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Surat Diamond City: कपड़ों के कारोबार से डायमंड कैपिटल कैसे बना सूरत?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सूरत के ड्रीम सिटी में सूरत डायमंड बर्स (एसडीबी) का उद्घाटन किया। एसडीबी डायमंड कैपिटल सूरत स्थित सबसे बड़ा हीरा व्यापार केंद्र होगा, जिसे आर्किटेक्चर फर्म मॉर्फोजेनेसिस ने डिजाइन किया है। इसका क्षेत्रफल 6,60,000 वर्ग मीटर है। फ्लोर एरिया के मामले में यह अमेरिकी पेंटागन को भी पीछे छोड़ देता है। सूरत डायमंड बर्स राष्ट्रीय हीरा अनुसंधान संस्थान के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र एवं अंतरराष्ट्रीय सुख सुविधाओं वाला पांच सितारा होटल के रूप में भी स्थापित है। यहाँ समर्पित कस्टम हाउस भी है। सूरत डायमंड बर्स का निर्माण 2015 में शुरू हुआ था। आइए जानते हैं कि कपड़ों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध सूरत आखिर डायमंड कैपिटल कैसे बन गया?

surat diamond city

दक्षिण अफ्रीका से हीरा खनन की शुरुआत
हीरे की खोज और इसके खनन की शुरुआत ब्राज़ील और दक्षिण अमेरिका के कुछ स्थानों से 18वीं सदी में हुई। 1800 ईसवी के उतरार्द्ध में दक्षिण अफ्रीका ने हीरे के भंडार का पता लगाया और 1866 में किम्बरली में हीरे का खनन भी शुरू हो गया। उस समय कई भारतीयों ने दक्षिण अफ्रीका पहुंचकर हीरे के व्यापार में हाथ आजमाना शुरू कर दिया।

सूरत के हीरा उद्योग का इतिहास भी 1900 ईसवी से ही जुड़ा हुआ है। सूरत के दो उद्यमी भाइयों, गंडाभाई कुबेरदास मावजीवनवाला और श्री रंगीलदास कुबेरदास मावजीवनवाला ने दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद सूरत में हीरे की कटाई और पॉलिशिंग की योजना बनाई। दोनों भाइयों ने 1901 में सूरत के हीरा पॉलिश उद्योग को शुरू करने के लिए दक्षिण अफ्रीका से हीरे काटने वाले मजदूरों से भरी एक नाव मंगवाई। लेकिन बड़े पैमाने पर हीरा उद्योग को स्थापित करने का दोनों भाइयों का सपना साकार होने में आधी सदी लग गई।

जापान-बर्मा युद्ध सूरत के लिए वरदान बना
1940 से पहले, रंगून, म्यांमार (बर्मा) में बड़े पैमाने पर हीरे की कटाई और पॉलिश का काम किया जाता था। हीरे रूस, बोत्सवाना, कनाडा, कांगो और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों से आते थे। लेकिन जब जापानियों ने बर्मा पर आक्रमण किया, तो वहाँ के कई हीरा कारीगर सूरत के हीरा व्यापारियों के पास भारत पहुंच गए। जल्दी ही हीरा उत्पादक देश अपना-अपना हीरा रंगून के बजाय सूरत में भेजने लगे।

1960 के दशक में, सूरत में हीरा काटने और पॉलिश करने का उद्योग तेजी से बढ़ने लगा। सौराष्ट्र के पटेल समुदाय के उद्यमियों ने इस व्यापार को गति दी। फिर उत्तरी गुजरात के जैन समुदाय ने सामूहिक रूप से इस उद्यम को समृद्ध बनाने में मदद की। 1991 में आर्थिक सुधारों से इस उद्योग का और अधिक विस्तार हुआ। 2005 के आंकड़े के अनुसार उस वर्ष सूरत में पूरी दुनिया के 92 प्रतिशत हीरे की कटाई हुई थी। उस वर्ष भारत को हीरे के निर्यात से 15 अरब डॉलर की कमाई हुई थी। इस समय भारत सालाना लगभग 11 अरब डॉलर मूल्य के कच्चे हीरे का आयात करता है, जिसमें 80 प्रतिशत हीरा खनन कंपनियों से सीधे आता है।

हीरे तराशने का हब बना सूरत
गुजरात में तापी नदी के किनारे बसा 'डायमंड सिटी' सूरत दुनिया के 90 प्रतिशत प्राकृतिक हीरे को निखारता है। यह शहर परंपरा और आधुनिकता के साथ पल-बढ़ रहा है। सूरत से इस समय लगभग 24 अरब डॉलर वार्षिक हीरे का कारोबार हो रहा है। 6,000 पॉलिशिंग इकाइयों में 700,000 से अधिक कारीगर काम कर रहे हैं। सूरत दुनिया के लगभग 95 प्रतिशत हीरे का प्रसंस्करण कर रहा है, यानी कच्चे हीरे का आयात किया जाता है और कुशलतापूर्वक पॉलिश किए गए हीरे का निर्यात होता है।

सूरत से जो उत्कृष्ट सॉलिटेयर हीरे तैयार होते हैं, वे अपनी चमक और सुंदरता से दुनियाँ के दिलों पर कब्जा जमा लेते हैं। सूरत का हीरा बाज़ार केवल व्यापार का ही केंद्र नहीं है, बल्कि यह परंपरा का भी धरोहर स्थल है। यहाँ हीरा तराशने वाले कारीगर पारंपरिक नृत्य करते हैं। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।

कैसे तैयार होता है सूरत में हीरा
हीरे की तराशी एक जटिल प्रक्रिया है, जो सिर्फ कुशल कारीगर ही अपनी कलात्मकता और अत्याधुनिक तकनीक के उपयोग से कर सकते हैं। इसके लिए एक विशेष मशीन या उपकरण की जरूरत होती है। सटीक माप और खुरदरे पत्थर के 3डी मॉडल बनाने के लिए इनका उपयोग किया जाता है। सबसे बड़ी चुनौती हीरे को सही आकार देने की होती है। कच्चे हीरे की बर्बादी कम से कम करने वाले कारीगरों की ज्यादा पूछ होती है। पहले कच्चे हीरे पर निशान लगाया जाता है। इसके लिए थ्री डी लेजर तकनीक का उपयोग करते हैं। हीरे पर निशान लगाने के लिए मार्कर पत्थर का इस्तेमाल किया जाता है।

तीसरे चरण में हीरे को काटने के लिए आकार के हिसाब से अलग-अलग वर्गों में विभाजित किया जाता है। फिर ब्लेड और लेजर दोनों का उपयोग हीरे को काटने के लिए किया जाता है। सटीक डायमंड ग्रिट से लेपित ब्लेड बहुत सावधानी से चलाई जाती है, ताकि नुकसान ना हो। फिर लेजर सॉइंग परिशुद्धता और सटीकता के लिए उपयोग में लाया जाता है और हीरे को तराश कर उसे बाजार के तैयार किया जाता है। यहीं से हीरा अपना मूल आकार लेना शुरू करता है। इसके साथ लेजर ब्रूटिंग से हीरे के घुमावदार किनारों को बनाया जाता है। अंत में हीरे की पॉलिश की जाती है, जहां हीरे की असली चमक सामने आती है।

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