Vipassana Meditation: मन को शांत व शुद्ध रखने ले लिए है विपश्यना
विपश्यना (Vipassana) आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की अत्यंत पुरातन साधना-विधि है। विपश्यना को मन का व्यायाम भी कहा जाता है।

Vipassana Meditation: तेजी से बदलते लाइफस्टाईल व खान-पान ने इंसान को अनेकों बीमारियों (शारीरिक व मानसिक) का शिकार बना दिया है। जिससे निजात पाने के लिए मानव तरह-तरह के उपाय करता रहता है। इसी का एक समाधान है विपश्यना (विपासना, विपस्सना) जोकि इंसान के मन व आत्मा को शुद्ध करने का एक बेहतरीन तरीका है।
आधुनिक भारत में पहला विपश्यना ध्यान केंद्र खोलने का श्रेय सत्यनारायण गोयनका (जिन्हें "गुरुजी" भी कहते थे) को दिया जाता है। उन्होंने 1976 में पहला विपश्यना ध्यान केंद्र (इगतपुरी, नासिक के पास में) खोला, जिसे आज धम्म गिरि के नाम से भी जाना जाता है।
क्या है विपश्यना
विपश्यना (विपस्सना) पाली भाषा के शब्द 'पस्सना' (पश्य) से बना है, जिसका अर्थ होता है देखना। यह योग साधना के तीन मार्गों (विपश्यना, भावातीत व हठयोग) में से एक है। विपश्यना एक प्राचीन ध्यान (मेडिटेशन) योग अर्थात मानसिक व्यायाम का स्वरूप है, जो मन और तन दोनों के लिए लाभदायक है। ऋग्वेद में भी ध्यान का उल्लेख मिलता है। श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने ध्यान के बारे में बताया है।
ऐसा माना जाता है कि विलुप्त हुई विपश्यना साधना को भगवान गौतम बुद्ध ने लगभग 2500 वर्ष पूर्व दोबारा खोजकर पुनर्जीवित किया था। उन्होंने ध्यान की इसी विपश्यना-साधना द्वारा बुद्धत्व प्राप्त किया था। उनका कहना था, 'इहि पस्सिको', अर्थात आओ और (स्वयं) देखो। बुद्ध कहते थे, 'तुम शांत बैठकर श्वास देखते रहो'। क्योंकि देखने में ही शांति मिलती है। महात्मा बुद्ध की यह देखने की प्रक्रिया ही विपश्यना (विपासना) है। इसका अर्थ होता है - 'जो वस्तु सचमुच जैसी है, उसे उसी प्रकार जान लेना'। यह वास्तव में सत्य की उपासना है। विपश्यना (विपस्सना) वर्तमान में जीने की कला है, अर्थात खुद को जानने में यह मददगार है। इसके नियमित अभ्यास से अनेकों (मानसिक व शारीरिक) बीमारियां अपने आप दूर हो जाती हैं।
कैसे करें विपश्यना साधना
विपश्यना (विपस्सना, विपासना) के लिए योग्य गुरू होना चाहिए। आजकल इस साधना के लिए अधिकतम 10 दिनों के शिविर लगते हैं। जिसमें साधकों का बाहरी दुनिया से सभी संपर्क काटने के लिए कहा जाता है और उन्हें कठिन साधना करनी पड़ती है। साधक एक ऐसी दिनचर्या से गुजरता है, जिसमें वह दिन में कई बार बैठे-बैठे ध्यान (लगभग 10 घंटे) करता है तथा साथ ही अधिकतर मौन भी रहता है। विपस्सना साधना के 5 मूल सिद्धांत बताये गये हैं - (1) अहिंसा, (2) चोरी न करना, (3) झूठ न बोलना, (4) ब्रह्मचर्य पालन, और (5) नशा न करना।
इस साधना हेतु आप सुबह उठकर एकांत में ध्यान अवस्था में बैठकर अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करें। अर्थात श्वास किस तरह अंदर जा रहा है और रुक रहा है और बाहर आ रहा है, इसको महसूस करें। योग गुरूओं का मानना है कि यह साधना 7 दिन या 10 दिन की ही नहीं है। इसके उचित परिणाम के लिए लंबा समय या सालों लग जाते हैं।
तन व मन को शुद्ध करता है
विपासना (विपस्सना) तन व मन को शुद्ध करने में अहम भूमिका निभाता है। यह जीवन में तनाव व मानसिक विकारों से मुक्ति दिलाने का बेहतरीन उपचार है। इसके नियमित अभ्यास से मानव राग, भय, मोह, लालच, द्वेष समेत अनेकों विकारों से मुक्ति पा सकता है।
विपश्यना से बढ़ती है एकाग्रता
आजकल बच्चों व युवाओं में एकाग्रता का अभाव देखा जा रहा है। जिसके कारण बच्चे सही तरह से पढ़ नहीं पाते। विपस्सना साधना को नियमित करने पर एकाग्रता बढ़ती है जिससे किसी भी कार्य को करने पर उचित परिणाम प्राप्त होता है।
डिप्रेशन दूर होता है
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में डिप्रेशन एक बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है। विपस्सना का इस बीमारी को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान है। यह मस्तिष्क व मन को स्वस्थ रखने के लिए एक ध्यान योग है। इससे नियमित अभ्यास से मन में शांति बनी रहती है और नकारात्मकता नहीं आती। जिससे हमारा शरीर निरोगी रहता है।
विपश्यना साधना हेतु खर्च
आमतौर पर विपासना (विपस्सना) शिविरों में साधक से कोई शुल्क नहीं लिया जाता। शिविरों का खर्च पुराने साधकों द्वारा दिये गये दान से चलता है। विश्व भर में सभी विपश्यना शिविर दिए गए दान पर चलते हैं। यहां तक कि सहायक आचार्यों को भी कोई वेतन नहीं दिया जाता है, वे केवल सेवा भाव से ही काम करते है। शिविर संचालकों का मत है कि ये नियम साधक का शोषण एवं शिक्षा का व्यवसायीकरण होने से बचाता है।
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