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Sankranti in different States: अपनी विविधता के कारण कैसे भारत का राष्ट्रीय त्यौहार बन जाता है मकर संक्रांति?

मकर संक्रांति किसी-न-किसी रूप में लगभग पूरे देश में मनाया जाता है। प्रभाव, व्याप्ति एवं संदेश की दृष्टि से इसे सही अर्थों में भारत का राष्ट्रीय त्योहार भी कहा जा सकता है।

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Sankranti in different States: भारत त्योहारों का देश है। त्योहार हमारी संस्कृति के प्राण-तत्त्व हैं। अपने देश की कोई ऐसी ऋतु नहीं, कोई ऐसा मास नहीं, जो बिना त्योहार के रीतता-बीतता हो। त्योहारों से ही हमारा लोक और समाज नया जीवन, नया अर्थ और नई चेतना ग्रहण करता है। हमारे त्योहार हमें पूरी दुनिया से भिन्न एक मौलिक एवं विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।

सनातन संस्कृति में त्योहारों की यह परिपाटी सदियों पुरानी है। बल्कि यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि सनातन समाज अकेला ऐसा समाज है जो हजारों-हजार वर्षों एवं शताब्दियों से अपनी सामूहिक चेतना व स्मृतियों में अपने प्रमुख त्योहारों व परंपराओं को कमोवेश उनके मूल स्वरूप में सहेजे-संभाले हुए है।

निःसंदेह त्योहारों-उत्सवों की ऐसी उत्कृष्ट रचना एवं समृद्ध परिपाटी, हमें हमारे ऋषि-मुनियों एवं पुरखों-पूर्वजों से प्राप्त उनकी सर्वोत्तम भेंट है। उत्सवधर्मी भारतवर्ष में ऐसा ही एक प्रमुख उत्सव है - मकर संक्रांति, जो किसी-न-किसी रूप में लगभग पूरे देश में मनाया जाता है। प्रभाव, व्याप्ति एवं संदेश की दृष्टि से इसे सही अर्थों में भारत का राष्ट्रीय त्योहार भी कहा जा सकता है।

सूर्य की गति से संबंधित होने के कारण मकर संक्रांति का पर्व हमारे जीवन में गति, परिवर्तन, नव चेतना, नव उत्साह और नव स्फूर्ति का प्रतीक है। वर्ष भर में 12 सूर्य संक्रांति होती हैं, जिसे सौर मास भी कहा जाता है। सूर्य जब एक राशि को छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तब उसे संक्रांति कहते हैं। इन 12 संक्रांतियों में मकर सक्रांति को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। मकर संक्रांति से शरद ऋतु क्षीण होने लगती है और बसंत का आगमन प्रारंभ हो जाता है।

हमारे सभी त्योहार भारत की कृषि संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। इस समय नया धान खेतों से घर और खलिहान में लाया जाता है। दलहन के कुछ प्रकार आते हैं। नया गुड़ तैयार किया जाता है और तिल भी खेत से खलिहान आता है। धान का चावल, मूढ़ी (लइया) और चिवड़ा तैयार होता है। गुड़ के साथ तिल के व्यंजन व गज़क आदि तैयार किए जाते हैं।

सब प्रकार के अन्नों के सम्मिश्रण से खिचड़ी पकाई जाती है, जो शरीर के लिए तो सुपाच्य होती ही होती है, समाज के लिए भी समरसता का संदेश छुपाए रहती है। वस्तुतः मकर संक्रांति ऋतु और नक्षत्र के परिवर्तन का पर्व है। जैसा परिवर्तन सूर्य में होता है, वैसे ही परिवर्तन के वाहक हम सभी अपने-अपने जीवन में भी बनें, इसीलिए संक्रांति की साधना अत्यावश्यक है। बिना साधना के सिद्धि नहीं मिलती। संकल्प से साधना व साधना से सिद्धि को जीवन में दृढ़ता से साकार करने का आधार बनता है - सूर्य।

अतः मकर संक्रांति सूर्य की तरह शुभ, सुंदर व सार्थक का वाहक बनने के संकल्प का दिवस है। ऐसी मान्यता है कि इस अवसर पर किया गया शुभ कार्य निश्चित फलीभूत होता है। इसीलिए पुरातन काल से ही इस अवसर पर स्नान-दान, जप-तप, यज्ञ-हवन आदि की परिपाटी चली आ रही है। इस दिवस से दिन बड़ा होने लगता है और रात छोटी होने लगती है। इस रूप में यह अंधकार से प्रकाश की ओर प्रस्थान करने का भी पर्व है।

मकर संक्रांति के दिन जहां बिहार में दही-चूड़ा-तिलवा का विशेष महत्त्व है, वहीं उत्तर प्रदेश और जम्मू में खिचड़ी ही मुख्य प्रसाद है। पंजाब में संक्रांति की पूर्व संध्या पर लोहड़ी मनाई जाती है, जिसमें खुले में अलाव जलाकर तिल, मूँगफली, खील, बताशे आदि अग्निदेव को समर्पित करते हैं। असम में इसे माघ बीहू की तरह मनाया जाता है तो राजस्थान में इस दिन चौदह सौभाग्य सूचक वस्तुओं को सास कोटि की स्त्रियों या ब्राह्मण आदि को दान दिया जाता है।

उत्तराखंड में आटे की आकृति में बच्चे कागा को खिलाते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में घुघुतिया कहा जाता है। वहीं तमिलनाडु में यह चार दिनों तक मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत सम्मत जलाने से होती है। फिर लक्ष्मी और पशुधन आदि की पूजा की जाती है और चौथे दिन स्नान करके खुले आँगन में खीर पकाया जाता है, जिसे पोंगल कहते हैं। सूर्यदेव को नैवेद्य चढ़ाने के पश्चात प्रसाद पाया जाता है।

आंध्र और तेलंगाना में विशेष और विस्तृत भोजन का प्रावधान है। केरल में संक्रांति को मकर विलक्कू कहा जाता है। इस दिन सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा की पूजा की जाती है, जो प्रातः तीन बजे से ही प्रारंभ हो जाती है। पोन्नम्बलमेडु पहाड़ी पर ज्वाला देखकर भक्तगण पर्व मनाते हैं। आकाश में तारा मकर ज्योति दिखाई देती है, जिसके बारे में ऐसा माना जाता है कि स्वयं भगवान अयप्पा स्वामी दिव्य प्रकाश के रूप में भक्तों को अपना आशीर्वाद दे रहे हैं।

बंगाल में इस दिन तिल और नारियल के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं। गुजरात, राजस्थान में इस दिन पतंग उड़ाने की भी परंपरा है। गुजरात की पतंगबाज़ी तो अब व्यापक हो चली है। न केवल भारत वर्ष में बल्कि विश्व के अन्य कई देशों में भी सूर्य के उत्तरायण का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। बांग्लादेश में पौष संक्रांति, नेपाल में माघी संक्रांति, थाईलैंड में सोंगकरन, लाओस में पी मा लाउ, म्यांमार में थिरआन तो श्रीलंका में यह पोंगल व उझवल तिरूनल के नाम से प्रसिद्ध है।

मकर संक्रांति के साथ कई पौराणिक कथाएँ भी जुड़ी हैं। कहते हैं कि इस विशेष दिन पर भगवान सूर्य अपने पुत्र भगवान शनि के पास जाते हैं। उस समय शनि भगवान मकर राशि का प्रतिनिधित्व कर रहे होते हैं। पिता और पुत्र के बीच स्वस्थ संबंधों को स्थापित करने हेतु मतभेदों के बावजूद मकर संक्रांति को महत्त्व दिया गया। इच्छामृत्यु का वरदान पाने वाले पितामह भीष्म ने मृत्युशैय्या पर लेटे-लेटे उत्तरायण की लंबी प्रतीक्षा की और संक्रांति को देह-त्याग के लिए उपयुक्त माना।

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    इसके अलावा मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर से जा मिली थीं। महाराज भागीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति (मोक्ष) हेतु इसी दिन तर्पण किया था। इसीलिए मकर सक्रांति के उपलक्ष्य पर गंगासागर के तट पर देश का सबसे बड़ा मेला लगता रहा है। कदाचित तभी से यह उक्ति प्रचलित रही - 'सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार।' निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि मकर संक्रांति लोक व शास्त्र तथा विज्ञान व अध्यात्म के योग एवं समन्वय का अनूठा पर्व है।

    यह भी पढ़ें: Makar Sankranti Date: क्यों बदलती रहती है मकर संक्रांति की तिथि?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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