पर जी-7 के मेजबान देश द्वारा कई देशों को निमंत्रण दिया जाता है। इस बार भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कोमोरोस, कुक आइलैंड्स, इंडोनेशिया, साउथ कोरिया, वियतनाम को भी गेस्ट कंट्री के तौर पर बुलाया गया है। वहीं, संस्था के रूप में यूनाइटेड नेशन, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, डब्ल्यूएचओ और डब्ल्यूटीओ को बुलाया गया है।












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